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सोनिया गांधी ने पूर्व पीएम नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर को भी अपमानित किया था

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देश के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों- अटल बिहारी वाजपेयी और नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार भाजपा और कांग्रेस की संस्कृति को समझने का मौका देता है। अंतिम समय में दोनों ही सार्वजनिक जीवन में लंबे समय से सक्रिय नहीं थे। दोनों ही पूर्व प्रधानमंत्रियों की मृत्यु के समय की विशेष बात ये रही कि उनके ही दलों का नेता ही प्रधानमंत्री के पद पर था। 2004 में नरसिंह राव की मृत्यु के समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और सोनिया गांधी के हाथों में सत्ता की कुंजी थी।

अटल बिहारी वाजपेयी को अंतिम संस्कार के समय जो राजकीय और भावनात्मक सम्मान सरकार और देश की जनता ने दिया, उसके वह सच्चे हकदार थे। उन्होंने देश में आर्थिक सुधारों और विदेश नीति को दृढ़ विश्वास व साहस के साथ लागू किया था। वहीं कांग्रेस के गैर गांधी परिवार से प्रधानमंत्री बनने वाले नरसिम्हा राव को उनके कार्यों और आर्थिक सुधारों की नींव रखने वाले प्रणेता के अनुरूप कांग्रेस और सोनिया गांधी ने अंतिम संस्कार में भी सम्मान नहीं दिया, बल्कि उनका अपमान किया।

कांग्रेस, प्रधानमंत्री मोदी के इस सम्मान की संस्कृति को राजनीति से प्रेरित कहती है,क्योंकि कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार को सम्मान देना जानती है, जिसे वह राजनीति नहीं मानती। भले ही वह नेहरु -गांधी के नाम पर चुनाव जीतने का काम करे।

नरसिम्हा राव की अंतिम यात्रा की तस्वीरें कांग्रेस और सोनिया गांधी की शर्मनाक हरकतों की पोल खोल देती हैं। इन घटनाओं का वर्णन विस्तार से नरसिम्हा राव के जीवन पर लिखी पुस्तक-Half Lion में उनके साथ सबसे लंबे समय तक रहने वाले विनय सीतापति ने किया है। उस समय नरसिम्हा राव के अंतिम संस्कारों से जुड़ी खबरें और विनय सीतापति की पुस्तक से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस की संस्कृति कैसी है-

नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर के लिए फूल भी नहीं मंगाया
पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव कांग्रेस के ही नहीं देश के महान नेताओं में से एक थे। वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री भी रह चुके थे। इस मौके पर कांग्रेस को उन्हें राजकीय सम्मान देना चाहिए था, जो उनके कद के अनुसार होता। पत्रकार एम डी नलपत दिसबंर 24, 2004 को Rediff के रिपोर्ट में लिखते हैं कि 23 दिसंबर की सुबह पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की मृत्यु होने पर दिन में तीन बजे कैबिनेट की विशेष बैठक होती है। लेकिन, जब नरसिम्हा राव का शव 9, मोतीलाल नेहरु मार्ग पर स्थित निवास पर शाम पांच बजे पहुंचता है तो उनके शव को लेने के लिए कांग्रेस का कोई नेता या मंत्री वहां उपस्थित नहीं रहता है। इतना ही नहीं, उनके शव को रखने के लिए किसी भी तरह के प्लेटफॉर्म तक की व्यवस्था तत्कालीन सरकार या कांग्रेस की तरफ से नहीं किया गया। यहां कर कि उनके शव पर चढ़ाने के लिए फूल-माला तक का भी इंतजाम सरकार या पार्टी की तरफ से नहीं किया गया था।

Half Lion में उनके करीबी रहे विनय सीतापति लिखते हैं कि कांग्रेस के नेताओं ने उनके परिवार की इस मांग को मानने से इनकार कर दिया कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में किया जाए। परिवार चाहता था कि वह पिछले लगभग तीस सालों से दिल्ली में ही रह रहे थे और उनकी यही कर्मभूमि है। सीतापति लिखते हैं कि नरसिम्हा राव का परिवार दिल्ली में किसी भी तरह अंतिम संस्कार न कर सके इसके लिए सोनिया गांधी ने शिवराज पाटिल से लेकर तमाम कांग्रेस नेताओं को उनके निवास स्थान 9 मोती लाल नेहरु मार्ग पर भेजा। फिर भी परिवार दिल्ली के निगमबोध घाट पर ही अंतिम संस्कार करना चाहता था। लेकिन, कांग्रेसी दूतों का कहना था कि यदि दिल्ली में होगा तो यमुना के किनारे नहीं, दिल्ली कैंट में होगा। कांग्रेस के इस दबाव के सामने परिवार झुकने के लिए तैयार नहीं था। अंततः आन्ध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी ने परिवार को समाझकर हैदराबाद में हुसैन सागर झील के किनारे अंतिम संस्कार करने के लिए राजी कर लिया।

नरसिम्हा राव के शव को कांग्रेस मुख्यालय में घुसने नहीं दिया
नरसिम्हा राव का शव जब 9 मोती लाल मार्ग से कांग्रेस के मुख्यालय 24 अकबर रोड पहुंचा तो वहां पर पूर्व प्रधानमंत्री के पर्थिव शरीर को भवन में आने देने का आदेश ऊपर से नहीं मिला, इसलिए गेट बंद ही रहा।

नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर को अधजला ही छोड़ दिया था
हैदराबाद पहुंचने पर पूर्व प्रधानमंत्री के पार्थिव शरीर को 20 मिनटों के लिए कांग्रेस मुख्यालय में रखा गया। फिर हुसैन सागर झील के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। धार्मिक कर्मकांड पूरा होने के बाद सभी वहां से चले गये। राज्य सरकार ने किसी भी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था का कोई इंतजाम तक नहीं किया था। सरकार के इंतजाम की हालत ऐसी थी कि पार्थिव शरीर को जलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में लकड़ी भी उपलब्ध नहीं करवायी गई थी, इसका परिणाम हुआ कि शव अधजला ही रह गया। जब रात में टीवी चैनलों ने कुत्तों को टुकड़े खींचते हुए दिखाया तो सारा सरकारी तंत्र बौखला उठा। फिर किसी तरह से और लकडियों को लाकर काम निपटा दिया गया।

कांग्रेस की संस्कृति में वह संवेदनशीलता नहीं जो दूसरों को सम्मान दे सके और दूसरों की संवेदनाओं का सम्मान करे। राहुल और सोनिया की कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार के प्रति ही संवेदनशील रहती है।

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