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कांग्रेस का आपातकाल Vs बीजेपी का विकासकाल

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1966 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से इंदिरा गांधी लगातार हर वो दांव आजमाती रहीं जिससे उनकी कुर्सी में जरा भी डगमगाहट की आशंका ना बचे। इसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से इंदिरा गांधी कांग्रेस के अंदर जमे दूसरी धारा के नेताओं के लगातार निशाने पर थीं। 1967 के आम चुनाव में जब गैर-कांग्रेसवाद के नारे के तले कांग्रेस का जनाधार खिसका तो उनके विरोधियों को नई ताकत मिल गई। 1969 आते-आते अंदरूनी घमासान तेज हो गया और कांग्रेस का विभाजन हो गया। पार्टी के अंदर मौजूद अपने शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए इंदिरा गांधी साम-दाम-दंड-भेद की नीति पर उतर आईं। पार्टी के विभाजन के बाद लोकसभा में कांग्रेस के पास 228 सदस्य रह गए थे और उसकी सरकार वामपंथियों के सहारे टिकी थी। इंदिरा गांधी ने तय किया कि वे मध्यावधि चुनाव कराएंगी और लोकसभा भंग कर दी गई।

गरीबी हटाओ के नारे से चकमा
अपने कुछ तेजतर्रार सलाहकारों से मंत्रणा कर 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा उछाला। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रीवी पर्स की समाप्ति जैसे कदमों के साथ इंदिरा गांधी ने आम लोगों में अपनी ये छवि पेश की कि वो गरीबों की हमदर्द हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जनसभाओं में आमजन की हमदर्दी ये कहते हुए बटोरी कि वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ। पांचवीं लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस ने चुनाव में दो-तिहाई सीटें हासिल कर भारी सफलता प्राप्त कर ली।

इंदिरा के कामकाज के तरीके से बढ़ा असंतोष
जल्दी ही ये साफ होने लगा कि गरीबी हटाओ का नारा महज चुनाव जीतने का एक हथकंडा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आम लोगों की गरीबी हटाने की जगह अपने बेटे संजय गांधी के निजी मारुति कार कारखाने के विकास जैसे कामों में लग गईं। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे को अभी दो साल भी नहीं हुए थे कि 1973 में देश भर में बिगड़ते हुए आर्थिक हालात, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हुए। इंदिरा गांधी पर एकाधिकारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जन आंदोलन शुरू हुआ और उसी के असर को दबाने के लिए 1975 में आपातकाल लगा दिया गया। यानी गरीबी तो नहीं हटी, उल्टा इंदिरा गांधी ने देशवासियों को आपातकाल की काली सुरंग में भेज दिया।

कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीख ले
गरीबी हटाने की योजना पर कैसे काम किया जाता है वो आज कांग्रेस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासवादी योजनाओं से सीखने की जरूरत है। इन योजनाओं के केंद्र में हमेशा गरीब, किसान और समाज के वंचित वर्गों के लोग होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों को फायदा देने वाली एक पर एक योजना को जमीन पर लागू कर ये साबित किया है कि नीयत में खोट नहीं हो तो जनता से किये तमाम वादों को पूरा किया जा सकता है। जनधन से लेकर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी कई योजनाएं हैं जिनसे गरीबों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है।

डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम
कांग्रेस राज में सरकारी स्कीम के लाभार्थियों के हाथ 100 रुपये में से महज 15 रुपये लगते थे। लेकिन अब सौ फीसदी रकम सीधे उनके खाते में पहुंच रही है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम के जरिये सरकार ने पिछले चार साल में 90,000 करोड़ रुपये बचाए हैं। 33 करोड़ से अधिक जरूरतमंद लोग इसके जरिये लाभ उठा चुके हैं। आधार से डीबीटी योजना के जुड़ने से बिचौलिये और फर्जी लाभार्थी खत्म हो चुके हैं।

प्रधानमंत्री जन धन योजना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत की। इसकी घोषणा उन्होंने 15 अगस्त 2014 को लाल किले से अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में की थी। योजना के शुरू होने के दिन ही डेढ़ करोड़ खाते खुल गए थे। चार साल में जन धन खातों की संख्या 31.80 करोड़ को पार कर गई, इतना ही नहीं इनमें 80,578 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा भी हुए। गरीबी हटाने के सपने दिखाने वाली कांग्रेस ने अपने 60 साल में कभी इसकी परवाह नहीं की कि गरीबों को भी अपने बैंक खाते होने का एहसास मिले।

प्रधानमंत्री उज्‍ज्वला योजना
इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया से की। उज्ज्वला योजना के तहत अब तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले करीब 4.36 करोड़ से अधिक परिवार की महिलाओं को मुफ्त रसोई गैस कनेक्‍शन दिये जा चुके हैं। मोदी सरकार ने 2020 तक 8 करोड़ परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

अटल पेंशन योजना
इस योजना का उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के लोगों को पेंशन फायदों के दायरे में लाना है। देश की युवा पीढ़ी को ध्‍यान में रखकर तैयार की गई मोदी सरकार की यह एक और अहम योजना है। इससे ये सुनिश्चित होगा कि किसी भी भारतीय नागरिक को बीमारी, दुर्घटना या वृद्धावस्था में अभाव की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

कांग्रेस आपातकाल लाती है, बीजेपी विकासकाल
इनके अलावा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना हो, स्टैंड अप इंडिया हो या फिर प्रधानमंत्री मुद्रा योजना-इन सभी योजनाओं के फोकस में समाज के उन वर्गों के लोग हैं जो अब तक विकास की सरकारी योजनाओं के दायरे से बाहर रहे थे। आज वो अपने रोजगार का जरिया भी बना रहे हैं, लोगों को रोजगार देने के काबिल भी बन रहे हैं, इतना ही नहीं देश के विकास में अपना योगदान देने की ओर भी बढ़ रहे हैं। ये राजनीति से ऊपर नरेंद्र मोदी सरकार की सोच है जो नोटबंदी जैसे कड़े फैसले पर भी उसे जनता का समर्थन हासिल होता है। आज सरकार और नागरिकों के आपसी सहयोग से देश बढ़ रहा है। विश्व मंच पर भारत एक बड़ी ताकत के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में योजनाओं पर अमल के रंग को देखकर अब जनता को भी कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकार के कामकाज का फर्क महसूस हो रहा है। जनता समझ चुकी है कि कांग्रेस आपातकाल लाती है तो बीजेपी विकासकाल।

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