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9 प्वाइंट जो बताते हैं पीएम मोदी ही हैं 2019 के लोकसभा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा

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विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लोकसभा चुनाव का एजेंडा तय करने का आरोप लगाती हैं। उनका यह भी कहना है कि मोदी असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटाकर चुनाव को अपने इर्द-गिर्द केंद्रित कर रहे हैं। यह सही है कि 2019 के लोकसभा चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा और मुद्दा मोदी ही हैं। रैलियों में बोले गए उनके शब्द अगले दिन अखबार की सुर्खियां बनती हैं और फिर चुनावी मुद्दा। लेकिन इसमें मोदी का कोई दोष नहीं है। विपक्षी दलों ने ही मोदी को यह मौका दिया है। विपक्षी पार्टियों के प्रचार का अधिकांश हिस्सा मोदी विरोध पर ही केंद्रित होता है। ऐसे में उनका मुद्दा बनना लाजिमी है। वैसे मोदी पर चुनाव प्रक्रिया के बीच मुद्दे ड्रॉप करने का आरोप लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि पीएम ने प्रचार शुरू होने से पहले ही मुद्दे तय कर दिए थे। विपक्षी दल उनकी इस रणनीति में उलझकर रह गए तो अब उन पर इलेक्शन प्रोसेस को हाइजैक करने का झूठा आरोप मढ़ रहे हैं। अब देखते हैं 9 प्वाइंट्स जिसके जरिए पीएम मोदी खुद इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गए—

राष्ट्रीय सुरक्षाः फरवरी महीने में पुलवामा आतंकी हमले के बाद एयर स्ट्राइक से यह तय हो गया कि यह चुनाव में बड़ा मुद्दा होगा। चुनाव से पहले अपने इंटरव्यू में पीएम ने स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर उनकी सोच पिछली सरकारों से अलग है। आतंकवाद के खिलाफ ढीला-ढाला रवैया अपनाने वाली विपक्षी पार्टियां इस नीतिगत बदलाव से असहज हैं और खुद ही इसे बार-बार उठा रही हैं।

पाकिस्तानः पीएम मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक कूटनीति का रास्ता अख्तियार किया। पहले की सरकारें जहां आतंकी वारदात के बाद दुनिया के सामने रोते हुए दुखड़ा सुनाती थीं, पाकिसतान को धमकियां देती थीं, मोदी ने डायरेक्ट एक्शन की नीति अपनाई। उन्होंने आतंकवाद पर नकेल कसने की धमकी देते हुए उसे पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया। जब वे रैलियों में इसकी चर्चा करते हैं तो यह चुनाव का मुद्दा बन जाता है।

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रोजगारः चुनाव शुरू होने से पहले से ही विपक्षी दल मोदी राज में बेरोजगारी बढ़ने का आरोप लगाती रही हैं। पीएम मोदी ने इसका जवाब तर्कों की बजाय आंकड़ों से दिया। यह बताया कि देश आर्थिक महाशक्ति बन रहा है, देश में आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास हो रहा है और इन सब के चलते रोजगार के मौके भी बढ़ रहे हैं। विपक्षी पार्टियों के पास इसकी कोई काट नहीं है और वे ऊल-जुलूल तर्क देकर सरकार को गलत साबित करने की कोशिश कर रही हैं।

वंशवादः पीएम मोदी ने वंशवाद का एक अलग पहलू देश के सामने पेश किया। उन्होंने लोगों को दो तरह के राजनीतिक संगठनों के बीच फर्क बताया- पहला जिसमें एक परिवार के कुछ सदस्य मिलकर पार्टी चलाते हैं और दूसरा जिसमें पूरी पार्टी एक परिवार को चलाने के लिए काम करती है। उनके इस तर्क के दायरे में कांग्रेस के अलावा सभी विपक्षी पार्टियां भी आ गईं जो महागठबंधन में शामिल हैं। इन दलों के पास मोदी के तर्क का कोई जवाब नहीं है और पीएम हर रैली में इसकी चर्चा कर उन्हें और मुश्किल में डाल रहे हैं।

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कांग्रेस के ‘न्याय’ पर हमलाः कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में गरीबी हटाओ का नारा देकर खुद ही पीएम को हमला करने का मौका दे दिया। पीएम ने कांग्रेस के 2004 और 2009 के घोषणा पत्रों का हवाला देते हुए बताया कि पार्टी ने पहले गरीबों को डायरेक्ट ट्रांसफर का वादा किया था, लेकिन 10 साल सत्ता में रहने के बावजूद कुछ नहीं किया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कांग्रेस पार्टी 1969 से ही गरीबी हटाओ का वादा करती रही है।

आचार संहिताः विपक्षी दल पीएम मोदी के हर भाषण को चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन बता रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को भी वे आचार संहिता से जोड़कर देख रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग उन्हें अब तक हर मामले में क्लीन चिट दे चुका है। फिर भी विपक्षी पार्टियां बाज नहीं आ रही। उनकी अपनी गलती से ही यह मुद्दा भी बन रहा है और मोदी को उनके फैसलों की चर्चा करने का मौका भी मिल रहा है।

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भ्रष्टाचारः इसे चुनावी मुद्दा बनाने के लिए पीएम मोदी को दोष देने वाली पार्टियां यह भूल जाती हैं कि आजादी के बाद से हर चुनाव में भ्रष्टाचार मुद्दा रहा है। बीते 70 सालों में पहली बार हुआ है जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाए गए हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी विपक्षी पार्टियों को इससे नुकसान हो रहा है और वे इसके लिए सरकार को दोष देती हैं, लेकिन आम लोगों को इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष पसंद आ रहा है।

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राजनीतिज्ञ से राजनेता तकः 2014 में जब बीजेपी नरेन्द्र मोदी के नाम पर वोट मांग रही थी तो उस समय मोदी की पहचान एक राज्य के नेता के रूप में थी, लेकिन पांच साल बाद वे विश्व स्तर के नेता बन चुके हैं। यह उनकी नीतियों और फैसलों का असर है कि पूरी दुनिया में भारत का दबदबा बढ़ा है। विपक्षी दलों को पीएम मोदी का यह बढ़ा रुतबा पच नहीं रहा क्योंकि उनके पास इस स्तर का कोई नेता नहीं है।

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सबका साथ सबका विकासः यह मोदी सरकार का नारा नहीं बल्कि सूत्रवाक्य है और यह अकेले ही विपक्षी दलों के सभी नारों पर भारी है। इसका कारण यह है कि विपक्षी दलों की नीतियां और नारे अक्सर समाज के किसी एक वर्ग के लिए होती हैं जो उनका वोट बैंक होता है। लेकिन मोदी सरकार ने विकास की प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों को साथ लाकर विपक्षी दलों को बैकफुट पर धकेल दिया है।

 

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