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खत्म हो गया केजरीवाल का करिश्मा !

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जन आंदोलन की सीढ़ी पर चढ़कर आम आदमी पार्टी ने जनता में बदलाव की उम्मीद जगाई थी। व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद में लोगों ने आम आदमी पार्टी को भरपूर समर्थन दिया। अपार जनसमर्थन के बूते अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी दिल्ली की सत्ता पर काबिज भी हो गई। लेकिन महज दो साल में ही ऐसा क्या हो गया जो पार्टी अर्श से फर्श पर गिर गई? सवाल उठ रहे हैं कि क्या केजरीवाल का करिश्मा खत्म हो चुका है?

ब्रांड केजरीवाल पर सवाल
वैकल्पिक राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुके केजरीवाल की अक्षमता उनके नेतृत्व कौशल में भी दिखी। दिल्ली में सुशासन की स्थापना करने के बजाय पैन इंडिया पार्टी बनने का उनका इरादा बिल्कुल बेतुका माना जाता है। इसी का नतीजा रहा कि गोवा और पंजाब में पार्टी को जबरदस्त हार मिली। पंजाब की हार तो वास्तव में केजरीवाल के लिए झटका देने वाला रहा। एमसीडी चुनाव में हार के बाद अब गुजरात में चुनाव लड़ने का फैसला कितना समझदारी भरा होगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

केजरीवाल ने तोड़ा भरोसा
लोकतंत्र में जनता की आशा जगाकर उसे तोड़ना बहुत बड़ा पाप है। लेकिन आप के मुखिया के अहंकार और आत्म मोह ने जल्द ही दिल्ली की जनता के भरोसे को तोड़ दिया। आम आदमी के तौर पर कुर्सी पर काबिज होकर केजरीवाल ने न सिर्फ जनता के आत्मबल को तोड़ा बल्कि सत्ता की कुरीतियों और विकृतियों को भी अपनाया। जाहिर है कुर्सी की लालच में केजरीवाल के किए गए कर्म ने उनकी ‘ईमानदार’ वाली छवि को भी आघात किया।

कल्पना लोक में जीते रहे केजरीवाल
दरअसल केजरीवाल एंड कंपनी आज तक मिली असफलताओं का आत्मनिरीक्षण करने के बजाय कल्पना लोक में जीते रहे। इन्हें लगता रहा कि चाहे वे कितनी बार भी गलतियां कर लें उनका आकर्षण और करिश्मा कभी खत्म नहीं होगा। मंत्रियों और नेताओं पर लगे आरोपों के बचाव में पार्टी लगातार खड़ी रही। न तो उनकी जांच करवाई और न किसी की जवाबदेही तय की गई। जाहिर है दिल्ली की जनता जल्द ही समझ गई व्यवस्था परिवर्तन की बात कहकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी भी अन्य राजनीतिक दलों से अलग नहीं है।
आत्ममुग्धता ने डुबोई केजरीवाल की लुटिया
अरविंद केजरीवाल को अपने कामकाज के तौर-तरीकों पर हमेशा सवाल उठाए जाते रहे। केजरीवाल की जिद, टकराव, अहंकार और मनमानी चलती रही। सबसे खास ये कि उनकी टीम ने भी उन्हें गलत जानकारी देना जारी रखा। उन्हें ये बताया जाता रहा कि आम आदमी पार्टी का झाड़ू चुनाव चिन्ह आज भी उतना ही लोकप्रिय है जितना 2015 में है। जाहिर है जमीनी हालात से इतर अरविंद केजरीवाल इसी आत्ममुग्धता में जीते रहे और परिणाम आज सबके सामने है।

कैडर बनाने में नाकाम रहे केजरीवाल
केजरीवाल की राजनीति सिर्फ हवा में की गई बातों के सहारे चलती रही है। अन्ना आंदोलन के असर के कारण 2015 में राज्य में पूर्ण बहुमत भी मिल गई। लेकिन पार्टी अब तक कैडर बनाने में सफल नहीं हो पाई है। बिना बेस की पार्टी को लेकर पंजाब और गोवा का चुनाव लड़ना भारी भूल थी। गुजरात चुनाव की तैयारियां भी राजनीतिक साजिश और पार्टी के शीर्ष नेताओं की चौकड़ी के भरोसे लड़ने की रणनीति बनाई गई है। जाहिर है बिना रणनीति और बिना आधार के पार्टी अपनी साख भी बरकरार नहीं रख सकेगी।

करप्शन पर सवालों में घिरे केजरीवाल
दो साल पहले दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल एंड कंपनी को जो ऐतिहासिक जनादेश दिया था, दरअसल वो किसी एक नेता या पार्टी का करिश्मा नहीं था बल्कि सकारात्मक राजनीतिक परिवर्तन की आकांक्षा थी। जाहिर है नेतृत्व कर रहे अरविंद केजरीवाल को इस जनादेश का श्रेय मिला। लेकिन केजरीवाल की अक्षमता ने इस ऐतिहासिक अवसर को भी गंवा दिया।

दरअसल राजनीति की जिस गंदगी को दूर करने के वादे के साथ केजरीवाल नेता बने थे कुर्सी मि‍लते ही खुद उसी दलदल में धंसने लगे। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार जैसी तमाम बुराइयों ने उनके नेताओं और मंत्रियों को अपने घेरे में ले लिया। 

एमसीडी चुनाव में मिली हार ने ये साबित कर दिया है कि दिल्ली की जनता के बीच केजरीवाल की विश्वसनीयता खत्म हो गई है। इस बार भी पार्टी ने हाउस टैक्स माफ करने, गरीब तबकों को बिजली, पानी, शिक्षा जैसी सुविधाएं मुहैया करवाने के बड़े-बड़े दावे किये थे। बावजूद इसके इतनी बड़ी हार ने केजरीवाल के नेतृत्व को नाकाम साबित कर दिया है।

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