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भारत को 17 हिस्सों में बांटना चाहते हैं ‘अर्बन नक्सल’!

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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के नक्सल लिंक के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 12 सितंबर तक टाल दी है। तब तक के लिए कोर्ट ने आरोपियों के हाउस अरेस्ट के लिए आदेश दिया है।

आपको बता दें कि 28 अगस्त को महाराष्ट्र पुलिस ने सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, अरुण फरेरा, वरवरा राव और वर्नोन गोंजाल्वेज को गिरफ्तार किया था। इन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम की धाराएं लगाई गई थीं। जिसके एक दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर तक उन्हें जेल नहीं भेजने का निर्देश दिया था।

इन पर नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखने के साथ पीएम मोदी की हत्या की साजिश में शामिल रहने का आरोप है। सभी आरोपियों पर सेक्शन 153 A, 505(1) B, 117, 120B, 13, 16, 18, 20, 38, 39, 40 और UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम ऐक्ट) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

हालांकि मीडिया का एक धड़ा इन ‘खूंखार नक्सलियों’ को ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्त्ता बता रहा है, पर क्या यही इन लोगों की असलियत है, या सच्चाई कुछ और है?

पहले तो आपको बता दें कि जितने भी लोग गिरफ्तार किए गए हैं, ये सभी नक्सालियों के समर्थक हैं और इनका नक्सलियों के साथ सीधा संबंध है। विशेष बात यह है कि इनमें अधिकतर पर यूपीए सरकार के दौरान भी एक्शन लिया गया था और कइयों को जेल भेजा गया था। आइये इन तथाकथित Activists की पृष्ठभूमि पर एक नजर डालते हैं।

बहरहाल हम इस बहाने समझते हैं कि आखिर इन ‘अर्बन नक्सलियों’ की मंशा भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की क्यों है?

सवाल उठता है कि आखिर इनके मन में भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का ये विचार आया कहां से?

दरअसल वामपंथियों के सामने राष्ट्रवाद की अवधारणा ही तुच्छ है। हालांकि ऐसा सभी मामलों में नहीं है क्योंकि यह तभी तक है जब तक इनके निशाने पर हिंदू समुदाय रहता है। हिंदू हित की बात कहने वालों को ये वामपंथी फासीवादी कहते हैं। जबकि इसके उलट दूसरे समुदाय (विशेषकर मुस्लिम और क्रिश्चियन) के मामले में ऐसा नहीं है। 

सवाल यह भी है कि आखिर हमारे राष्ट्र या राष्ट्रवाद से इन वामपंथियों (टुकड़े-टुकड़े गैंग) को इतनी नफरत क्यों हैं?

दरअसल इसकी वजह है इनकी वह सोच जिसके तहत भारत एक देश नहीं, बल्कि टुकड़ों में बंटा एक इलाका था। गौरतलब है कि भारत के बारे में वामपंथियों के ‘गुरु कार्ल मार्क्स के यही विचार 25 जून 1853 को न्यूयार्क के डेली ट्रिब्यून (अंक 3804) में प्रकाशित भी हुए थे।

वामपंथियों ने देश तोड़ने की साजिश को ताकत दी

मार्च 1940 में जब जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की तो सबसे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ ने इसका समर्थन किया था।

नंबूदरीपाद ने वामपंथियों की साजिश को स्वीकार किया

वामपंथियों की देश को टुकड़े करने की साजिश की इस सच्चाई को इतिहास की किताबों से गायब कर दिया गया है। दरअसल इन किताबों को तो इन्ही वामपंथियों ने लिखा है। लेकिन एक वामपंथी ऐसा था जिसने इस सच को लिख दिया। जनता द्वारा चुने गए दुनिया के पहले कम्युनिस्ट नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद ने अपनी किताब “Reminiscences of an Indian Communist” में लिखा है कि “भारत की जनता कम्युनिस्ट पार्टी से सिर्फ इसलिए दूर नहीं रहती है क्योंकि उसने स्वतंत्रता संघर्ष और भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था बल्कि इसका एक बड़ा कारण ये है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान के निर्माण और बंटवारे का खुलेआम समर्थन किया था।”

देश को 17 हिस्सों में बांटने की वामपंथियों की मंशा

1946 में भारत की आजादी की मांग पर विचार करने के लिए जब कैबिनेट मिशन भारत आया तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उसके सामने देश को 17 हिस्सों में बांटने की वकालत की थी। यह सब कुछ दस्तावेजों में दर्ज भी है।

दरअसल ये ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ सोवियत संघ के खूनी तानाशाह स्टालिन के उस विचार पर चल रहा था जिसके मुताबिक सोवियत संघ के राज्यों को आत्मनिर्णय का अधिकार था। और हुआ क्या नब्बे की दशक की शुरुआत में सोवियत संघ ‘टुकड़े-टुकड़े’ हो गया।

जारी है देश के टुकड़े-टुकड़े करने का अभियान

आज भी ये वामपंथी गैंग हमारे राष्ट्र को सोवियत संघ की तरह ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने के मिशन में जुटा हुआ है। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने अपनी किताब ‘भारत विभाजन के गुनाहगार’ में लिखा है कि – “वामपंथी लोग जब सत्ता में नहीं रहते तो राष्ट्रवाद को अपना दुश्मन समझते हैं और इसीलिए उसे कमजोर बनाने के लिए अलगाव (बंटवारे की नीति) को बढ़ावा देने लगते हैं। वामपंथ ने हमेशा भारत देश को कमज़ोर बनाया है, लेकिन फिर भी वामपंथी अपने सपने (भारत के टुकड़े-टुकड़े करना) को पूरा करने की आशा में अब तक अंधे हैं।”

वामपंथियों की इस साजिश में कांग्रेस भी बड़े ही तरीके से शामिल है। कर्नाटक में लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का माला इसी साजिश की अगली कड़ी थी।  दरअसल कांग्रेस का बस चले तो लिंगायत क्या, हिन्दू धर्म में जितनी जातियां हैं सबको अलग-अलग धर्म बना दे। चुनाव जीतने के लिए वह  गुप्ता, शर्मा, यादव, सक्सेना,  श्रीवास्तव, सिंह सबको अलग-अलग धर्म की मान्यता दे सकती है, और सबका अलग-अलग देश हो सकता है। 

पत्थलगड़ी पर वामपंथी और कांग्रेस ने रची सियासत की साजिश
अंग्रेजों ने आदिवासी बहुल इलाकों को अधिसूचित क्षेत्र बनाकर वहां की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से शासन की नींव डाली थी। अलग-अलग नामों से चल रही ग्राम सभाओं को सरकार ने संदेश पहुंचाने का जरिया बनाया था। 1996 में पेसा कानून आने के बाद लोग अपने गांव की सीमा पर पत्थलगड़ी (शिला गाड़ कर) करके कानून के तहत गांव को मिली शक्ति के बारे में लिखते थे। लेकिन कांग्रेस और वामपंथियों ने इसे हिंदुओं को तोड़ने के टूल की तरह इस्तेमाल किया है। आदिवासी समुदाय को हिंदुओं से अलग करने की साजिश के तहत अंग्रेजों के इस कानून को समर्थन दिया है। कांग्रेस के नेताओं ने खुलेआम कहा, ”पत्थलगड़ी करना असंवैधानिक नहीं है क्योंकि पत्थलगड़ी आदिवासियों की संस्कृति में शामिल है।”

सरना को अलग धर्म मानने की सियासत को दी हवा
झारखंड में रघुबर दास मंत्रिमंडल ने धर्मांतरण विधेयक-2017 को मंजूरी दी जिसके तहत मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन मुश्किल हो गया है, क्योंकि इसमें जबरन धर्म परिवर्तन कराने वालों के विरूद्ध कठोर सजा का प्रावधान है। दरअसल कांग्रेस बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तन होने के लिए समर्थन करती रही है। अब कांग्रेस आदिवासियों के वर्ग को भड़काकर सरना धर्म को मान्यता देने की बात उछाल रही है।

दरअसल झारखंड में बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाई बनाया जा रहा है। प्रदेश की आबादी में आदिवासियों की जनसंख्या 26 प्रतिशत है, इनमें अब 14 प्रतिशत लोग ईसाई धर्म को मानने लगे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में ईसाई धर्म मानने वालों की संख्या में 29 प्रतिशत, इस्लाम धर्म के मानने वालों की संख्या में 28.4 प्रतिशत और हिंदू धर्म के मानने वालों की संख्या में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भाजपा जबरन धर्म परिवर्तन का विरोध करती है जबकि कांग्रेस ने इसके लिए अपने सहयोगी बाबू लाल मरांडी को भी अपने साथ मिला लिया है। आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस को मिर्ची लगने का कारण क्या हो सकता है?

दलितों को उकसाकर बौद्ध बनाने की साजिश रची
साल 2016 के जुलाई में गुजरात के ऊना में वशराम, रमेश, अशोक और बेचार नाम के व्यक्ति को कथित गौरक्षकों ने पीटा था। इसमें कांग्रेस की साजिश के सबूत भी सामने आए थे, लेकिन इसे अब सियासत का जरिया बनाकर कांग्रेस आपनी वोट बैंक की राजनीति साधने में लगी है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि ये चारों लोग 14 अप्रैल को बौद्ध धर्म अपना लेंगे। हालांकि इन सबके बीच यह जानना जरूरी है कि जो लोग इन्हें भड़का रहे हैं उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का एलान नहीं किया है, लेकिन कांग्रेस इन चारों को प्रतीक के तौर पर दिखाना चाह रही है कि हिंदू धर्म में काफी भेदभाव है।

ईसाई धर्म को बढ़ाने के लिए साजिश रच रहे राहुल
कांग्रेस के कार्यकाल में ईसाई धर्म का लगातार विस्तार होता जा रहा है। देश में ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है। कभी चंद हजार ईसाई की संख्या थी परन्तु आज 2.80 करोड़ से अधिक ईसाई हैं। दरअसल कांग्रेस ने हमेशा से ईसाई धर्म को बढ़ाने के लिए कार्य किए हैं और हिंदुओं का विभाजन कर इस कार्य को अंजाम देते रहे हैं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही सोनिया गांधी ने पूर्वोत्तर में ईसाई मिशनरियों के फैलने में मदद की जिसने उन क्षेत्रों में आबादी का संतुलन ही बिगाड़ दिया। इसी का परिणाम है कि आज मेघालय में 75 प्रतिशत, मिजोरम में 87 प्रतिशत, नागालैंड में 90 प्रतिशत, सिक्किम में 8 प्रतिशत और त्रिपुरा में 3.2 प्रतिशत ईसाई आबादी हो गई है। इस साजिश को अंजाम देने के लिए कांग्रेस ने कभी माफी नहीं मांगी। वहीं केरल में भी करीब 24 प्रतिशत आबादी ईसाईयों की है। 

भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़कर किया अपमान
जिस हिंदू संस्कृति और सभ्यता की सहिष्णुता को पूरी दुनिया सराहती है, उसे भी बदनाम करने में कांग्रेस ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस धमाके के संदिग्ध पाकिस्तानी आरोपी को साजिश के तहत छोड़ दिया गया और उनके स्थान पर निर्दोष हिन्दुओं को गिरफ्तार किया गया। समझौता विस्फोट में कांग्रेस को राजनीतिक लाभ पहुंचाने के लिए सोनिया गांधी, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, शिवराज पाटिल और सुशील कुमार शिंदे ने हिंदू आतंकवाद का जाल बुना और एक पूरे के पूरे समुदाय को बदनाम किया।

 

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