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देशहित के कार्यों का क्यों विरोध करती है कांग्रेस ?

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‘अटकाना’, ‘लटकाना’ और ‘भटकाना’ ही कांग्रेस की ‘कार्यसंस्कृति’ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कर्नाटक की सभा में कहे इन तीन शब्दों ने कांग्रेस के ‘सियासी साहित्य’ की व्याख्या कर दी है। दरअसल केंद्र सरकार कितनी भी अच्छी नीतियां देशहित में क्यों न बना लें, कांग्रेस उसके विरोध में हो-हल्ला करती ही है। गलत नीतियों, विचारों का विरोध तो जरूरी है, लेकिन हितकारी नीतियों पर जबरदस्ती विरोध कर देशहित को नुकसान पहुंचाना समझ से परे है। बीते तीन वर्षों में कांग्रेस ने ऐसे अधिकतर निर्णयों का विरोध किया है जो देशहित के रहे हैं।

सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध
गत वर्ष 28-29 सितंबर की रात पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में किया गया सर्जिकल स्ट्राइक शायद पहला ऐसा मौका था जब भारत में सेना और राजनीति एक पंक्ति में आ खड़ी हुई। दिलचस्प यह रहा कि लगभग हर विचारधारा और पार्टी के नेताओं ने सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर किसी प्रकार का विरोध नहीं किया, लेकिन कांग्रेस ने अपनी कुत्सित राजनीति का परिचय यहां भी दे दिया। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे तो दिग्विजय सिंह ने भी सेना की इस घोषणा को कटाक्ष के अंदाज में कठघरे में खड़ा कर दिया। कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने तो भारतीय सेना की पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर में सर्जिकल स्‍ट्राइक की कार्रवाई को फर्जी बता दिया था। निरूपम ने ट्वीट किया था, ‘प्रत्‍येक भारतीय पाकिस्‍तान के खिलाफ सर्जिकल स्‍ट्राइक्‍स चाहता है लेकिन भाजपा द्वारा राजनीतिक फायदे के लिए फर्जी वाली नहीं। देश के हितों पर राजनीति।’

रोहिंग्या मुसलमान पर विरोध
रोहिंग्या मुसलमान आज पूरी दुनिया के लिए समस्या हैं। ये रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार के लिए जहां आतंकवाद की समस्या हैं तो बांग्लादेश के लिए बढ़ती आबादी की चिंता का सबब हैं। वहीं दुनिया के कई देशों के लिए ये मानवाधिकार का मुद्दा हैं। भारत के लिए मानवाधिकार के साथ आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है। मोदी सरकार का संकल्प रहा है कि वो ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से खिलवाड़ नहीं होने देगी। एक ओर रोहिंग्या को लेकर तमाम शंकाएं हैं दूसरी ओर कांग्रेस रोहिंग्या पर राजनीति कर रही है। इसके पैरोकार इस विसंगति से आंखें मूंदे रह जाते हैं कि रोहिंग्या जिन देशों के नागरिक हैं वही इन्हें आतंकी मानते हुए अपने यहां रखना नहीं चाहते। म्यांमार के दूसरे पड़ोसी देश बांग्लादेश, इंडोनेशिया, थाइलैंड भी रोहिंग्या को शरण देने को तैयार नहीं। ये सुरक्षा संबंधी चिंता ही है जो बांग्लादेश में रोहिंग्या समुदाय के लोगों को फोन कनेक्शन देने पर रोक लगा दी गई है। करीब 50 मुस्लिम देशों ने आतंक से रोहिंग्या का नाता देखकर इन्हें शरण देने से मना कर रखा है। ऐसे में फिर भारत में इनके प्रति हमदर्दी को आने वाले समय के लिए वोट बैंक के इंतजाम की कोशिश के रूप में क्यों ना देखा जाए?Image result for रोहिंग्या मुस्लिम और कांग्रेस

3 तलाक पर बैन का विरोध
ट्रिपल तलाक कांग्रेस के लिए किस कदर राजनीति का मुद्दा रही है इसका सबूत ये है कि ट्रिपल तलाक के हक में कांग्रेस के नेता और दिग्गज वकील ने इसके पक्ष में अदालती लड़ाई लड़ी। मोदी सरकार का विरोध करने के नाम पर कपिल सिब्बल ने तीन तलाक और हलाला की तुलना राम के अयोध्या में जन्म से कर डाली। यानी मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा उन्हें नहीं दिखी और वे राजनीति करते रहे, लेकिन मोदी सरकार ने सख्त कदम उठाए और मुस्लिम महिलाओं के दुख दर्द के साथ खड़ी रही। कांग्रेस ने 1986 में शाहबानों प्रकरण में जो रुख अपनाया था वो मुस्लिम महिलाओं की तकलीफें बढ़ाने वाला था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में अपना फैसला देते हुए पति को गुजारा भत्ता देने की बात कही थी, लेकिन शाहबानो के पति ने कोर्ट के फैसले को मुस्लिम पर्सलन लॉ में दखल करार देते हुए भत्ता देने से मना कर दिया। जिसके बाद इस विवाद में मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड भी कूद गया। यह विवाद इतना बढ़ा कि मामले ने राजनैतिक रंग ले लिया। उस समय तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कांग्रेस के अपने परंपरागत अल्पसंख्यक वोट बैंक को बचाने के लिए पर्सलन लॉ में कोर्ट के दखल को न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि अपनी बहुमत वाली सरकार से इस बारे में संसद से एक कानून भी पास करा लिया।

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नोटबंदी के मामले पर विरोध
8 नवंबर की रात नोटबंदी का ऐतिहासिक और साहसिक फैसला लेकर मोदी सरकार ने कालेधन और आतंकवाद पर करारा प्रहार किया था। नोटबंदी से 500 और हजार के पुराने नोटों को चलन से बाहर कर पीएम मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था पर झाड़ू चलाई थी। हालांकि, शुरुआत में इस निर्णय से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा, मगर बाद में इस फैसले का उन्होंने भी स्वागत किया। वहीं, कांग्रेस ने अपनी नकारात्मक राजनीति लगातार जारी रखी है। कांग्रेस इसे ‘स्कैम ऑफ द सेंचुरी’ कह रही है, लेकिन कांग्रेस को यह समझना आवश्यक है कि इसी नोटबंदी के कारण देश में 57 लाख नये करदाता जुड़े हैं। इसी नोटबंदी के कारण तीन लाख फर्जी कंपनियां पकड़ाई हैं। इसी नोटबंदी के कारण 813 करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति का पता लगा है। इसी नोटबंदी के कारण बैंकों में तीन लाख करोड़ रुपये जमा हो सके हैं, लेकिन काग्रेस के युवराज आज भी पूरे देश में घूम-घूम कर नोटबंदी को गलत फैसला कह रहे हैं। जाहिर है राजनीतिक आधार खो चुकी कांग्रेस के पास सिवाय विरोध करने के और कुछ रह भी तो नहीं गया है। आखिर विपक्ष इतने बड़े देशहित के कदम का विरोध कर क्या संदेश देना चाहती है?

नोटबंदी पर कांग्रेस का विरोध के लिए चित्र परिणाम

जीएसटी पर कांग्रेस का विरोध
जीएसटी के लागू होने की प्रक्रिया में कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दल रोड़े अटकाते रहे हैं। बावजूद इसके देश की आर्थिक आजादी की नयी कहानी लिखने वाला यह निर्णय एक जुलाई से लागू हो चुका है। ‘वन नेशन, वन टैक्स’ की नीति देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए है, देश में पूंजी निवेश बढ़ाने के लिए है, व्यापारियों के झंझट को खत्म करने वाला है, उद्योगपतियों को इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलाने के लिए है यानी जनता की सहूलियत के लिए है, लेकिन विपक्ष को तो केंद्र सरकार के हर निर्णय का विरोध करना होता है इसलिए विरोध करते रहे। अपनी राजनीति के सामने देशहित से भी खिलवाड़ करता रहा। कांग्रेस ने विरोध भी कुतर्क के जरिये किया और कहा कि सेंट्रल हॉल में इसके लागू होने का कार्यक्रम करना अनुचित है। विरोध करते हुए कांग्रेस यह शायद भूल गई कि 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेश वाले देश में इसे लागू करना पाना कितना कठिन था। अलबत्ता कांग्रेस की राज्य सरकारों ने भी जीएसटी का समर्थन किया था। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस का विरोध फिर क्यों?

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आधार से लिंक करने पर विरोध
सरकार जब भी आधार कार्ड पर कुछ निर्णय करती है, उसका विरोध हो जाता है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेता इस का मुखर विरोध करते हुए आधार कार्ड को ही गैरकानूनी कहते हैं। ममता बनर्जी ने हद ही कर दी है… उन्होंने तो मोबाइल नंबर से आधार से लिंक करने के मामले पर कोर्ट तक का दरवाजा खटखटा दिया जिसपर कोर्ट ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहा कोई राज्य केंद्र सरकार के किसी निर्णय के विरुद्ध कैसे याचिका दायर कर सकता है? लेकिन सवाल तो कांग्रेस की नीतियों को लेकर है। आधार कार्ड का कंसेप्ट ही कांग्रेस सरकार की है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने खामियों को दूर करते हुए इसे व्यापक आधार दिया। पारदर्शी व्यवस्था के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य किया जा रहा है। इसके जनक और कांग्रेस के नेता नंदन नीलकेणि ने भी मोदी सरकार की इस मामले पर सराहना की है, लेकिन कांग्रेस के अन्य नेता केवल मोदी विरोध के नाम पर आधार से लिंक किए जाने की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हैं। जाहिर है कांग्रेस की यह दोहरी मानसिकता देश के लिए नुकसानदायक है।

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एक बार चुनाव करवाने का विरोध
देश में चुनाव सुधार को लेकर कई सारी बातें होती हैं, लेकिन जब इसकी बारी होती है तो कांग्रेस पीछे भाग जाती है। अब जब देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने को लेकर मंथन का दौर चल रहा है तो कांग्रेस ने इसका विरोध किया है। कांग्रेस ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का बहुत ही कड़ा विरोध करते हुए यह कहा कि यह लोकतंत्र का पूर्ण अपमान होगा। कांग्रेस की दलील है कि संसद और विधानसभाओं का तय कार्यकाल होता है और सरकार के विश्वास मत खोने या अप्रत्याशित स्थिति में ही बीच में चुनाव कराने का पूर्ण प्रावधान है। निर्वाचित लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती कतई नहीं की जा सकती। ‘एक देश ,एक चुनाव‘ को वे केवल इसलिए विरोध कर रहे हैं कि इस प्रस्ताव को बीजेपी ने लाया है।

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बाबरी मस्जिद-राम मंदिर के समाधान का विरोध
केंद्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार दोनों मिलकर राम मंदिर और बाबरी ढांचा विवाद को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन कांग्रेस इसमें अपनी राजनीति के तहत अड़ंगा लगा रही है। मुसलमानों की ओर से शिया समुदाय ने राम मंदिर निर्माण को लेकर अपनी सहमति दे दी है, लेकिन कांग्रेस है कि बाबरी एक्शन कमेटी को उकसा रही है और उसे बातचीत के टेबल पर आने नहीं दे रही है। दरअसल किसी भी समस्या का तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है जब तक कि उसके सभी पक्षकार सहमत न हो जाएं। इस मामले में बात काफी हद तक बढ़ चुकी है, लेकिन कांग्रेस है कि मानती नहीं है और राम मंदिर के निर्माण में बाधा बनी हुई है।

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राष्ट्रगान के मामले पर विरोध
आजादी के 70वीं वर्षगांठ में जब यूपी सरकार ने सरकार से अनुदानित सभी संस्थाओं में राष्ट्रगान को अनिवार्य किया तो कांग्रेस ने इसका विरोध किया, लेकिन कांग्रेस के विरोध के पीछे उसकी तुष्टिकरण की राजनीति थी। दरअसल इस दायरे में वे मदरसे भी आ गए जो सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त करते हैं। सरकार का यह आदेश समाज के हर तबके में राष्ट्रप्रेम जागृत करने के उद्देश्य से किए गए थे। कांग्रेस ने यहां भी राजनीति खोज ली। कांग्रेस की राजनीति तो कोर्ट के उस आदेश पर भी निकल कर आई जिसमें सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया गया था।

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वंदे मातरम का विरोध
आजादी के बाद यह तय था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया और कहा कि वंदे मातरम से मुसलमानों के दिल को ठेस पहुंचेगी। जबकि इससे पहले तक तमाम मुस्लिम नेता वंदे मातरम गाते थे। नेहरू ने ये रुख लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों को शह दे दी। जिसका नतीजा देश आज भी भुगत रहा है। आज तो स्थिति यह है कि वंदेमातरम को जगह-जगह अपमानित करने की कोशिश होती है। जहां भी इसका गायन होता है कट्टरपंथी मुसलमान बड़ी शान से बायकॉट करते हैं।

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कश्मीर में आतंकियों पर कार्रवाई का विरोध
”कश्मीर के लोग जब ‘आजादी’ की मांग करते हैं तो इसका मतलब और अधिक ‘स्वायत्तता’ है।’‘…कांग्रेस के पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम के इस बयान ने शांत होते कश्मीर को एक बार फिर सुलगा दिया है। पी चिदंबरम के इस बयान से साफ है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकियों की मांग को समर्थन कर रही है। स्पष्ट है कि भारत से अलग होने और पाकिस्तान में मिलने की ख्वाहिश रखने वालों को पी चिदंबरम एक बार फिर से उकसा रहे हैं। आजादी मांग रहे लोगों के साथ स्वर मिला रहे हैं। दरअसल कांग्रेस इस हद तक गिर चुकी है कि उसे सत्ता में वापसी का कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। ऐसे में केंद्र सरकार की कोशिशों को विफल करना ही कांग्रेस का एक मात्र उद्देश्य लगता है। बीते दिनों संदीप दीक्षित ने आर्मी चीफ को भी गली का गुंडा तक कह दिया था, वहीं कई कांग्रेसी नेता आर्मी को रेपिस्ट बताती रही है। 

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डोकलाम मामले पर सरकार के स्टैंड का विरोध
भारत-चीन के बीच 73 दिनों तक सिक्किम से सटे डोकलाम क्षेत्र जबर्दस्त तनातनी का माहौल रहा। इस कूटनीतिक और सैन्य तनाव पर दुनिया भर की नजरें गड़ी थीं। ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जिन हालातों में चोरी-छिपे भारत में मौजूद चीन के राजदूत लिओ झाओहुई से मिलने पहुंच गए उसने सारे देश को हैरान कर दिया। इन हालातों में राहुल के चीनी राजदूत से मुलाकात करना कई तरह के सवाल खड़े कर गए। कांग्रेस पार्टी पर वो भले ही माई-बाप बनकर शासन करते हैं, लेकिन उनकी सियासी और कूटनीतिक समझ पर अभी देश का भरोसा नहीं जम पाया है। अगर राहुल और अन्य कांग्रेसी नेताओं के मन में कुछ भी गलत नहीं था तो उनकी पार्टी को पहले इस मुलाकात पर झूठ क्यों बोलना पड़ा ? राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन देश को धोखा देकर दुश्मन देश से गोपनीय बातें करना कई आशंकाओं को जन्म देती हैं।

चीनी राजदूत से मिले राहुल के लिए चित्र परिणाम

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