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बर्फीले हिमालय में स्नान और साधुओं की संगति ने रची है पीएम मोदी की शख्सियत

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फौलादी इरादे और देश के लिए समर्पित एकाग्र दृष्टि वाली पीएम मोदी की शख्सियत को बनाने में आखिर किन चीजों को योगदान है- किसी को भी यह उत्सुकता सहज ही हो सकती है। 

दरअसल, भारतीय संस्कृति में मोदी जी की सनातन आस्था ने ही उनके व्यक्तित्व की रचना की है। महज 17 साल की उम्र में वे एक ऐसे परिव्राजक के रूप में भ्रमण पर निकल पड़े थे, जो इस दुनिया और खुद की खोज करना चाहता था। यह वह दौर था, जब जीवन के प्रति उनकी कोई स्पष्ट धारणा या राय नहीं बनी थी। 

‘…बस इतना जानता था कि मुझे कुछ करना है’

पीएम मोदी खुद कहते हैं, “मैं दिशाहीन और अस्पष्ट था। मैं यह नहीं जानता था कि मुझे कहां जाना है, मैं यह भी नहीं जानता था कि मुझे क्या करना है और क्यों करना है। मैं बस इतना जानता था कि मैं कुछ करना चाहता हूं।”  

‘Humans of Bombay’ को दिए अपने इंटरव्यू में पीएम मोदी ने अपनी युवावस्था के दो साल की यात्रा के बारे में विस्तार से बात की। प्रधानमंत्री ने इस ‘फेसबुक इंटरव्‍यू’ में अपने बचपन की कहानी भी सुनाई है। उन्होंने कहा, “मैं वहां-वहां गया जहां-जहां ईश्वर मुझे ले जाना चाहते थे। प्रातः काल बर्फीले हिमालय में स्नान करना और साधुओं के साथ सत्संग ने मुझे ब्रह्मांड की लय के साथ तालमेल बिठाना सिखाया। यह मेरे जीवन का अनिश्चित दौर था, लेकिन इसने मुझे कई सवालों के जवाब दिए।”   

‘तभी जिंदगी सही मायने में शुरू होती है’

पीएम मोदी ने कहा, “मैंने अनुभव किया कि हम सभी अपने विचारों और सीमाओं में बंधे हुए हैं। जब आप असीम के प्रति समर्पण करते हैं, तब आप जान पाते हैं कि आप इस विशाल ब्रह्मांड का एक छोटा सा हिस्सा हैं। जब आप यह समझ जाते हैं तो आपमें अहंकार का कोई अंश नहीं रह जाता और तभी सही मायने में जिंदगी शुरू होती है। मुझे उस वक्त जो अनुभूतियां हुईं, उनसे मुझे अब भी मदद मिलती है। इस अनुभव ने मेरे जीवन में ‘गाइडिंग फोर्स’ का काम किया।”

दरअसल, कोई भी व्यक्ति अगर अपने युवावस्था को याद करे तो उसे खुद में एक ऐसा व्यक्ति दिखेगा, जो उत्सुकता से तो भरा हुआ होता है, लेकिन जिसमें स्पष्टता का अभाव होता है। पीएम मोदी भी इससे अलग नहीं थे। उन्होंने कहा, मैंने सीखा कि शांति, अकेलापन और ध्यान की अवस्था झरने की आवाज में भी प्राप्त की जा सकती है। दो साल बाद मैं जब घर लौटा तो मुझमें एक स्पष्टता थी और जीवन के लिए एक दिशानिर्देश भी था।

सेना के जवान, साधु संगत और अध्यात्म

पीएम मोदी कहते हैं, “किशोरावस्था के दौर में मुझमें बहुत उत्सुकता थी, लेकिन स्पष्टता नहीं थी। मैं सेना के जवानों को यूनीफॉर्म में देखता और सोचता कि देश की सेवा करने का यही एक माध्यम है। लेकिन, जैसे-जैसे रेलवे स्टेशन पर साधु-संन्यासियों के साथ मेरी बातचीत गहराती गई, मैंने अनुभव किया कि अध्यात्म भी एक ऐसी दुनिया है, जिसके बारे में जानने की जरूरत है।”

‘ह्यूमन ऑफ बॉम्बे’ ने पीएम मोदी का इंटरव्यू पांच भागों में प्रकाशित किया है। प्रधानमंत्री ने इसमें अपने बचपन के साथ ही, पहली बार आरएसएस की  बैठक में शामिल होने के बारे में भी बताया है। उन्होंने बताया कि वे भारत के हर हिस्से के लोगों से मिलना चाहते थे।    

‘प्रधानमंत्री का सपना भी असंभव था’

पीएम मोदी से जब पूछा गया कि आठ साल के मोदी से अगर यह पूछा जाता कि क्या वह प्रधानमंत्री बनने का सपना देखता है, तो उसका उत्तर क्या होता ? पीएम मोदी ने कहा, “उसका जवाब होता… नहीं, कभी नहीं, मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।”

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