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‘मन की बात’ कार्यक्रम की लोकप्रियता चरम पर

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तथ्य अगर तार्किक हो तो लोगों की जुबां पर चढ़ ही जाता है क्योंकि आंकड़ों के साथ पेश किए गए तर्क को झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन कुतर्क के लिए आंकड़ों की जरूरत नहीं होती। ऊपर से जब आधे-अधूरे आंकड़ों के साथ कुतर्क किया जाए और कोई बड़ा मीडिया घराना भी जांचे-परखे लेख छापने लगे तो फिर इसमें एक साजिश नजर आती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम पर इकॉनामिक टाइम्स में छपा एक लेख इसी ओर इशारा करता है। तथाकथित बुद्धिजीवी और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय (जो मोदी पर किताब लिखने का भी दावा करते हैं) ने अपने लेख में ये बताने कि कोशिश की है कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम की लोकप्रियता में कमी आई है और ये नीरस होता जा रहा हैं।

 

इस लेख को पढ़ने के बाद हमने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम की लोकप्रियता को टटोलने की कोशिश की। सूत्रों से संपर्क साधा और जो आंकड़े मिले, वो चौंकाने वाले रहे। इससे पता चलता है कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम की लोकप्रियता चरम पर है। इस कार्यक्रम से जुड़े चार तरह के आंकड़ें हैं। पहला इनपुट, दूसरा, आउटपुट, तीसरा मिस्ड कॉल और चौथा सोशल मीडिया। इसे मिलाकर हर महीने 2-3 लाख लोग मन की बात कार्यक्रम से सीधे जुड़ते हैं। जबकि सोशल मीडिया के जरिये इसकी संख्या अनगिनत हो जाती है। अब आप भी आंकड़े देखिए –

पहला- इनपुट यानी प्रसारण से पहले लोगों का जुड़ाव

*आकाशवाणी के दफ्तर में करीब 10 हजार से ज्यादा चिट्ठियां आती हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में भी 10 हजार से ज्यादा चिट्ठियों के जरिये सुझाव आता है। कुल मिलाकर एक मन की बात कार्यक्रम के लिए औसतन 25 हजार लोगों की चिट्ठियां आती हैं।

*सूत्रों के मुताबिक हर महीने 25 हजार लोग मन की बात कार्यक्रम के लिए अपने सुझाव फोन करके रिकॉर्ड करवाते हैं।

*नरेंद्र मोदी एप पर औसतन 5 हजार लोगों के कमेंट आते हैं।

*इस बार संदेश टू सोल्जर्स मुहिम से लाखों लोग जुड़े हैं। इसमें देश के हर क्षेत्र मसलन बॉलीवुड और क्रिकेट से लेकर हर क्षेत्र की हस्तियां जुड़ी हैं। लाखों लोगों ने सेना को ग्रीटिंग्स कार्ड भेजे। शायद ये चीजें नीलांजन और अखबार को दिखाई नहीं दीं।

दूसरा- आउटपुट यानी जब मन की बात का प्रसारण होता है

*रेडियो और दूरदर्शन पर इसका प्रसारण होता है। जिसकी पहुंच देश के सभी न्यूज चैनलों और अखबारों को मिलाकर भी देश में सबसे ज्यादा है।

*सभी एफएम चैनलों पर इसका प्रसारण होता है।

*दूरदर्शन के रीजनल चैनलों पर भी इसका प्रसारण होता है। कार्यक्रम की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मन की बात’ कार्यक्रम 30 भाषाओं और बोलियों में अनुवादित और प्रसारित होता है।

*सारे निजी चैनल भी मन की बात कार्यक्रम का प्रसारण करते हैं।

*नरेंद्र मोदी एप के जरिये औसतन 25 हजार लोग कार्यक्रम को सुनते हैं।

तीसरा- मिस्ड कॉल यानी कार्यक्रम खत्म होने के बाद सुनना

*तथाकथित लेखक और अखबार को शायद ये जानकारी नहीं है कि जो लोग ‘मन की बात’ लाइव सुन नहीं पाते, वो मिस्ड कॉल करके अपने मोबाइल पर सुनते हैं। अब तक 4.5 करोड़ लोग इसे अपने मोबाइल पर सुन चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक सिर्फ अगस्त महीने में ही करीब 80 लाख लोगों ने मन की बात कार्यक्रम को मिस्ड कॉल करके अपने मोबाइल पर सुना।

*एक बात और, जो लोग मिस्ड कॉल करके मन की बात कार्यक्रम को सुनते हैं, वो औसतन 17 मिनट तक प्रधानमंत्री को सुनते हैं, जबकि एक भारतीय द्वारा फोन पर की गई बातचीत के औसत समय से काफी ज्यादा है। कार्यक्रम की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है।

चौथा- सोशल मीडिया

*लेखक महोदय और अखबार दोनों सोशल मीडिया पर जाकर देख सकते हैं कि कैसे ‘मन की बात’ कार्यक्रम की लोकप्रियता ने राजनीतिक शख्सियतों द्वारा दिए गए भाषणों के अब तक के सारे रिकॉर्ड धाराशायी कर दिए हैं। लाखों-करोड़ों लोगों ने भी सोशल मीडिया के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी सहभागिता दर्शायी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बहुत-बहुत आभार

मनगढ़ंत लेख लिखने वाले नीलांजन ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में विषय में कुछ टॉपिक की पुनरावत्ति को नीरसता का नाम दे दिया। अब हम बताते हैं वो टॉपिक कौन से हैं जो प्रधानमंत्री हर बार ‘मन की बात’ में करते हैं। पहला टॉपिक है स्वच्छता अभियान और दूसरा टॉपिक है देश की सेना। ‘मन की बात’ ही नहीं, चाहे कोई भी मौका हो।

प्रधानमंत्री स्वच्छता और सेना की बात करना नहीं भूलते। अगर आपको ध्यान हो तो शुरू के समय में न्यूज चैनल हर बार मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में विवाद का मौका ढूंढ़ते थे। और बार बार ये आरोप लगाते थे कि मोदी ने असहिष्णुता, आतंकवाद या दूसरे विवादित मुद्दों पर नहीं बोला। हमें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार प्रकट करना चाहिए कि 25 एपिसोड बीतने के बाद भी उन्होंने मन की बात में कभी कोई विवादित बात नहीं की, जबकि अगर वो चाहते तो राजनीतिक फायदा ले सकते थे। मोदी को इस बात का क्रेडिट देना होगा कि उन्होंने जनता की शक्ति का जागृत करने का काम किया।

तथाकथित लेखक नीलांजन की नीयत में खोट

नीलांजन का परिचय ये है कि इन्होंने नरेंद्र मोदी पर किताब लिखी है और जानकारी के मुताबिक चुनाव के बाद ये सरकार से फायदा चाहते थे। लेकिन इन्हें जब कोई फायदा नहीं मिला। तो फिर मोदी के खिलाफ लेख लिखना शुरू किया। यही नहीं इन्होंने पंजाब चुनाव को देखते हुए ‘सिख’ किताब लिखी।

इस किताब को आम आदमी पार्टी के नेताओं ने ट्विटर पर जमकर प्रमोशन किया। माना जा रहा है कि नीलांजन अपने पॉलिटिकल कैरियर बनाने के लिए केजरीवाल और उनकी पार्टी के करीबी हो गए हैं। नीलांजन ने ‘मन की बात’ पर तो निशाना साधा, लेकिन क्या केजरीवाल के कार्यक्रम टॉक टू AK की बात की, जो एक ही बार में खत्म हो गया। इस कार्यक्रम पर दिल्ली सरकार ने करोड़ों रुपये प्रमोशन में खर्च किए थे, लेकिन नीलांजन की नीयत तो कुछ और है। एक सच ये भी है कि सरकार ‘मन की बात’ कार्यक्रम के प्रमोशन में एक भी पैसा खर्च नहीं करती। माना जाता है कि खुद प्रधानमंत्री भी ऐसा नहीं चाहते।

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