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जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल राज्यसभा से पास, अनुच्छेद 370 खत्म

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जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल राज्यसभा से पास हो गया है। पक्ष में 125 वोट पड़े जबकि विपक्ष में 61 वोट पड़े। इसके पहले राज्यसभा में मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने की सिफारिश की। मोदी कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में बयान दिया और आर्टिकल 370 हटाने के साथ जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का संकल्प पेश किया। श्री शाह ने बाताया कि जम्मू-कश्मीर आरक्षण संशोधन बिल में अनुच्छेद 370 के सभी खंड लागू नहीं होंगे। मोदी सरकार ने ऐतिहासिक फैसले के तहत जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म कर दिया है। इसके साथ ही लद्दाख को अलग करते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो सैपरेट केंद्र शासित प्रदेश बना दिया है। यानि अब जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश होगा, वहीं लद्दाख भी अलग केंद्र शासित प्रदेश होगा। इस संबंध में राष्ट्रपति ने गजट भा जारी कर दिया है।

मोदी सरकार के इस फैसले के बाद अब जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान पूरी तरह से लागू होगा। जम्मू-कश्मीर का अब अपना अलग से कोई संविधान नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर ने 17 नवंबर 1956 को अपना जो संविधान पारित किया था, वह पूरी तरह से खत्म हो गया ह। कश्मीर को अभी तक जो विशेषाधिकार मिले थे, उसके तहत इमरजेंसी नहीं लगाई जा सकती है। लेकिन अब सरकार के फैसले के बाद वहां इमरजेंसी लगाई जा सकती है।

अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल 6 साल का था। लेकिन देश की तरह यहां भी पांच साल विधानसभा का कार्यकाल होगा। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में वोट का अधिकार सिर्फ वहां के स्थायी नागरिकों को था। किसी दूसरे राज्य के लोग यहां वोट नहीं दे सकते और न चुनाव में उम्मीदवार बन सकते थे। अब सरकार के फैसले के बाद भारत के नागरिक वहां के वोटर और प्रत्याशी बन सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर: विस्तार से जानिए आर्टिकल 370 के बारे में
जम्मू-कश्मीर इन दिनों राजनीति के केंद्र में है, हर देशवासी की निगाहें कश्मीर पर लगी है और सभी जानना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार दशकों पुराने विवाद को निपटाने के लिए क्या महत्वपूर्ण कदम उठाने वाले हैं। जम्मू-कश्मीर की विपक्षी पार्टियों की पूरी राजनीति आर्टिकल 370 और 35 ए के इर्दगिर्द घूमती है। आज-कल भी इसी की चर्चा है। आपको विस्तार से बताते हैं कि आखिर क्या है आर्टिकल 370 और 35 ए।

अर्टिकल 370:-
जम्मू-कश्मीर में जिस आर्टिकल 370 को हटाने की मांग की जा रही है, उसे संविधान के 21वें अध्याय में अस्थायी, विशेष संक्रमणकालीन और अतिरिक्त विधायी प्रक्रिया के रूप में शामिल किया गया था, ताकि राज्य के अपने संविधान निर्माण तक प्रतीक्षा न करते हुए आवश्यक वैधानिक प्रावधानों को लागू किया जा सके। इसके अनुसार, भारतीय संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य की सरकार से अनुमोदन कराना होगा।

भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया लेकिन इसका बंटवारा भी हो गया। भारत से निकलकर पाकिस्तान एक अलग देश बना। तब प्रिंसली स्टेट्स
को भारत या पाकिस्तान में विलय करने या फिर स्वतंत्र रहने का अधिकार प्राप्त था। कुछ प्रिंसली स्टेट्स को छोड़कर बाकी सभी ने खुशी-खुशी भारत में विलय के प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए। जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह ने स्वतंत्र रहने का निर्णय किया, लेकिन 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना के समर्थन से कबायलियों की ‘आजाद कश्मीर सेना’ ने कश्मीर पर हमला कर दिया। महाराजा ने हालात बिगड़ते देख भारत से मदद मांगी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने राजा हरि सिंह के सामने अपने राज्य को भारत में मिलाने की शर्त रखी। भारत की मदद पाने के लिए हरि सिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को ‘इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ ऐक्सेशन ऑफ जम्मू ऐंड कश्मीर टु इंडिया’ पर दस्तखत कर दिया। गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने अगले दिन 27 अक्टूबर, 1947 को इसे स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही, जम्मू-कश्मीर का भारत में विधिवत विलय हो गया।

आर्टिकल 370 क्या है?
जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ कैसा संबंध होगा, इसका मसौदा जम्मू-कश्मीर की सरकार ने ही तैयार किया था। जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने 27 मई, 1949 को कुछ बदलाव सहित आर्टिकल 306ए (अब आर्टिकल 370) को स्वीकार कर लिया। फिर 17 अक्टूबर, 1949 को यह आर्टिकल भारतीय संविधान का हिस्सा बन गया। भारत के संविधान को 26 नवंबर, 1949 को स्वीकार किया गया था। इन्हीं विशेष प्रावधानों के कारण भारत सरकार के बनाए कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होते हैं। इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा भी है। वहां सरकारी दफ्तरों में भारत के झंडे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का झंडा भी लगा रहता है। जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को दोहरी नागरिकता भी मिलती है। वह भारत का नागरिक होने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का भी नागरिक होता है। कुल मिलाकर कहें तो आर्टिल 370 के कारण मामला एक देश में दो रिपब्लिक जैसा हो गया है।

आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष अधिकार:-
* जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है। यानी, वहां राष्ट्रपति शासन नहीं, बल्कि राज्यपाल शासन लगता है।
* भारतीय संविधान की धारा 360 जिसके अन्तर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
* जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है, जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
* संविधान में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्व भी वहां लागू नहीं होते।
* कश्मीर में अल्पसंख्यकों को आरक्षण नहीं मिलता।
* धारा 370 की वजह से कश्मीर में आरटीआई जैसे महत्वपूर्ण कानून लागू नहीं होते है।
* जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है।
* जम्मू-कश्मीर का ध्वज अलग होता है।
* भारतीय संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य की सरकार से अनुमोदन कराना होगा।

 

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