Home विचार …तो क्या कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ देंगे राहुल गांधी!

…तो क्या कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ देंगे राहुल गांधी!

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बैठे हैं। इसके लिए वे जातिवाद और धर्मवाद का तिकड़म करने में भी गुरेज नहीं कर रहे। लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार करने वाली विभाजनकारी राजनीति के आसरे वे हर चुनाव जीतना चाहते हैं, लेकिन जनता है कि राहुल गांधी की बातों पर यकीन नहीं कर रही है। एक के बाद एक राज्यों में लगातार हराती जा रही है। आलम यह है कि राहुल गांधी के उपाध्यक्ष रहते जहां वे 2014 में लोकसभा चुनाव के साथ 19 राज्यों की विधानसभा के चुनाव हार चुके हैं, वहीं अध्यक्ष बनने के बाद भी त्रिपुरा, नागालैंड, मेघालय और कर्नाटक में हार का सामना कर चुके हैं।

दरअसल चुनावों में लगातार हार ने राहुल गांधी की उम्मीदों को झटका दिया है। 2013 में उनके उपाध्यक्ष बनने के बाद से लगातार हार का रिकॉर्ड बनाते जा रहे राहुल के प्रति पार्टी के भीतर भी असंतोष उभर रहा है। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि क्या नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ देंगे? साथ ही ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या दलितों और अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले राहुल उनके लिए जगह बनाएंके और अपना पद त्याग देंगे?

राहुल गांधी क्या करेंगे ये तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन आइये हम एक नजर डालते हैं राहुल के लगातार हार के रिकॉर्ड पर-

2018 सभी चार राज्यों के चुनावों में हारे राहुल
दिसंबर, 2017 कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद भी राहुल गांधी लगातार चुनाव हारते जा रहे हैं। वर्ष 2018 में त्रिपुरा, नागालैैंड और मेघालय में हुए चुनावों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, और अब कर्नाटक भी हाथ से चला गया। पूर्वोत्तर में एक समय कांग्रेस को छोड़कर अन्य किसी पार्टी का बोलबाला नहीं था, लेकिन कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई। इसी कारण से पार्टी को पूर्वोत्तर में लगातार हार मिली। दूसरी ओर कर्नाटक की हार कांग्रेस के लिए बड़ा सेटबैक है, क्योंकि यह प्रदेश, पार्टी के लिए ‘कांग्रेस का सबसे मजबूत किला’ कहा जाता था। जाहिर है कर्नाटक में कांग्रेस की हार बड़ा झटका है। 

2017 में सात में से छह राज्यों में मिली शिकस्त
वर्ष 2017 में सात राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता में कमजोरी की पोल खोल दी। गुजरात चुनाव में सारे विभाजनकारी तिकड़म अपनाने के बाद भी कांग्रेस को हार मिली, वहीं हिमाचल प्रदेश में भी सत्ता बचा नहीं सकी। इसके साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह की विश्वसनीयता और मेहनत की हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी किसी पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार
2015 में महागठबंधन के चलते बिहार में किसी तरह जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। भ्रष्टाचार और घोटालों के दाग लिए कांग्रेस आखिर स्वयं को पाक-साफ बताने की कोशिश क्यों करती है? 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2014 में 44 सीटों पर सिमट गई
दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। 2014 लोकसभा चुनाव में सिर्फ 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं। लगातार मिल रही हार राहुल गांधी के पार्टी की कमान पूरी तरह से संभालने में लगातार देरी भी उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े कर रही है।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार
लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

राहुल के कारण हार के लिए चित्र परिणाम

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