Home नरेंद्र मोदी विशेष ‘नमो’फोबिया से ग्रसित विरोध की राजनीति क्यों?

‘नमो’फोबिया से ग्रसित विरोध की राजनीति क्यों?

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आजकल पूरी दुनिया में एक नई बीमारी चली है नोमोफोबिया। इससे पीड़ित व्यक्ति को अपना इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खोने का डर सताता है। लेकिन भारत की राजनीति में एक नई तरह की बीमारी पांव पसार चुकी है- ‘नमो’फोबिया। ‘नमो’फोबिया नाम की बीमारी देश के ज्यादातर राजनीतिज्ञों में गहरे तक पैठ कर गई है। खास कर वैसे राजनीतिज्ञों में जो जाति-जमात की राजनीति के सहारे अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते रहे हैं।

रिजल्ट आया नहीं कि ‘नमो’फोबिया शुरू
पांच विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल के नतीजे शुक्रवार को सामने आ गए। इनमें पंजाब को छोड़ सभी जगहों पर कमल खिलने का अनुमान जताया गया है। साफ है ये इस बात का सबूत है कि देश में ‘मोदी लहर’ अब भी बरकरार है। हालांकि यूपी में कई एग्जिट पोल किसी को भी बहुमत नहीं दे रहे, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ही बताई जा रही है। यानी प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने की संभावनाएं अधिक हैं। बहरहाल ये संभावित नतीजों का अनुमान भर है। लेकिन ये अनुमान भी विरोधी दलों में ‘नमो’फोबिया बढ़ा रहा है।

लोकतंत्र भी ठेंगे पर
विरोधी दलों के कई दिग्गज समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी जैसी विरोधियों को भी एक छतरी के नीचे लाने की जुगत में लग गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसे कद्दावर नेता इस संभावित मेल के सूत्रधार माने जा रहे हैं। यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने तो कह भी दिया कि वो बसपा से हाथ मिलाने को तैयार हैं। सवाल यहीं खड़े हो रहे हैं कि जिस मुलायम सिंह ने जीवन भर बहुजन समाजवादी पार्टी का विरोध किया। जिस बसपा ने मुलायम सिंह यादव को ‘जालिम’ बताया। आज ये दोनों पार्टियां लोकतंत्रिक मर्यादाओं को ठेंगा दिखाते हुए जनता के साथ धोखाधड़ी करने को तैयार हैं।

हार मंजूर नहीं, चाहे जनता कुछ भी करे फैसला
भारतीय लोकतंत्र का एक पहलू ये उभर कर आ रहा है कि अब सहज रूप से कोई नेता या दल पराजय स्वीकार नहीं कर रहा। एक तरह से मतदाताओं के मत को ही खारिज करने की प्रवृति बढ़ती जा रही है। यूपी के एग्जिट पोल के नतीजों के बाद भी यही कुछ दिख रहा है। जोड़-तोड़ और जुगाड़ की राजनीति से लोकतंत्र चलाने की तैयारी की जा रही है। एक बार फिर बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कुठाराघात करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। धुर विरोधी एक बार फिर एक होने को हैं और मोदी विरोध के नाम पर एक बार फिर जनता के मैंडेट नकारने की तैयारी है।

सेकुलरिज्म के बहाने सारे गुनाह माफ
यूपी में चुनाव प्रचार के दौरान बीएसपी ने समाजवादी पार्टी को गुंडों की पार्टी कहा। समाजवादी पार्टी ने भी बीएसपी को पत्थरों की पार्टी कह कर करारा प्रहार किया। दोनों दलों के नेताओं ने एक दूसरे को भ्रष्टाचारी, अनाचारी और भी न जाने क्या-क्या कहा। लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों से ही दोनों एक दूसरे के लिए पाक-साफ हो गए हैं। छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम एक दूसरे का हाथ थामने को तैयार हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ये दोनों अगर ऐसा करेंगे तो जनता के साथ धोखा नहीं होगा? क्या एक दूसरे के भ्रष्टाचार की पोल खुलने के डर से ये एक हो रहे हैं?

तुम करो तो समाजवाद, भाजपा के लिए जहरवाद
बिहार हो या उत्तर प्रदेश यहां क्षेत्रीय छत्रपों की अपनी एक हनक रही है। लेकिन बदलते दौर में विकास की राजनीति ने जाति-जमात की राजनीति को पीछे छोड़ा है। यही वजह रही कि यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने भी विकास पुरुष की छवि गढ़ने की कोशिश की। लेकिन जाति-जमात की राजनीतिक पृष्ठभूमि को इस बार भाजपा की विकास की राजनीति पीछे छोड़ती दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास पुरुष की छवि ने इन क्षेत्रीय छत्रपों की राजनीतिक चूलें हिलाकर रख दीं हैं। बिहार में भी राजद, जदयू और कांग्रेस का महागठबंधन ‘नमो’फोबिया का परिणाम थीं। अब उत्तर प्रदेश में भी यही तस्वीर बन रही है।

कांग्रेस मुक्त भारत की राह पर चले राहुल
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले तक समाजवादी पार्टी को कोसती रही कांग्रेस ने मोदी विरोध के नाम पर ही समझौता कर लिया। उसे 403 में से महज 105 सीटों पर लड़ाई लड़ने के काबिल समझा गया। बिहार में कभी राज करने वाली कांग्रेस को 2015 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटें ही दी गईं थीं। आखिर कांग्रेस ये क्यों नहीं समझ पा रही कि एक के बाद एक राज्यों में अपना जनाधार खोती जा रही है? सिमटती जा रही है। क्या मोदी विरोध की पार्टी की राजनीति ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान को अंजाम तक पहुंचा देगी।

एक से सौ नंबर तक मोदी ही मोदी
देश में एक नई राजनीतिक तस्वीर उभर रही है। जहां राहुल गांधी, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसी महत्वाकांक्षी नेताओं की एक लंबी सूची है वहीं बीजेपी में सर्वमान्य नेता नरेंद्र मोदी ही हैं। ऐसे में मोदी विरोधी नेता एक साथ आकर देश को दो ध्रुवीय राजनीति की तरफ धकेलना चाहते हैं। नमो और विरोधियों के विजन में भी बड़ा फर्क साफ नजर आता है। एक तरफ नरेंद्र मोदी अपने विजन के साथ देश को विश्वगुरु के मुकाम पर खड़ा करना चाहते हैं, वहीं ‘नमो’फोबिया से ग्रसित नेता देश को जाति-जमात की राजनीति में उलझाए रखना चाहते हैं। यानी बदले वक्त की राजनीति में फिलहाल एक से सौ नंबर तक मोदी ही मोदी हैं

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