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मंत्रालयों को लेकर कांग्रेस-जेडीएस की मारामारी के बीच कर्नाटक में 10 किसानों ने दी जान!

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कर्नाटक में वही हो रहा है जिसकी आशंका जताई जा रही थी। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार बने हुए एक हफ्ता हो गया है, लेकिन वहां अभी तक सरकार नाम की कोई चीज दिखाई नहीं दे रही है। दोनों ही दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान किसानों की बेहतरी के कई बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन अभी तक इस सरकार ने किसानों को राहत पहुंचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। नतीजतन राज्य में दो दिनों के भीतर कर्ज में डूबे 10 किसानों ने खुदकुशी कर ली है। जाहिर है कि मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पहले ही जता चुके हैं कि वह मजबूर सीएम हैं और कांग्रेस के ऐहसान तले दबे हुए हैं। यानि वो अपनी मर्जी से एक भी फैसला नहीं ले सकते हैं। हफ्तेभर बाद भी अभी तक यही तय नहीं हो पाया है कि कौन सा मंत्रालय किस पार्टी के पास रहेगा। सीएम कुमारस्वामी दो-दो बार दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान के यहां हाजिरी लगा चुके हैं, लेकिन कोई फैसला नहीं हो सका है। इसका खामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है। कर्नाटक में सरकारी महकमे में इन दिनों असमंजस की स्थिति है, कोई भी नीतिगत फैसला नहीं हो पा रहा है।

कांग्रेस को कभी नहीं रही किसानों की चिंता
जेडीएस और कांग्रेस की सरकार गठन से पहले पांच वर्षों तक सिद्धारमैया के नेतृत्व में यहां कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। इन पांच वर्षों में राज्य में किसानों की क्या दुर्दशा थी यह किसी से छिपी नहीं है। सिद्धारमैया राज्य में किसान कल्याण के तमाम दावे करते रहे और कहते रहे कि उनकी सरकार ने ‘कृषि भाग्य’ जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों के हित में काफी काम किए हैं, लेकिन सच्चाई इसके उलट थी। पांच वर्षों के सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल में किसानों की हालत बद से बदतर हुई। सूखे की मार और कर्ज में डूबे किसानों ने बड़ी संख्या में खुदकुशी की है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि किसानों की इतनी दुर्दशा के बाद भी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पांच वर्षों तक ऐशोआराम में जीते रहे और जनता की गाढ़ी कमाई जरूरतमंदों पर खर्च करने के बजाए अपनी शानोशौकत में उड़ाते रहे।

एक नजर डालते हैं कर्नाटक में पूर्व की कांग्रेस सरकार के किसान विरोधी कारनामों पर

कर्नाटक में आत्महत्या को मजबूर किसान
पिछले पांच वर्षों  में कर्नाटक के किसानों की माली हालत सिद्धारमैया के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। कर्नाटक के किसानों द्वारा आत्महत्या के आंकड़ों में बढ़ोतरी इस बात की गवाह है कि कांग्रेस सरकार ने राज्य के किसानों के लिए कुछ भी नहीं किया। राज्य के कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक में अप्रैल 2013 से नवंबर 2017 के बीच 3,515 किसानों ने खुदकुशी की। इनमें से 2,525 मामलों में किसानों ने सूखा और फसल के उचित दाम नहीं मिलने के चलते आत्महत्या की।

लोकसभा में किसानों की आत्महत्या से जुड़े एक सवाल के जवाब में कर्नाटक में 2013 से 2016 के बीच खुदकुशी के जो आंकड़े बताए गए थे, उनके मुताबिक कर्नाटक में खेती-किसानी से जुड़े करीब 6 हजार लोगों ने खुदकुशी की थी।

              कर्नाटक में किसानों की खुदकुशी
वर्ष आत्महत्या करने वाले किसान
2013 1403
2014 768
2015 1569
2016 2079
स्रोत- लोकसभा में दिया गया जवाब

 

             2016 में किसानों की खुदकुशी
राज्य आत्महत्या करने वाले किसान
कर्नाटक 2079
आंध्र प्रदेश 804
तेलंगाना 645
तमिलनाडु 381
स्रोत- लोकसभा में दिया गया जवाब

उपरोक्त आंकड़ों से साफ है कि यदि 2014 को छोड़ दें तो कर्नाटक में किसानों की खुदकुशी के मामले साल दर साल बढ़ते गए। किसानों की खुदकुशी के लिए सिर्फ बारिश की कमी और सूखे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा इसलिए, क्यों कि दक्षिण भारत में कर्नाटक के पड़ोसी राज्यों में किसानों की खुदकुशी की संख्या बेहद कम थी, जबकि इन राज्यों में भी मौसम का हाल कमोबेश कर्नाटक की तरह ही रहता है।

कर्नाटक में कृषि सेक्टर की ग्रोथ कम हुई
कर्नाटक में खेती-किसानी को लेकर सिद्धारमैया सरकार के लचर रवैये के कारण कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों की वृद्धि नहीं हो सकी। 2017-18 के कर्नाटक के इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत रही, जबकि 2016-17 में यह 5.7 प्रतिशत थी। बताया गया कि कर्नाटक सरकार की नीतियों की वजह से ही वहां के किसान ने तूर और धान के रकबे में कमी कर दी थी। 2016-17 में जहां 3 लाख हैक्टेयर में खरीफ की फसल की बुआई हुई थी वहीं 2017-18 में यह घटकर करीब 2 लाख हैक्टेयर ही रह गया।

कृषि सुधार में भी कर्नाटक फिसड्डी
2016 में नीति आयोग ने “Agricultural Marketing and Farmer Friendly Reforms Index” जारी किया था, जिसमें कृषि बाजार सुधार, लैंड लीज सुधार और निजी भूमि पर वन लगाने से जुड़े सुधारों पर फोकस किया गया था। इस सूची में जहां महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान पहले तीन स्थानों पर थे वहीं कर्नाटक का नंबर आठवां था।

किसान कर्जमाफी के नाम पर दिखावा
मुख्यमंत्री रहते हुए सिद्धारमैया ने 2017 में किसानों के लिए 8,165 करोड़ की कर्जमाफी का ऐलान किया था, लेकिन इसमें शर्त थी कि उन्हीं किसानों की कर्जमाफी की जाएगी, जिन्होंने सहकारी बैंकों से फसलों के लिए कर्ज लिया था। अब आपको बताते हैं किस तरह सिद्धारमैया ने किसान कर्जमाफी के नाम पर सिर्फ दिखावा किया है। महाराष्ट्र ने किसान कर्जमाफी के लिए 30,500 करोड़ रुपये का ऐलान किया है, इससे 30 लाख किसानों को फायदा हुआ। वहीं उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने 36,359 करोड़ की कर्जामाफी का ऐलान किया है, इससे 80 लाख से अधिक किसानों को फायदा होगा। मतलब साफ है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के दौरान किसानों की हालत बद से बदतर हुई। 

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