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बेरहम ममता की सरपरस्ती में बंगाल को टीएमसी बना रही है कत्लगाह, एक और भाजपा कार्यकर्ता की हत्या

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पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जनाधार खिसक रहा है। अपना जनाधार बचाए रखने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के गुंडों के बल पर राज्य में भय का माहौल बनाए रखने के लिए प्रदेश को कत्लगाह बनाने पर तुली हुई हैं। राजनीतिक विरोध के चलते एक के बाद एक भाजपा व अन्य पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्या टीएमसी के गुंडे कर रहे हैं और राज्य में खुलेआम घूम रहे हैं। राज्य की पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। आज फिर एक भाजपा के कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी गई।

घटना 24 परगना जिले की है। यहां मंदिर बाजार के पास घात लगाए कुछ लोगों ने भाजपा के मंडल सचिव शक्तिपद सरदार पर धारदार हथियार से हमला कर दिया। अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई। भाजपा कार्यकर्ताओं ने बताया कि सरदार की हत्या के पीछे टीएमसी का हाथ है।

इससे पहले भी बंगला में ममता राज में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। इन हत्याओं के पीछे भी टीएमसी का ही नाम आया है। टीएमसी के गुंडे बंगाल की जनता को डरा-धमकाकर गुलाम बनाए रखना चाहती है। खूनी घटनाओं पर एक नजर – 

पुरुलिया में टीएमसी के गुंडों ने की पिता-पुत्र की हत्या
‘’भाजपा के ओबीसी कार्यकर्ता 27 साल के दीपक महतो और उनके पिता 52 वर्षीय लालमन महतो की टीएमसी के लोगों ने हत्या कर दी।”  ये आरोप पश्चिम बंगाल भाजपा के महासचिव सायंतन बासु ने लगाए हैं।  दरअसल मारे गए दोनों व्यक्ति पुरुलिया मंडल समिति के प्रभावी कार्यकर्ता थे और वे चावल वितरण में तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे थे। आरोप है कि इसी के चलते उनकी निर्मम हत्या की गई। हालांकि पुलिस इस मामले की भी लीपापोती करने में लग गई है।

ममता और वाम दलों के शासन का खूनी इतिहास
बंगाल में राजनीतिक झड़पों का एक लंबा और रक्तरंजित इतिहास रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। 2015 में राजनीतिक झड़प की कुल 131 घटनाएं दर्ज की गई थीं और 184 लोग इसके शिकार हुए थे। वर्ष 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों की हत्या हुई थी, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। 1997 में बुद्धदेब भट्टाचार्य ने विधानसभा मे जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में 28,000 लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गये थे। 

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