Home विचार नोटबंदी हाय-हाय करने वालों के मुंह पर तमाचा-नहीं थमी तरक्की की रफ्तार

नोटबंदी हाय-हाय करने वालों के मुंह पर तमाचा-नहीं थमी तरक्की की रफ्तार

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अधर में विकास, संकट में शेयर बाजार, असंगठित क्षेत्र में हाहाकार, रेटिंग एजेंसियों का झटका, विदेशी निवेश पर ग्रहण और सबसे बड़ी बात पटरी से उतरती अर्थव्यवस्था। ये वो जुमले थे जो नोटबंदी के साहसिक और ऐतिहासिक फैसले के बाद विपक्ष और वामपंथी विचारधारा वाले अर्थशास्त्री छाती कूट-कूटकर चिल्ला रहे थे। कालेधन, नकली करेंसी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सर्जिकल स्ट्राइक को काले मन से लिया गया फैसला बताया जा रहा था।

लेकिन, आंकड़े झूठ नहीं बोलते। जीडीपी के आंकड़ों ने इस साहसिक कदम की हर तरह से आलोचना करने वालों के मुंह बंद कर दिए हैं। वित्त वर्ष की उस तिमाही में जब नोटबंदी का ऐलान हुआ था, देश की तरक्की की रफ्तार 7 फीसदी रही है। और इस रफ्तार में एक्सीलेटर का काम किया है कृषि क्षेत्र ने, जिसकी विकास दर 3.8 फीसदी से बढ़कर 6 फीसदी रिकॉर्ड की गयी है। जीडीपी में शामिल इंडस्ट्री ग्रोथ, माइनिंग सेक्टर और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में भी जोरदार उछाल दर्ज किया गया है। इस तरह नोटबंदी को लेकर सभी आशंकाओं पर पूर्ण विराम लग गया है।

मंगलवार को जारी केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-17 में तरक्की की रफ्तार 7.1 फीसदी की दर पर रहने का अनुमान है। ये अनुमान उन अर्थशास्त्रियों के लिए करारा जवाब है जो विकास दर को पटरी से उतरी हुई और 6 फीसदी के आसपास बता रहे थे। आजादी के बाद के पिछले तीस वर्षों में किसी न किसी रूप में देश की अर्थव्यवस्था से सक्रिय तौर पर जुड़े रहे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो नोटबंदी के फैसले को आर्थिक लूट तक करार दे दिया था, लेकिन आंकड़ों ने इस भ्रम को तोड़ते हुए नोटबंदी को देश की तरक्की के लिए वरदान साबित कर दिया है। इन आंकड़ों से ये भी साबित हो गया है कि आईएमएफ से लेकर तमाम रेटिंग एजेंसियों और अर्थशास्त्रियों के अनुमान पूर्वाग्रह से कितना ग्रसित थे।

नियति के मिलन यानी ट्रिस्ट विद डेस्टिनी के इस नए रूप को राजनीतिक विमर्श में लाकर चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिशें भी की गयीं। लेकिन नोटबंदी के बाद हुए सभी उप चुनाव और निकाय चुनावों में बीजेपी की शानदार जीत ने साबित कर दिया कि स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रसिद्ध ट्रिस्ट विद डेस्टिनी भाषण के 70 साल बाद देश कितना आगे पहुंच चुका है। आज देश कहीं ज्यादा खुशहाल है। बीते 37 वर्षों में प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी कोई साढ़े चार फीसदी बढ़ गयी है।

इस साल बजट से पहले पेश देश की आर्थिक सेहत बताने वाले आर्थिक सर्वेक्षण का विश्लेषण करें तो साबित होता है कि देश समाजवाद की परंपरागत सोच से आगे मुक्त व्यापार, खुले पूंजी बाजार और निजी क्षेत्र पर भरोसे के साथ दुलकी चाल से आगे बढ़ रहा है। 2004 से 2014 तक के नीतिगत लकवे और हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के दौर से निकलकर देश अब आर्थिक सुधारों के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। मोदी सरकार के जीएसटी और नए बैंक करप्सी कोड यानी दिवालिया कानून के बाद सुधारों की सूची में एक नई कड़ी जुड़ गयी है।

इतना ही नहीं भारत का ट्रेड और जीडीपी का अनुपात भी अब करीब-करीब चीन के बराबर है। देश में विदेशी पूंजी का आगमन भी विश्व की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कदमताल मिला रहा है। कल्याण योजनाओं पर सरकारी खर्च भी दुनिया के बड़े देशों को टक्कर दे रहा है। बिजनेस करने की लागत में कमी का नया खाका और प्रणाली बनाकर मोदी सरकार ने न सिर्फ नौकरशाही लाइसेंस राज का खात्मा किया बल्कि देश में निवेश का एक नया माहौल भी तैयार किया है।

पिछली सरकारों के उलट मौजूदा केंद्र सरकार ने मध्य वर्ग की जरूरतों का ध्यान रखते हुए शासन प्रणाली में गुणात्मक परिवर्तन किए हैं। अगर यही रफ्तार रही और शासन सही हाथों में रहा तो भारत को सबसे तेज़ी से उभरती विशाल अर्थव्यवस्था बनने से कोई नहीं रोक सकता। जो सदी के मध्य यानी 2050 तक देश को दुनिया की लोकतांत्रिक सुपर पॉवर बनने की दिशा में आगे ले जाएगा और देश ट्रिस्ट विद डेस्टिनी के नए रूप का गवाह बनेगा।

 

-तसलीम खान, 
वरिष्ठ पत्रकार

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