Home नरेंद्र मोदी विशेष प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से घिर गया पाकिस्तान-चीन!

प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से घिर गया पाकिस्तान-चीन!

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26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री ने देश की कमान संभालने के साथ ही यह संदेश दे दिया था कि भारत की विदेश नीति में जो जड़ता यूपीए शासन के दौरान थी, वो अब खत्म हो जाएगी। शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रण देने के साथ इसकी शुरुआत हुई। उसके बाद तो एक के बाद एक विदेश दौरों ने भारत को दुनिया में एक नई पहचान दी। विश्व ने भारत की इस नई ऊर्जा को पहचाना और उसे विशेष अहमियत देना शुरू कर दिया।

अमेरिका-रूस, फिलिस्तीन-इजरायल जैसे आपस में दुश्मन देश भी जहां भारत की दोस्ती पर खरे उतरे हैं, वहीं आसियान देशों के साथ संबंधों को भी नया आयाम मिला है। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी भारत की ओर नई आशा के साथ जुड़ गए हैं। इसके साथ ही अरब देशों से भी भारत के संबंध लगातार प्रगाढ़ हुए हैं। बीते 10 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी जब अरब देशों के दौरे पर गए तो उन्होंने ओमान से एक ऐसा समझौता किया है जो न एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक जीत भी है।   

ओमान के दुक्न पोर्ट से घिर जाएगा चीन-पाकिस्तान !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ओमान दौरे पर भारत और ओमान के बीच एक अहम रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत भारतीय नौसेना को ओमान के दुक्म पोर्ट तक पहुंच हासिल हो जाएगी। हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में भारत के रणनीतिक पहुंच के लिए यह समझौता महत्वपूर्ण है।

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दरअसल चीन जिस तरह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को विकसित कर रहा है, उसे देखते हुए दुक्म में भारत की मौजूदगी रणनीतिक तौर पर काफी अहम है। इसके जरिए भारत चीन को गल्फ ऑफ ओमान के मुहाने पर रोकने में सक्षम हो जाएगा। गौरतलब है कि 1950 के दशक में ग्वादर बंदरगाह ओमान के सुल्तान के अधीन था। ओमानी सुल्तान ने भारत को ग्वादर पोर्ट से जुड़ने का प्रस्ताव भी दिया था। लेकिन उस समय नेहरू सरकार ने पाकिस्तान के भय से ओमानी सुल्तान के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

ग्वादर का जवाब ईरान का चाबहार पोर्ट

दरअसल भारत खाड़ी के देशों के साथ रिश्तों को और प्रगाढ़ करने में लगा है। ऐसे में ओमान की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। ओमान पर्सियन गल्फ और हिंद महासागर के महत्वपूर्ण जलमार्ग पर स्थित है। इसके अलावा, ओमान उस क्षेत्र में वास्तविक ‘गुट-निरपेक्ष’ देश है। वह अरब जीसीसी का हिस्सा तो है, लेकिन उसके ईरान के साथ भी गहरे संबंध हैं। इससे एक बात तो साफ है कि चाबहार पोर्ट और दुक्न की कनेक्टिविटी से ग्वादर में चीन और पाकिस्तान को घेरने में मदद मिलेगी।

पाकिस्तान के प्रभाव से मुक्त हुआ अफगानिस्तान

20 जून, 2017 को भारत और अफगानिस्तान के बीच बने नये हवाई कॉरिडोर से दुनिया हैरान रह गई थी, क्योंकि यह रणनीतिक और कूटनीतिक दोनों ही लिहाज से भारत का चौंकाने वाला कदम था। दरअसल भारत अफगानिस्तान के साथ कारोबार के लिए दिल्ली-काबुल के बीच रोड कॉरिडोर को पाकिस्तान ने मंजूरी नहीं दी। पाकिस्तान के एतराज के बाद भारत ने एक कदम आगे चलकर एयर कॉरिडोर का तरीका निकाला डाला। इसके बाद तो भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट और गुजरात के कांडला पोर्ट से डायरेक्ट कनेक्टिविटी स्थापित कर अफगानिस्तान तक भारत की पहुंच को और आसान कर दिया।


हंबनटोटा बंदरगाह का मथाला एयरपोर्ट से जवाब

दिसंबर, 2017 में श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह को चीन को 99 साल के पट्टे पर दे दिया है। चीन का दावा है वह इसका व्यावसायिक उपयोग करेगा, लेकिन चीन की नीयत पर संदेह इसलिए है कि साल 2014 में चीन की एक पनडुब्बी कोलंबो के पास हम्बनटोटा बंदरगाह के पास आ गई थी। लेकिन भारत सरकार ने चीन की इस चाल से बिना घबराए चीन को मात देने की तैयारी कर ली है।  इसके तहत वह हम्‍बनटोटा से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर मथाला एयरपोर्ट का अधिग्रहण करेगा। मतलब साफ है कि बंदरगाह से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर भारत की मौजूदगी हमेशा रहेगी। ऐसे में वह किसी भी परिस्थिति में चीन की हरकत पर नजर रख सकेगा।

मालदीव में भारत के प्रभाव से चिढ़ गया चीन

मालदीव में भारत के प्रति बढ़ते समर्थन को देखते हुए चीन चिढ़ा हुआ है। चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत को धमकी के अंदाज में लेख लिखा है कि अगर भारत वहां दखल देगा तो चीन चुप नहीं बैठेगा। लेकिन मोदी सरकार की नीति से घिरा बैठा चीन इस मामले में सिवाय छटपटाने और धमकी देने के कुछ नहीं कर सकता है। दरअसल मालदीव में चीन के प्रति लोगों का गुस्सा भड़क रहा है और भारत के प्रति समर्थन बढ़ रहा है। इतना ही नहीं वहां का सुप्रीम कोर्ट और लोकतांत्रिक ताकतें भी भारत की तरफ उम्मीद लगाए बैठी है।

राष्ट्रपति के जिबूति दौरे से चीन हुआ परेशान

चीन और पाकिस्तान के चाल को मात देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने हर स्तर पर रणनीति बनाई है। इसी के तहत पिछले महीने, सेशल्स ने घरेलू राजनीतिक विरोध के बावजूद भारत के साथ एक संशोधित समझौते पर दस्तखत किया था, जिसके तहत भारत को इस द्वीपीय देश में ‘मिलिट्री इन्फ्रास्ट्रक्चर’ तैयार करने की इजाजत मिली है। मॉरिशस के साथ इसी तरह का समझौता पहले से मौजूद है। पिछले साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने पहले विदेश दौरे के तौर पर जिबूती गए थे। जिबूती में भारतीय मिशन की शुरुआत के साथ हॉर्न ऑफ अफ्रीका के इस अहम देश के साथ इस साल भारत के राजनयिक रिश्ते शुरू हो सकते हैं।

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म्यांमार, वियतनाम, जापान के समर्थन से मुश्किल में चीन

जून, 2017 में जब भारत-चीन के बीच भूटान के डोकलाम क्षेत्र को लेकर विवाद हुआ था तो पाकिस्तान को छोड़ लगभग सभी देशों ने भारत का साथ दिया था। इनमें म्यांमार, वियतनाम और जापान जैसे चीन के पड़ोसी देशों ने भारत के पक्ष में बयान देकर चीन की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की नीति ऐसी है कि चीन उसमें हर बार फंस जा रहा है। उसकी विस्तारवादी नीति को भारत अपनी आक्रामक विदेश नीति के जरिये काउंटर करता जा रहा है और हर बार सफलता प्राप्त हो रही है।

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