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प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति: विश्व बिरादरी में पाक की तरह चीन भी पड़ा अलग-थलग

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत के कारण पाकिस्तान के साथ-साथ अब चीन भी विश्व बिरादरी में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भी चीन अलग-थलग पड़ गया था। उस समय अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन चीन ने उसे वैश्विक आतंकी घोषित होने से बचा लिया था। चीन को छोड़कर सुरक्षा परिषद के 15 सदस्य देशों में से 14 ने मसूद पर कार्रवाई का समर्थन किया था। एक बार फिर तीनों देश प्रस्ताव के मसौदे को आगे बढ़ा रहे हैं। अमेरिका ने बुधवार को सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव के मसौदे को बांटा। अमेरिकी प्रस्ताव को फ्रांस और ब्रिटेन का समर्थन हासिल है। ये प्रस्ताव सभी 15 सदस्यों को दिया गया है और सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। अगर इस बार भी चीन ने प्रस्ताव को रोकने की कोशिश की तो उसकी छवि आतंकवाद के समर्थक के रूप में बन जाएगी।

अमेरिका ने लगाई चीन को लताड़
आतंकवाद के समर्थन के मुद्दे पर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने चीन को लताड़ लगाई है। पोम्पिओ ने कहा है कि चीन अपने यहां मुसलमानों का उत्पीड़न करता है, लेकिन हिंसक इस्लामी आतंकवादी समूहों को प्रतिबंध से बचाता है। पोम्पिओ ने बुधवार को ट्वीट किया कि दुनिया मुसलमानों के प्रति चीन के शर्मनाक पाखंड को बर्दाश्त नहीं कर सकती। एक ओर चीन अपने यहां लाखों मुसलमानों पर अत्याचार करता है, वहीं दूसरी ओर वह हिंसक इस्लामी आतंकवादी समूहों को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों से बचाता है। पोम्पिओ ने आरोप लगाया कि चीन अप्रैल 2017 से शिनजियांग प्रांत में नजरबंदी शिविरों में 10 लाख से ज्यादा उइगरों, कजाखों और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को हिरासत में ले चुका है।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीते चार सालों में कई चीजें ऐसी हुई हैं जिससे यह बात साबित होती है कि भारत को कोई हल्के में नहीं ले सकता। विशेषकर चीन को अब यह समझ आ गया है कि जब तक प्रधानमंत्री मोदी हैं, तब तक वह भारत पर अपनी शर्तें थोप नहीं सकता।

ब्रिक्स घोषणापत्र में करना पड़ा आतंकवाद का जिक्र
चीन में ब्रिक्स सम्मेलन, 2017 के संयुक्त घोषणापत्र में आतंकवाद पर निशाना साधा गया। इसकी सबसे खास बात तो यह रही कि इस सम्मेलन में कई पाकिस्तानी आतंकी संगठनों पर भी निशाना साधा गया। घोषणापत्र में पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हक्कानी नेटवर्क और तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठनों का जिक्र किया गया। जैश की निंदा किए जाने वाले इस घोषणापत्र पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी मंजूरी है, लेकिन ये इतना आसन नहीं था। ज्वाइंट स्टेटमेंट में चीन लगातार कोशिश कर रहा था कि वह आतंकवाद पर कोई बात न हो सके। सम्मेलन से दो दिन पहले चीन ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान के काउंटर आतंकवाद पर चर्चा करना सही नहीं है, लेकिन पीएम मोदी की कूटनीति में घिरे चीन को भी भारत की बात माननी पड़ी और आतंकवाद का मुद्दा शामिल करना पड़ा।

ओबीओआर पर चीन को भारत का समर्थन नहीं 
वन बेल्ट वन रोड चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी योजना है। वह एशिया और उससे आगे के देशों को एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की मदद से जोड़ना चाहते हैं, लेकिन भारत ने चीन की कोशिशों को भारत ने खारिज कर दिया है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं बनेगा। दरअसल, वन बेल्ट-वन रोड उस चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर यानि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से गुजरता है, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पड़ता है। भारत इसे अपना हिस्सा मानता है और इस इलाके में आर्थिक गतिविधियों में चीन के शामिल होने पर ऐतराज जताया है। जाहिर है मोदी सरकार के इस रुख से चीन बेहद परेशान है।

इंडियन नेवी ने पकड़े चीन के जहाज, कहा- ‘हैप्पी हंटिंग’
17 अप्रैल को हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के तीन जंगी जहाज घुस आए थे। भारतीय नौसेना ने बकायदा तस्वीरों के साथ ट्वीट कर चीन से कहा कि हिंद महासागर में आपका स्वागत है। दरअसल भारत ने दुनिया को यह बता दिया कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी अतिक्रमण करती है, लेकिन वह भारत के निगरानी तंत्र के अधीन है। नौसेना ने चीनी नौसेना के जहाजों के लिए लिखा हैप्पी हंटिंग।

गौरतलब है कि नौसेना की भाषा में हैप्पी हंटिंग का अर्थ होता है किसी जहाज या फिर पनडुब्बी का पीछा करना। भारतीय नौसेना ने यह भी बता दिया कि चीन के युद्धपोतों पर भारतीय सेना नजर रखे हुए है। एक दूसरे ट्वीट में भारतीय नौसेना ने एक नक्शा ट्वीट किया। जिसमें बताया गया कि किस-किस क्षेत्र की जिम्मेदारी नौसेना के कंधों पर है। दरअसल भारत ने इस ट्वीट के जरिए चीन को बता दिया कि हिंद महासागर में भारतीय नौसेना मजबूत स्थिति में है और उसके पास विशाल समुद्र को मॉनिटर करने की क्षमता मौजूद है।

चीनी सेना को पीछे धकेल कर सेना कब्जा किया जमीन
वर्ष 2017 में चीनी सेना सिक्किम के भारतीय क्षेत्र में घुस आई थी और दो भारतीय बंकरों को नष्ट कर दिया था। इसके बाद ही चीनी सैनिकों ने अचानक उन तीर्थयात्रियों को रोक दिया जो कैलाश यात्रा की ओर बढ़ रहे थे। तब से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था। 2008 और 2009 में चीनी सैनिकों ने यही हरकत की थी और कई बंकरों को नष्ट कर दिया था। लेकिन मोदी सरकार में चीन की इस धौंसपट्टी का जवाब दिया और भारतीय सैनिकों ने न सिर्फ भारतीय क्षेत्र से चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया, बल्कि चीन क्षेत्र की तीन किलोमीटर जमीन पर भी कब्जा कर लिया।

जासूसी के छह ठिकानों को भी भारतीय सैनिकों ने ध्वस्त कर दिया। तब चीन ने भारत से इसका विरोध भी दर्ज करवाया था, लेकिन भारतीय सैनिकों ने वापस लौटे से मना कर दिया था।

अरुणाचल में पेट्रोलिंग से बढ़ी चीन की टेंशन
अरुणाचल के सीमाई इलाके में 1962 युद्ध के बाद से अब तक कोई गोली नहीं चली है। इसके साथ एक सच यह भी है कि चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत मंसूबा पाले बैठा है और अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता रहा है। हालांकि मोदी सरकार ने चीन के इस दावे को सख्ती से खारिज किया है। मोदी सरकार के दृढ़ निश्चय के कारण प्रदेश में जहां विकास कार्यों में तेजी आई है, वहीं सीमा सुरक्षा पर भी बल दिया गया है। चीन के सुबानसीरी इलाके में भारतीय सेना ने पेट्रोलिंग की तो चीन ने ऐतराज जताया, लेकिन भारत ने चीन की इस हिमाकत का जवाब में वहां सेना की गश्ती और तेज कर दी। गौरतलब है कि चीन ने आसफिला सेक्टर में 21, 22 और 23 दिसंबर को सेना की पट्रोलिंग पर विरोध जताया था।

पैंगोंग झील से चीनी सैनिकों को खदेड़ा
चीन ने उत्तरी पैंगोंग झील के पास गाड़ियों के जरिये 28 फरवरी, 7 मार्च और 12 मार्च 2018 को घुसपैठ की। कहा जा रहा है कि चीनी सैनिक 6 किलोमीटर तक अंदर घुस आए थे।  लेकिन ITBP ने चीन के इस घुसपैठ पर विरोध जताया और चीनी सैनिकों को वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया। दरअसल पैंगोंग का ये वही इलाका है, जहां पर 2017 के अगस्त महीने में चीनी सैनिकों ने भारतीय सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की थी। इस साल भी चीनी सैनिकों ने पैंगोंग झील के पास उत्तरी पैंगोंग में ITBP के साथ बहस करने की कोशिश की थी, जिसको ITBP ने नाकाम कर दिया और उन्हें वापस अपनी सीमा में खदेड़ दिया।

डोकलाम में चीनी आर्मी को पीछे धकेला
वर्ष 2017 के जून महीने में चीन भारत-चीन-भूटान की सीमा के पास बने ट्राइ जंक्शन डोकलाम में घुसपैठ की थी। भूटान के इलाके में पड़ने वाला यह इलाका सामरिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है, परन्तु भारत ने चीनी सैनिकों को वापस उसकी सीमा में धकेल दिया। हालांकि 73 दिनों के आसपास तक चले इस प्रकरण में जिस तरह के मौखिक आक्रामकता और गीदड़ भभकी का प्रदर्शन चीन ने किया और उसके जवाब में जिस राजनीतिक परिपक्वता और टेंपरामेंट का परिचय भारत ने दिया उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का कद बढ़ा दिया। जिस तरह प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सेना और कूटनीतिज्ञों ने डोकलाम प्रकरण पर चीन को पछाड़ लगाई इससे दुनिया की नजरों में यह संदेश गया है कि भारत केवल अपने हित के लिए नहीं बल्कि अपने पड़ोसी देशों के हितों की रक्षा के लिए भी तत्पर रहता है।

श्रीलंका के हंबनटोटा पर चीन को घेरा
दिसंबर, 2017 में श्रीलंका ने सामरिक तौर पर अहम हंबनटोटा बंदरगाह का 70 प्रतिशत हिस्सा श्रीलंका ने चीन की फर्म को दे दिया था, लेकिन अब श्रीलंका की सरकार इसी बंदरगाह के पास बने हुए एयरपोर्ट का संचालन भारत को सौंप दिया है। हंबनटोटा में मताला राजपक्षा इंटरनेशनल एयरपोर्ट काफी समय से घाटे में चल रहा है। इसे चीन ने बनाया था लेकिन घाटे की वजह से कोलंबो अभी तक चीन के एग्जिम बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया है। घाटे में चल रहे मत्ताला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे को भारत दोनों देशों के बीच एक संयुक्त उपक्रम के रुप में चलाएगा। मतलब साफ है कि बंदरगाह से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर भारत की मौजूदगी हमेशा रहेगी। ऐसे में वह किसी भी परिस्थिति में चीन की हरकत पर नजर रख सकेगा।

इंडोनेशिया के ‘सबांग’ बंदरगाह का आर्थिक और सामरिक इस्तेमाल करेगा भारत
प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर इंडोनेशिया ने सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘सबांग’ बंदरगाह के आर्थिक और सैन्य इस्तेमाल की स्वीकृति भारत को दे दी है। यह चीन के लिए बड़ा झटका है। दरअसल ‘सबांग’ अंडमान निकोबार द्वीप समूह से 710 किलोमीटर की दूरी पर है। यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि चीन भी इस बंदरगाह को लेना चाहता था। दरअसल ‘सबांग’ बंदरगाह सुमात्रा द्वीप के उत्तरी छोर पर है और मलक्का स्ट्रैट के भी निकट है। गौरतलब है कि यह जिस इलाके में यह पड़ता है उससे भारत का 40 प्रतिशत समुद्री व्यापार होता है।

चीन की विस्तारवादी नीति को एक्ट ईस्ट से मात दे रहे पीएम मोदी
‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी से प्रधानमंत्री मोदी चीन के विस्तारवाद को दे रहे मात
पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार में चीन अपना दखल बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत उन देशों से अपने संबंधों को बढ़ा रहा है जो चीन की विस्तारवादी नीतियों से परेशान हैं।

गौरतलब है कि जापान, फिलीपीन्स, ताईवान, ब्रूनेई, मलेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ दक्षिणी चीन सागर को लेकर चीन का विवाद चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चीन के विरुद्ध फैसला आने के बाद भी वह नहीं मान रहा है और अपना दखल बढ़ाता जा रहा है। ऐसे में भारत की यह नीति सही है कि इन आसियान देशों से सहयोग बढ़ाकर चीन के विरुद्ध एक मत तैयार करे।

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘लुक अप ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी में बदल डाला
प्रधानमंत्री मोदी ने यूपीए सरकार की ‘लुक अप ईस्ट’ की पॉलिसी को ‘एक्ट ईस्ट’ में बदल डाला। इस नीति के तहत पूर्वोत्तर के राज्यों को पूर्वी और दक्षिणी पूर्वी एशिया के देशों- म्यांमार, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लावोस, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम से व्यापार करने के लिए फ्रंटलाइन राज्य माना गया। मोदी सरकार की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का उद्देश्य एशिया प्रशांत क्षेत्र में ध्यान केंद्रित करना है। हालांकि इसमें महत्वपूर्ण पहलू सामरिक और रणनीतिक गठजोड़ बनाना भी है। इसी पॉलिसी के तहत बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने को प्रधानमंत्री मोदी ने प्राथमिकता दी, और बांग्लादेश से कई समझौते करके सबंधों को एक ठोस मजबूती दी। पूर्वोत्तर राज्यों के विकास को मजबूती देने के लिए ही प्रधानमंत्री मोदी ने आसियान देशों की पिछले चार सालों में यात्राएं की और सामारिक महत्व के कई समझौते किये।

प्रधानमंत्री मोदी के आमंत्रण पर आसियान के सभी 10 राष्ट्रप्रमुखों का भारत आगमन
26 जनवरी, 2018 को नई दिल्ली के राजपथ पर विश्व ने एक और अनोखा दृश्य तब देखा जब आसियान देशों के 10 राष्ट्राध्यक्ष भारत की जमीन पर एक साथ दिखे। थाइलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रुनेई आसियान के नेताओं ने भारत को अपनी इस इच्छा से अवगत कराया कि रणनीतिक तौर पर अहम भारत-प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा मुखर भूमिका निभाए। साफ है कि आसियान देशों के नेताओं का पीएम मोदी पर भरोसा व्यक्त किया जाना विश्व राजनीति में भारत के दबदबे को दिखा रहा है।

मालदीव में चीन की दखल को नकारा
मालदीव में भारत के प्रति बढ़ते समर्थन को देखते हुए चीन चिढ़ा हुआ है। चीन भारत को धमकी भी देता है कि अगर भारत वहां दखल देगा तो चीन चुप नहीं बैठेगा। लेकिन मोदी सरकार की नीति से घिरा बैठा चीन इस मामले में सिवाय छटपटाने और धमकी देने के कुछ नहीं कर सकता है। दरअसल मालदीव में चीन के प्रति लोगों का गुस्सा भड़क रहा है और भारत के प्रति समर्थन बढ़ रहा है।

दलाईलामा को समर्थन देकर समझाया
केंद्र सरकार ने  2 मार्च, 2018 को यह साफ किया कि पड़ोसी देश चीन को खुश करने के लिए दलाई लामा को लेकर उसके स्टैंड में कोई बदलाव नहीं आया है। यह भी कहा कि दलाई लामा देश में कहीं भी धार्मिक आयोजन के लिए स्वतंत्र हैं। जाहिर है यूपीए सरकार के समय तो चीन की एक घुड़की से कांग्रेस सरकार परेशान हो जाती थी। इतना ही नहीं वह चीन के मान-मानऔव्वल में भी विश्वास करते थे। लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है। दलाईलामा ने मोदी सरकार के राज में ही अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया जिससे चीन चिढ़ गया, लेकिन भारत सरकार ने अपने स्टैंड में कोई बदलाव नहीं किया।

जाहिर है प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश की प्रतिष्ठा को नया आयाम मिला है। चीन को अब यह समझ आ गया है कि जब तक प्रधानमंत्री मोदी हैं, तब तक वह भारत पर अपनी शर्तें थोप नहीं सकता। चीन को यह भी स्पष्ट संदेश दिया जा चुका है कि भारत अपने हित को सर्वोपरि मानता है और देश हित से वह कतई समझौता नहीं करने जा रहा है।

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