Home केजरीवाल विशेष मोदी विरोधी राजनीति की खुराक बन रही हैं संवैधानिक संस्थाएं

मोदी विरोधी राजनीति की खुराक बन रही हैं संवैधानिक संस्थाएं

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देश में पिछले तीन साल से विपक्ष और कुछ मीडिया के मुट्ठीभर लोग जिस तरह से संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। अगर आपके पास ठोस आधार है तो आलोचना करने का सबके पास लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अपने निहित स्वार्थ सिद्धि के लिए संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने का कुचक्र रचा जाय। ये स्थिति मार्च में आए पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद तो और भी ज्यादा भयानक हो गई है। कुछ विपक्षी पार्टियों ने अपनी हार छिपाने के लिए चुनाव आयोग को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। ये स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत ही अधिक घातक है। किसी भी बात की एक हद होती है। शायद यही वजह है कि अब अदालत को दखल देकर सियासी दलों, एजेंडा चलाने वाले एनडीओ और मीडिया के लोगों को संवैधानिक संस्थाओं की छवि बिगाड़ने से बाज आने की चेतावनी देनी पड़ी है।

संवैधानिक संस्थाओं की छवि बिगाड़ने से बाज आएं- हाईकोर्ट
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद हताशा में आकर देश में जो माहौल बनाने की कोशिश की गई, उसपर अब अदालत को दखल देनी पड़ी है। EVM में गड़बड़ी के बहाने जिस तरह से हाल में चुनाव आयोग को संदेह के घेरे में लाने का कुटिल प्रयास हुआ है, उससे अदालत भी बहुत आहत है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों, व्यक्तियों, एनजीओ और सभी तरह की मीडिया पर EVM के मुद्दे पर चुनाव आयोग की आलोचना पर रोक लगा दी है। अदालत ने कहा है कि, चुनाव आयोग ने सफलतापूर्वक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का आयोजन कराया है। इसीलिए राजनीतिक पार्टियों को एक संवैधानिक संस्था की छवि बिगाड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती। चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। कोर्ट की जिम्मेदारी है कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बनाए रखे और बे-सिर पैर की आलोचनाओं से उसे बचाया जाए। अगर इसे छोड़ दिया गया तो लोकतंत्र का आधार ही कमजोर हो जाएगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब ये नहीं कि बेवजह किसी भी संवैधानिक संस्था की आलोचना की इजाजत दे दी जाए। कोर्ट ने कहा है कि चुनावों के सफल आयोजनों के बाद भी चुनाव आयोग को नकारात्मक अटकलों का विषय बना दिया गया है।

जनता से मिली हार, तो EVM से ठानी राड़
EVM एक मशीन है, तकनीकी वजहों से उसमें खराबी आ सकती है। लेकिन, यूपी चुनाव में मतदाताओं ने जब बीएसपी सुप्रीमो मायावती के सपनों को चकनाचूर कर दिया तो उन्होंने ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ वाली अंदाज में EVM पर दोषारोपण करना शुरू कर दिया। जिस EVM के माध्यम से जीत कर उन्होंने 2007 से 12 तक यूपी पर राज किया था, अचानक उन्हें सारी के सारी EVM में गड़बड़ी नजर आने लगी। कहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा। दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री ने दिल्ली की जनता का बेड़ा गर्क कर पंजाब और गोवा में भी लोगों को गुमराह कर सत्ता हथियाने सपना देखा था। लेकिन, जब मतदाताओं ने रिजेक्ट किया तो उन्हें भी EVM पर दोषारोपण करके झेंप मिटाने का बहाना मिल गया। यहां तक की केजरीवाल की पार्टी ने चुनाव आयोग के सामने इस मसले पर प्रदर्शन करने से भी परहेज नहीं किया। फिर क्या था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चट्टान की तरह मजबूत लोकप्रियता से घबराईं लगभग सभी विपक्षी पार्टियों की EVM पर सवाल उठाने की लाइन लग गई। क्या कांग्रेस और क्या समाजवादी पार्टी सबको अचानक अपनी हार में EVM का दोष नजर आने लगा। मोदी विरोध के नाम पर कांग्रेस ये तक भूल गई कि उसी EVM के माध्यम से पंजाब के मतदाताओं ने उसे भारी बहुमत दिलाई है।

AAP ने EC की खिल्ली उड़ाई
अपनी ओर से जांच-पड़ताल करने के बाद चुनाव आयोग ने बार-बार कहा कि EVM को हैक करना संभव नहीं है। लेकिन अराजकता के पैरोकार केजरीवाल ने चुनाव आयोग की एक न सुनी। उनके इशारे पर दिल्ली विधानसभा के अंदर संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं। AAP के स्वयंभू वैज्ञानिक विधायक सौरभ भारद्वाज ने घंटों सदन के अंदर एक फर्जी EVM को हैक करने का नायक किया। नकारात्मक गतिविधियों में अपने ज्ञान के बल पर एक तरह से आम आदमी पार्टी ने विधानसभा के अंदर चुनाव आयोग के प्रतिनिधि की गैर मौजूदगी में उसका मजाक उड़ाने की कोशिश की।

EC के बुलाने पर नहीं आए
कमाल देखिए कि जब चुनाव आयोग ने सियासी पार्टियों को EVM को हैक करके दिखाने की चुनौती दी तो न ही AAP पहुंची और न ही बीएसपी। यही नहीं जिन-जिन पार्टियों ने EVM के हैक किए जाने का आरोप लगाया था, उनमें से कोई नहीं पहुंचा। सिर्फ एनसीपी और सीपीएम ने ही चुनाव आयोग के निमंत्रण को स्वीकार किया। सवाल है कि EVM की तकनीक पर सबसे ज्यादा हो-हल्ला करने वाली आम आदमी पार्टी का मकसद क्या है ? उसने चुनाव आयोग के हैकॉथन में पहुंचने से इनकार तो कर ही दिया, बल्कि उसके जवाब में एकबार फिर से अपना हैकॉथन करने का भी एलान कर दिया। शायद इसी तरह की ढिठई की वजहों से उत्तराखंड हाईकोर्ट को इतना सख्त आदेश देना पड़ा है। हालांकि इसके बावजूद भी AAP की हेकड़ी कायम है और उसने EVM को चुनौती देने के लिए न सिर्फ सबको निमंत्रित किया है बल्कि सोशल मीडिया पर एक लिंक भी शेयर किया है।

AAP ने विधानसभा का बनाया मखौल
70 साल के लोकतंत्र के इतिहास में देश की संसद और विधानसभाओं में कई बार अप्रिय घटनाएं घटी हैं। लेकिन, पिछले ढाई साल में दिल्ली विधानसभा को जिस तरह से संचालित किया गया है अब उसपर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। माना कि यहां सत्ताधारी पार्टी के पास भारी बहुमत है। लेकिन क्या इससे संविधान उन्हें सदन के अंदर कुछ भी करने की इजाजत देता है? जैसे-केजरीवाल सरकार ने जिस तरह से एक दिन का विशेष सत्र बुनाकर फर्जी EVM का नाटक दिखाया, वो उचित था ? क्या सदन के अंदर एक फर्जी मशीन (जिसकी विश्वसनीयता तय नहीं है) ले जाने की प्रक्रिया पूरी की गई ? क्या सिर्फ अपना एजेंडा चलाने के लिए (लाइव प्रसारण दिखाकर) जनता की गाढ़ी कमाई को उड़ाने की इजाजत संविधान ने दी है? यही नहीं, जिस तरह से सदन में केजरीवाल सरकार के ही एक पूर्व मंत्री की पिटाई की गई और फिर स्पीकर ने अपनी मनमर्जी चलाते हुए पीड़ित को ही मार्शल से बाहर करवा दिया, ये लोकतंत्र का मखौल नहीं है?

सियासी वजहों से संविधान से खिलवाड़
अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने या भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विवादित स्टैंड्स को समझा जा सकता है। लेकिन, क्या इसके लिए संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखने की अनुमति दी सकती है ? ताजा मामला ही देखिए, GST बिल को संसद और राज्य विधानसभाओं से पास कराया जा चुका है। उसे लागू होने में एक महीने से भी कम समय बचा है। दुनियाभर में इसका इंतजार हो रहा है। ऐसे में ममता ने ये कह दिया है कि मौजूदा स्थिति में वो GST को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। देश के संघीय ढांचे से खिलवाड़ करने की उनकी सोच का ये एकमात्र उदाहरण नहीं है। केंद्रीय योजनाओं का नाम बदलने का मामला हो या लाल बत्ती बैन की बात, पश्चिम बंगाल सरकार ने हर बात में अड़ंगा लगाने की कोशिश की है। अकेले पश्चिम बंगाल में ही नहीं, कर्नाटक और बिहार में भी कुछ ऐसे मामले सामने आए जिसमें लगा कि राज्य सरकारें केंद्र के फैसले को सिर्फ राजनीतिक विरोध के चलते खारिज करने पर तुली हैं। हत्या के इरादे से पशुओं की खरीद-बिक्री पर केंद्र की ओर से लगाई रोक के निर्णय को ही देख लीजिए। केरल, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक जैसी सरकारों ने बिना उसके बारे में विस्तार से जाने उसे नहीं मानने का एलान कर दिया है। अगर, केंद्र के निर्णय से कोई दिक्कत है, तो उनके पास अदालत में जाने का भी विकल्प है। लेकिन यहां तो विरोध करना है, चाहे उससे देश की शान में जितना भी बट्टा लग जाए।

अदालत पर भी उठाया सवाल
दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी हाईकोर्ट के फैसले को भी जन-विरोधी बता चुकी है। दरअसल 4 अगस्त, 2016 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि उपराज्यपाल केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं और राज्य के प्रशासन में सरकार के निर्णय में उनकी सहमति आवश्यक है। इस निर्णय पर केजरीवाल की पार्टी ने कहा कि, हाईकोर्ट का फैसला जन-विरोधी है। खुद दिल्ली के उप मुख्यमंत्री ने अदालत के फैसले पर ये टिप्पणी की, कि हम भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं, इसीलिए हमारी सरकार को निशाना बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में आलोचनाओं का अधिकार है, लेकिन तब, जब उसमें दुर्भावना न हो। लेकिन सत्ता के नशे में चूर आम आदमी पार्टी ने कोर्ट की मर्यादा तोड़ने में भी देर नहीं लगाई।

गणतंत्र दिवस का किया बहिष्कार
क्या आप गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की बात सोच सकते हैं? नहीं ना? ऐसा वही सोच सकते हैं जिन्हें भारतीय लोकतंत्र और संविधान में भरोसा नहीं है। जैसे- आतंकवादी या नक्सलवादी। लेकिन आपकी सोच गलत है। ऐसा खुद को अराजकतावादी कहने वाले अरविंद केजरीवाल भी करते आए हैं। जब वो पहली बार सीएम बने तो उन्होंने कहा था कि 26 जनवरी का उत्सव संसाधनों की बर्बादी है। जो इंसान मुख्यमंत्री रहते संविधान दिवस तक की परवाह नहीं करे, वो वाकई अराजकतावादी ही हो सकता है। यही नहीं, एक तरफ गणतंत्र दिवस की तैयारियां चल रही थीं और दूसरी ओर दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते वो धरने पर बैठे हुए थे।

संसद की मर्यादाओं का भी नहीं रखा ख्याल
जब से केंद्र में पीएम मोदी की सरकार बनी है, खासकर कांग्रेस ने राज्यसभा की कार्यवाही को जिस तरीके से बाधित किया है उसपर काफी सवाल उठ चुके हैं। लोकतंत्र में सियासी पार्टी को सदन की कार्यवाही में भाग लेने का, बहस करने का या वॉकआउट करने का अधिकार है। लेकिन जिस तरह से सरकार के अहम बिलों को रोकने के लिए कांग्रेस ने मनमानी की है, उसके उदाहरण देखने को नहीं मिलते। अगर कोई विधेयक का विरोध करना चाहते हैं तो करें, आपके पास अधिकार है, लेकिन संख्याबल के आधार पर संसद की कार्यवाही को मनमर्जी से चलाने के लिए मजबूर करना कहां तक उचित है ? लेकिन कांग्रेस और उसकी पिच्छलग्गू पार्टियों ने मोदी जी के विरोध के नाम बार-बार ये आचरण दोहराया है। यहां तक की राष्ट्रपति ने भी कई बार विपक्ष को इस हरकत के लिए लताड़ा, लेकिन उसे हर बार अनसुना कर दिया गया। इतने विशाल देश में कुछ निहित स्वार्थी तत्वों के चलते लोकतंत्र और संविधान को खतरे में नहीं डाला जा सकता, इसीलिए समय आ गया है कि एक लक्ष्मण रेखा खींच दी जाय और उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश एक शुभ संकेत की तरह है।

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