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कट्टरपंथ पर क्यों चुप हैं असहिष्णुता पर बोलने वाले?

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क्या आतंकवाद और कट्टरपंथ का कोई कनेक्शन है? क्या आतंकवाद का धर्म से कोई संबंध है ? ये सवाल इसलिए प्रासंगिक है कि देश में एक साथ दो बड़ी घटनाएं एक साथ हुई हैं। दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुईं। एक कट्टर आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट से प्रेरित आतंकवादी सैफुल्ला का एनकाउंटर में मारा जाना। दूसरा कर्नाटक की एक मुस्लिम लड़की के गाए भजन पर कट्टरपंथियों द्वारा उसे निशाना बनाया जाना। लेकिन दोनों ही घटनाओं पर राजनीति और समाज की दो अलग तरह की प्रतिक्रियाएं। एक तरफ सैफुल्ला के एनकाउंटर पर जमकर सियासत हो रही है, वहीं ‘एकता का राग’ गाने वाली सुहाना सईद पर कट्टरपंथियों के हमले पर राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी जमात खामोश है।

कांग्रेस-ओवैसी का ‘दोगलापन’!
कांग्रेसी दिग्गज पीसी चाको, सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे नेताओं ने तो सैफुल्ला के एनकाउंटर पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। सैकड़ों जानें लेने की योजना बना रहे आतंकवादी को जिस यूपी एसटीएफ ने समय रहते ढेर कर सैकड़ों जाने बचा लीं, उसी आतंकी को कांग्रेसी और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता ‘शहीद’ बताने को आतुर हो रहे हैं। आखिर क्यों?

सैफुल्ला के अब्बा से सीखो ‘सबक’!
इन सारी घटनाओं के बीच राजनीतिज्ञों और कट्टरपंथियों को सबक सिखाने का जज्बा किसी ने पेश किया है तो वो हैं आतंकवादी सैफुल्ला के पिता। उन्होंने कहा, ‘जो देश का न हुआ, वह मेरा क्या होगा। मुझे उसका मरा मुंह भी नहीं देखना है। हर किसी के लिए देश पहले है, यदि वह देश का ही नहीं हुआ तो मेरा क्या होगा।’ आखिर हमारे सियासतदां सैफुल्ला के पिता सरताज खान से सबक क्यों नहीं लेते?

‘एकता का प्रतीक’ सुहाना
सुहाना सईद पर महज एक भजन गाने को लेकर उसपर पाबंदी लगाने की मांग की जा रही है। दरअसल एक टीवी शो में सुहाना ने भगवान बालाजी की तारीफ में ‘श्रीकरने… श्रीनिवासने’ भजन गाया था। इस भजन पर कन्नड़ म्यूजिक डायरेक्टर अर्जुन जान्या ने सुहाना से कहा था, ‘तुम्हारी आवाज सचमुच बहुत अच्छी है। तुमने अच्छा गाया, भजन गाकर तुम एकता की प्रतीक ( symbol of unity) बन गई हो, संगीत लोगों को एकजुट करने का एक जरिया है।’

महिलाओं की मौलिक आजादी का सवाल
मुस्लिम कट्टरपंथी जमात लड़की के भजन गाने पर नाराज विरोध करने वाले लोग तो ये तक कहते हैं कि इस्लाम में गाना गाने की इजाजत नहीं है। जबकि सुहाना सईद ने भजन गाने के बाद साफ कहा था, ‘मेरे रहन-सहन या मेरे टैलेंट को लेकर किसी तरह की पाबंदी नहीं होनी चाहिए, दूसरों को भी आगे आना चाहिए और कामयाबी हासिल करनी चाहिए, कम से कम मुझे देखने के बाद लोगों को साहस से काम लेना चाहिए।’ जाहिर है सुहाना सईद की बात महिलाओं की मौलिक आजादी का प्रतिनिधित्व करती है।

चुप क्यों हैं ‘असहिष्णुता’ का राग गाने वाले?
बड़ा सवाल ये है कि सुहाना सईद पर सवाल उठाने वालों पर हमारे कथित बुद्धिजीवियों की चुप्पी क्या कहती है? अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हल्ला मचाने वाले नेता क्यों गायब हैं? बात-बात पर बखेड़ा खड़ा करने वाले पत्रकार क्यों खामोश हैं? सैफुल्ला मामले पर पर नेताओं का सियासी नफा-नुकसान की बात तो फिर भी समझ में आती है। लेकिन, देश में अभिव्यक्ति की आजादी के ‘लंबरदार’ पत्रकारों की चुप्पी जरूर सवाल खड़े करती है। आखिर पुण्यप्रसून वाजपेयी, रवीश कुमार, बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई जैसे लोग क्यों चुप हैं? सागरिका घोष, अभय दूबे, अरविद मोहन झा, ओम थानवी जैसे बड़े पत्रकारों की भी जुबानों पर ताला क्यों है? अरुंधति राय, शोभा डे जैसी तथाकथित समाजिक कार्यकर्ताओं के मुंह क्यों बंद हैं? अभिव्यक्ति आजादी के नाम पर सेना के खिलाफ नारा लगाने वाला कन्हैया क्यों चुप है? खुद को मॉडरेट मुस्लिम कहने वाले जावेद अख्तर आखिर क्यों कुछ नहीं बोल रहे?

कट्टरपंथियों के आगे बोलती बंद
कथित बुद्धिजीवी जमातों की चुप्पी। अभिनेता, समाजसेवी और पत्रकारों की सुहाना मामले पर खामोशी क्या कहती है? क्या कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही इस बहादुर लड़की को इस तरह अकेला छोड़ देने वाले कथित ‘ज्ञानी लोग’ कायर नहीं हैं? डरपोक नहीं हैं? क्या इनका दोहरा चरित्र उजागर नहीं हुआ है?

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