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मॉब लिंचिंग पर विपक्ष बेनकाब, मोदी विरोध के नाम पर तीन साल से चल रहा है झूठ का खेल

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पिछले तीन साल में देश में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ी वारदातें विपक्ष शासित राज्यों में ही हुई हैं। ये तथ्य अब सार्वजनिक हो चुका है। यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधी कुछ निहित स्वार्थी तत्व और ‘Sick’ular विपक्ष पिछले काफी समय से जानबूझकर देश का माहौल खराब करने में लगे हुए हैं। लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने अपने बयान से ऐसे गंदी मानसिकता के लोगों के चेहरे से नकाब उतार दिया है।

केरल, यूपी और पश्चिम बंगाल में ज्यादा मामले
केंद्र सरकार ने राज्यों से मिली अपराध के आंकड़ों के आधार पर विपक्षी दलों की बोलती बंद कर दी है। दरअसल विपक्ष हाल में मॉब लिंचिंग की कुछ वारदाताओं पर खूब हाय-तोबा मचा रहा है। लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय को राज्यों की पुलिस से जो अपराधों के जो आंकड़े मिले हैं, उसके अनुसार सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में केरल, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर हैं। ये आंकड़े साल 2014 से 2016 के बीच के हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अपनी नाकामियों को छिपाने के लिये ही विपक्ष प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को बदनाम करके की साजिशें रच रहा है।

विपक्ष शासित राज्यों में अधिक सांप्रदायिक हिंसा
केरल में अभी वामपंथी गठबंधन की सरकार है। उससे पहले कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF की सरकार थी। इसी तरह पश्चिम बंगाल में लगातार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। जबकि यूपी में पिछले मार्च महीने तक समाजवादी पार्टी की सरकार थी। यानी अगर इन तीनों राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ी वारदातें सबसे ज्यादा हुईं तो इसके लिये केंद्र की बीजेपी सरकार को कैसे दोष दिया जा रहा है। तथ्य ये भी है कि कानून एवं व्यवस्था का विषय राज्य सूची में है और उससे केंद्र को सीधा लेना-देना नहीं है।

दरअसल अगर आप इस तरह के विवादों की गहराई में जाकर झांकने की कोशिश करें तो आपको पता चलेगा कि ये काम अज्ञानतावश नहीं एक साजिश के तहत हो रहा है। मोदी विरोध के नाम पर कुछ देशद्रोही लोग , कुछ निहित स्वार्थी तत्व ( कुछ मीडिया वाले भी शामिल) और खुद को सेक्युलर बताने वाले कुछ भ्रष्ट नेता और राजनीतिक पार्टियों ने इसके लिये एक जुगलबंदी की हुई है।

केरल और कर्नाटक की घटनाओं पर चुप्पी क्यों ?
बीते शनिवार की ही बात है केरल में तिरूवनंतपुरम के पास आरएसएस कार्यकर्ता राजेश की धारदार हथियार से बेरहमी से हत्या कर दी गई। कहा जा रहा है कि हत्यारों ने जिस तरह से राजेश को मारा उसे देखकर IS के आतंकी भी हैरान रह जाएं। वामपंथी गठबंधन की सरकार वाले इस राज्य में बीजेपी-आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्या की ऐसी कितनी ही घटनाएं हो चुकी हैं। आंकड़ों के अनुसार 1969 से अबतक राज्य में लगभग 172 आरएसएस-बीजेपी कार्यकर्ताओं की इसी तरह से हत्याओं की रिपोर्ट दर्ज है, जिनमें से अधिकतर आरोपी लेफ्ट के कार्यकर्ता हैं। केरल ही नहीं कांग्रेस शासित पड़ोसी राज्य कर्नाटक में भी हाल के कुछ महीनों में इसी तरह चुन-चुन कर आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्याएं की गई हैं। क्या उनका खून, खून नहीं था ? लेकिन क्या कभी किसी सेक्युलर नेता या मौजूदा निहित स्वार्थी तत्वों ने इसपर सवाल उठाने की कोशिश की है ?

पश्चिम बंगाल की घटनाओं पर क्यों रहती है बोलती बंद ?
पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के 24 परगना में कट्टरपंथियों ने कानून और संविधान को खुली चुनौती दे दी गई। लेकिन किसी सेक्युलर और मोदी विरोधी की जुबान नहीं खुली। क्योंकि वहां देश की संप्रभुता खतरे में डाली गई थी। आपत्ति तो तब की जाती है जब देशभक्ति की बातें होती हैं, राष्ट्र निर्माण की बातें होती हैं, देश की संस्कृति की बातें होती हैं। पश्चिम बंगाल में सरेआम शरिया कानून लागू किये जाने की मांग उठती है, आरोपी को सीधे भीड़ के हवाले करने की मांग को लेकर दंगा भड़का दिया जाता है, लेकिन इसपर बोलने के लिये कोई सेक्युलर तैयार नहीं होता। ऐसा एकबार नहीं बार-बार होता रहा है। लेकिन ममता को तो छोड़िये बाकी विपक्षी पार्टियों में से भी कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। क्योंकि असल में उन्हें धर्मनिरपेक्षता की आड़ में तुष्टिकरण की राजनीति करनी है।

सांकेतिक तस्वीर

किस बिल में दुबक जाता है फ्री स्पीच और मॉब लिंचिंग गैंग ?
विपक्षी नेताओं को तो राजनीति करनी है। वो तो सियासी फायदे के लिये इतने अंधे हो जाते हैं कि उन्हें देश के खतरे का भी अंदाजा नहीं रहता। उसी तरह आजकल फ्री स्पीच गैंग भी घटनाओं के हिसाब से सोच समझकर सक्रिय होता है। यानी अगर किसी घटना का बीजेपी सरकार से कनेक्शन जुड़ सकता है तो वो सड़कों पर उतरने में देर नहीं लगाते हैं। इन दिनों वो बात-बात में #NotInMyName के नाम से प्रदर्शन भी चलाने लगते हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता है कि घटना के तार SICKULAR दलों की सरकारों से जुड़ती हैं तो वो चूहों को तरह बिल में दुबक जाते हैं।

भारत 125 करोड़ लोगों का देश है। ऐसे में मुट्ठीभर लोग चाहकर भी देश का ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। लेकिन फिर भी सतर्कता जरूरी है। क्योंकि इतिहास में एक ही जयचंद हुआ था और हम सैकड़ों वर्षों तक गुलाम बन गये। उसकी अग्नि में आज भी चाहे-अनचाहे झुलसना ही पड़ता है।

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