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क्या दिल्ली में फिर ‘अराजकता’ फैलाएंगे केजरीवाल?

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर दिल्ली वासियों को धमकी दे रहे हैं। उनके इरादे इस कदर खतरनाक दिख रहे हैं कि दिल्ली अस्त-व्यस्त हो जाएगी। उनके कहने का अर्थ साफ-साफ यही निकल रहा है कि अगर एमसीडी चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन खराब रहता है तो दोषी दिल्ली की जनता होगी। इसलिए तो दिल्ली वासियों को कभी मच्छर और चिकुनगुनियां की धमकी दे रहे हैं, कभी गंदगी फैलने की। अब दिल्ली की ईंट से ईंट बजाने की धमकी पर भी उतर आए हैं। हालांकि आड़ तो वे ईवीएम में गड़बड़ी की ले रहे हैं, लेकिन उनका इरादा दिल्ली को एक बार फिर 2014 के उसी ‘अराजक’ दौर में ले जाने का है जब उन्होंने गणतंत्र दिवस तक को भी बंद करवा देने की धमकी दी थी।

 

ईंट से ईंट बजाने की धमकी
टि्वटर पर अपलोड किए गए एक वीडियो में केजरीवाल अपने पार्टी के सदस्यों से कहते नजर आते हैं, ”अब अगर हम बुधवार को हारते हैं… नतीजे वैसे ही रहते हैं जैसे कि बीती रात बताए गए हैं, तो हम ईंट से ईंट बजा देंगे।”

वीडियो क्लिप में केजरीवाल यह कहते हुए भी सुनाई देते हैं कि आम आदमी पार्टी आंदोलन की उपज है, इसलिए पार्टी वापस अपनी जड़ों की ओर लौटने से हिचकिचाएगी नहीं। केजरीवाल ने कहा, ”अगर ऐसे नतीजे आते हैं तो यह साबित हो जाएगा कि पंजाब, यूपी, पुणे, मुंबई, भिंड और धौलपुर की तरह ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है। हम आंदोलन से निकले हैं। हम यहां सत्ता का आनंद उठाने नहीं आए हैं। आंदोलन की ओर लौटेंगे।”

इसलिए बौखला गए हैं केजरीवाल
दरअसल एमसीडी चुनाव के बाद कई चैनलों द्वारा किए गए एग्जिट पोल में केजरीवाल की करारी हार के अनुमान लगाए जा रहे हैं। केजरीवाल की पार्टी टक्कर की बात तो छोड़िए तीसरे नंबर पर खड़ी दिखाई दे रही है। ऐसे ही अनुमानों से खफा केजरीवाल बजाय आत्म-मंथन के आंदोलन की धमकी देने लग गए हैं। ईंट से ईंट बजाने की बात कह रहे हैं। वे इस बात को भी समझने को तैयार नहीं कि ये अनुमान ईवीएम मशीन से नहीं निकलते हैं ये तो जनता से सीधे संवाद के आधार पर सामने लाए जाते हैं।


केजरीवाल के इरादों पर सवाल
आंदोलन की राह सही है, लेकिन आंदोलन का मकसद क्या है? इस पर तो सवाल उठेंगे ही। क्या दिल्ली के लोग मोदी फोबिया से ग्रसित केजरीवाल के आंदोलन को उसी तरह साथ देंगे? बजाय अपनी गलतियों से सीखने के वे बार-बार दिल्ली वासियों को नतीजे भुगतने की धमकी देने के पीछे क्या मकसद है? 2011 से 2013 के बीच जो आंदोलन हुए वो जनलोकपाल जैसे कानून के लिए किए गए थे। उसमें अन्ना हजारे, किरण बेदी, योगेंद्र यादव जैसे कद्दावर चेहरे थे, लेकिन अब उनका साथ नहीं है। सवाल ये कि आंदोलन के गर्भ से निकली आम आदमी पार्टी को अपनी महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ा चुके केजरीवाल अब नया क्या कर लेंगे?

रिकॉल पर क्यों चुप हैं केजरीवाल
कभी ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले केजरीवाल जब भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंस चुके हैं। आम आदमी पार्टी ज्यादातर नेता किसी न किसी विवाद से जुड़े रहे हैं। शायद इसलिए एमसीडी चुनाव में केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से लालच, डर और धमकी देकर वोट हासिल करने की कोशिश की। लेकिन पब्लिक अगर अर्श पर लाना जानती है तो फर्श पर लाने में भी देर नहीं करती। जाहिर है दिल्ली की जनता को अब उनकी ईमानदारी पर भरोसा नहीं रहा, वो बदलाव चाहती है। ऐसे में ‘आप’ के फाउंडर मेंबर रहे योगेंद्र यादव ने उन्हें पत्र लिखकर रिकॉल वाले वादे की भी याद दिलाई है। लेकिन केजरीवाल इस पर चुप हैं। अगर दिल्ली की जनता एमसीडी में बीजेपी के एक दशक से बीजेपी के एंटी इंकंबेंसी के बावजूद जिता रही है तो क्या केजरीवाल रिकॉल की बात पर अमल करेंगे?

‘आम आदमी’ ने दिल्ली को धोखा दिया
केजरीवाल दिल्ली की जनता की सेवा करने के बजाय अपनी महत्वाकांक्षा को बढ़ाने में लग गए। गोवा, पंजाब और गुजरात में चुनावी फिजा बनाने लगे। केजरीवाल ने जब लालू प्रसाद जैसे सजायाफ्ता के साथ मंच शेयर किया तब उनकी भ्रष्टाचार विरोध की छवि धूमिल हुई। पंजाब में गुरुग्रंथ के पन्ने फड़वाने के आरोपों से घिरे तो उनपर सांप्रदायिक राजनीति को प्रश्रय देने वाला नेता माना गया। जब उन्होंने रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया तो दिल्ली की जनता ने खुद को ठगा महसूस किया। जब उन्होंने 16 हजार वाली थाली की दावत दी तो केजरीवाल आम आदमी तो रहे नहीं। जाहिर है दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया था, इसलिए उसे झटका लगा।

क्या AAP की सुनेगी दिल्ली की जनता?
बहरहाल केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के साथ दगा किया है शायद ये उसका ही परिणाम है। अगर केजरीवाल के कर्मों के कारण दिल्ली की जनता आम आदमी पार्टी पर भरोसा नहीं कर रही है तो हार का दोष दिल्ली वासियों का कैसे? बड़ा सवाल ये कि अगर हम हारे तो एवीएम खराब, हम जीते तो सही ? क्या यही है अलग तरह की राजनीति ? दरअसल दिल्ली वासियों ने केजरीवाल की अवसरवाद की राजनीति को पहचान लिया है। 2013 में जब केजरीवाल ने जब कांग्रेस के सहारे सरकार बनाई तब भी जनता ने पहचान लिया था। लेकिन दिल्ली की जनता दिलेर है, उन्होंने केजरीवाल और उनकी पार्टी को एक मौका दिया और अपार बहुमत दिया। लेकिन दो साल में ही उनकी उम्मीद टूट गई है। जाहिर है अब जनता केजरीवाल के आंदोलन में उनका साथ देगी, इस पर सवाल है।

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