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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के घोर विरोधी थे नेहरू, किसी भी सूरत में पसंद नहीं थी आलोचना

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देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का नाम लेते ही मन में एक लोकतांत्रिक, आधुनिक और सहिष्णु व्यक्ति की छवि उभरती है। क्या यह छवि नेहरू का वास्तविक व्यक्तित्व है या पिछले कई दशकों से कांग्रेस द्वारा प्रचारित की जा रही सूचनाओं और खबरों का परिणाम है। पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू का असली रूप देखने के लिए इतिहास की बंद उन किताबों के पन्नों को खोलना होगा, जिसे कांग्रेस पार्टी ने जनता के सामने कभी आने नहीं दिया।

पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के व्यक्तित्व को समझने के लिए यह जरूरी है कि उनके उन रिश्तों को समझा जाए जो तत्कालीन प्रेस, सिनेमा, थिएटर और कांग्रेस के अन्य नेताओं जैसे सरदार बल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद आदि से रहे। 

नेहरू ने गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को एक साल के लिए जेल भेजा 
आजादी के बाद, बॉम्बे में श्रमिकों का आंदोलन चल रहा था। आंदोलन में श्रमिकों का साथ गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी भी दे रहे थे। श्रमिकों की बॉम्बे में हुई एक रैली के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू की आलोचना करते हुए एक गीत पढ़ा-

अमन का झंडा इस धरती पे,
किसने कहा लहराने न पाये,
ये भी कोई हिटलर का है चेला,
मार ले साथी, जाने न पाये,
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरु,
मार ले साथी जाने न पाये।

इस गीत से नेहरू का गुस्सा होना स्वाभाविक था और बॉम्बे राज्य की सरकार ने मजरूह के खिलाफ गिरफ्तारी का वांरट जारी कर दिया, लेकिन मजरूह भूमिगत हो गए। बहुत दिनों तक भूमिगत रहने के बाद 1951 में साम्यवादी लेखक साजिद जहीर और फैज अहमद फैज को रावलपिंडी केस में जेल भेजने के विरोध में हो रही रैली को संबोधित करने के लिए आए। मंच से रैली को संबोधित करके मजरूह जैसे ही नीचे उतरे, उनको पुलिस ने गिरफ्तार करके आर्थर रोड जेल में कैद कर दिया। मजरूह सुल्तानपुरी को नेहरू के खिलाफ बोलने के लिए एक साल तक जेल में रहना पड़ा।

नेहरू ने नवयुग के संपादक आचार्य अत्रे को जेल भेजा
महाराष्ट्र राज्य के निर्माण और बॉम्बे को राज्य की राजधानी बनाये जाने पर समाज में बहस चरम पर थी। नवंबर 1955 में बॉम्बे की चौपाटी की एक रैली को बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एस के पाटिल संबोधित कर रहे थे। पाटिल ने रैली में कहा कि जब तक सूरज, चांद हैं तब तक महाराष्ट्र की राजधानी बॉम्बे नहीं हो सकती है। नवयुग समाचार पत्र के संपादक आचार्य आत्रे बॉम्बे को महाराष्ट्र की राजधानी बनाना चाहते थे। पाटिल के इस बयान से आत्रे ने गुस्से में नवयुग में लेख लिखा जिसका शीर्षक था- जनतेचा कसाई, मोरारजी देसाई। इस लेख पर उन्हें 26 जनवरी 1956 को गिरफ्तार कर आर्थर रोड जेल भेज दिया गया। आत्रे, गिरफ्तारी के बावजूद भी नहीं झुके और जेल से ही अपना संपादकीय लिखते रहे।

नेहरू ने बलराज साहनी के नाटक ‘जादू की कुर्सी’ पर पाबंदी लगायी
 1948 में बलराज साहनी ने ‘जादू की कुर्सी’ नाटक लिखा, जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू के व्यक्तित्व और नीतियों का जमकर मजाक उड़ाया गया था। इस नाटक पर नेहरू ने पाबंदी लगा दी थी।

नेहरू ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर बनी फिल्म नास्तिक पर पाबंदी लगाई
1954 में आई एस जौहर ने भारत पाकिस्तान के बंटवारे पर फिल्म, नास्तिक बनाई। इस फिल्म पर भी प्रधानमंत्री नेहरू की सरकार ने पाबंदी लगा दी। इसमें एक ऐसे युवक की कहानी थी, जो बंटवारे के दंगों को देखकर नास्तिक बन जाता है और फिर उसके जीवन में क्या कुछ होता है उसे दर्शाया गया था। इस फिल्म पर पाबंदी 1960 तक रही।

नेहरू ने अजीज बेग की किताब Captive Kashmir पर पाबंदी लगाई
प्रधानमंत्री नेहरू अपनी नीतियों का विरोध बर्दाश्त नहीं करते थे। अजीज बेग ने कश्मीर पर एक किताब लिखी -Captive Kashmir- जिसे नेहरू ने स्वंय पढ़ा और पढ़ने के बाद 19 अप्रैल 1958 को इस किताब पर पाबंदी लगा दी।

नेहरू ने 1962 के युद्ध पर बनी फिल्म ‘भूल न जाना’ को बैन किया 
1963 में भारत चीन युद्ध पर बनी फिल्म ‘भूल न जाना’ पर पाबंदी लगा दी गई थी। फिल्म और फिल्म के गीतों से नेहरू को लगा कि उनकी नीतियों की देश में आलोचना बढ़ जाएगी। फिल्म के गीत-बही है वहां खून की धारा, उठो हिंद की सरजमीं ने पुकारा है– से नेहरू को भय लगने लगा था।

नेहरू ने महात्मा गांधी पर बनी फिल्म पर पाबंदी लगाई
1962 में हॉलीवुड के मार्क रॉबसन ने महात्मा गांधी की मृत्यु से पहले के कुछ घंटों पर लिखी गई किताब Nine hours to Rama पर फिल्म बनाई। इस किताब को Stanley Wolpert ने लिखा था। इसमें महात्मा गांधी की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए गए थे और महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे की मानसिकता को समझने का प्रयास किया गया था। प्रधानमंत्री नेहरू ने पुस्तक और फिल्म दोनों पर ही पाबंदी लगा दी।

नेहरू ने दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल की किताब Unarmed Victory पर पाबंदी लगाई
1962 में चीन से हुए युद्ध में हार की अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए, प्रधानमंत्री नेहरू ने 1963 में ब्रिटेन के मशहूर दार्शिनक बर्ट्रेंड रसेल की किताब Unarmed Victory पर पाबंदी लगा दी थी। इस पुस्तक में रसेल ने नेहरू के राजनीतिक नेतृत्व की नाकामियों और कमजोरियों का विश्लेषण किया था।

नेहरू ने गीतकार प्रदीप के गीतों पर पाबंदी लगा दी
1958 में रिलीज हुई फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ के दो गीत प्रधानमंत्री नेहरू को इतने क्रांतिकारी लगे कि उन्होने सेंसर बोर्ड से इन दोनों गीतों को हटवा दिया। इन गीतों को मशहूर कवि प्रदीप ने लिखा था, जिसमें नेहरू की नीतियों की आलोचना थी। 9 सालों तक इन गीतों पर पाबंदी लगी रही। ये गीत थे-
आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम
आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम
आजकल किसी को वो टोकता नहीं,
चाहे कुछ भी कीजिए रोकता नहीं
हो रही है लूटमार फट रहे हैं बम
किसको भेजे वो यहां हाथ थामने
इस तमाम भीड़ का हाल जानने
आदमी हैं अनगीनत देवता हैं कम

नेहरू सरकार ने मृणाल सेन की बांग्ला फिल्म पर पाबंदी लगाई
नेहरू के जमाने में फिल्मकार मृणाल सेन की फिल्म- नील अक्षर नीचे– पर पाबंदी लगा दी गई थी। बिडंबना यह थी कि इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नेहरू की सरकार ने पाबंदी लगाई थी।

आलोचना और विरोध के सुर रोकने के लिए संविधान का पहला संशोधन
भारत के संविधान में धारा 19(1) (a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को नागरिकों का मूल अधिकार माना गया और इस पर किसी भी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई गई। पत्र पत्रिकाओं का सभी प्रकार के विचार रखने की आजादी मिली। मद्रास से प्रकाशित होने वाली पत्रिका-Crossroad,  तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की कई नीतियों की खुलकर आलोचना करती थी। इन आलोचनाओं को रोकने के लिए मद्रास सरकार ने मार्च 1950 में इस पत्रिका पर पाबंदी लगा दी। पत्रिका के संपादक रोमेश थापर पाबंदी के खिलाफ अदालत गए और 26 मई, 1950 को सर्वोच्च न्यायलय सरकार के इस कदम को अनुचित और गैर संवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया।

इसी तरह दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका Observer के खिलाफ भी कदम उठाते हुए नेहरू सरकार ने पत्रिका में प्रकाशित होने से पूर्व सामग्री को सरकार से संतुष्ति प्राप्त करने का आदेश दे दिया। इस आदेश के खिलाफ भी बृजभूषण व अन्य ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने 26 मई, 1950 को सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया। स्वतंत्रता के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए आए इन अदालती आदेशों से खफा होकर प्रधानमंत्री नेहरू ने इस धारा को ही संशोधित करने का फैसला लिया। 20 मई, 1951 को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को संशोधित करते हुए नेहरु ने कहा-“During the last fifteen months of the working of the Constitution, certain difficulties have been brought to light by judicial decisions and pronouncements specially in regard to the chapter on fundamental rights. The citizen`s right to freedom of speech and expression guaranteed by article 19(1)(a) has been held by some courts to be so comprehensive as not to render a person culpable even if he advocates murder and other crimes of violence.

प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद में बहुमत के बल पर इस संशोधन को पारित करवा लिया। इस संशोधन के साथ ही नगरिकों को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकार ने कई तरह की पाबंदियां लगा दीं।

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