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आंख में आंख डालकर बात करने वालों को होना पड़ा नेहरू-इंदिरा परिवार के कोपभाजन का शिकार

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मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार की आलोचना की। तथ्यहीन आरोपों की झड़ी लगाते हुए राहुल गांधी ने यहां तक कह दिया कि “प्रधानमंत्री अपनी आंख मेरी आंख में नहीं डाल सकते हैं।” इस पर पीएम मोदी ने पलटवार करते हुए संकेतों में बता दिया कि जिसने नेहरू खानदान का विरोध किया, उसे जीते जी ही नहीं मरने के बाद भी उसे नेहरू खानदान के विरोध का कोपभाजन बनना पड़ा है। ऐसे में, आपकी आंख में आंख डालकर बात करने की जुर्रत कौन कर सकता है?

हम कौन जो आपकी आंख में आंख मिला सकें
अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्षी नेताओं के सारे आरोपों का एक-एक करके जवाब दिया। इसी दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष के उस बयान पर हमला बोला कि आप मुझसे आंख नहीं मिला सकते हैं। पीएम मोदी ने कहा, “हम कौन हैं जो आपकी आंख में आंख मिला सकते हैं। मैं गरीब का बेटा हूं, पिछड़ी जाति में पैदा हुआ। मैं क्‍या आंख आप से मिलाऊंगा। आपकी आंखों में आंखें डाल कर हम तो नहीं बोल सकते, आप नामदार हैं और कामदार हैं।“

आंख मिलाकर बात करने वाले हाशिए पर 
पीएम मोदी ने कहा कि इतिहास गवाह है कि सुभाष चंद्र बोस, चौधरी चरण सिंह, सरदार पटेल, बाबासाहेब अंबेडकर, मोरार जी देसाई, जयप्रकाश नारायण, बाबू जगजीवन राम, चंद्रशेखर और प्रणब मुखर्जी ने नेहरू परिवार के साथ आंख से आंख मिलाई थी, उनके साथ क्‍या हुआ। आंख में आंख डालकर बात करने वालों के साथ कांग्रेस ने उनके जीवित रहते ही नहीं मरने के बाद भी हाशिए पर रखा। उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए, उन्हें नहीं दिया गया। आंख में आंख डालकर बात करने वालों को नेहरू परिवार के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा है। उसकी फेहरिस्त लंबी है। आइए उनमें से कुछ शख्सियत पर नजर डालते हैं –

नेता जी सुभाष चंद्र बोस

  • देश की आजादी के जिस दस्तावेज पर नेहरू ने हस्ताक्षर किए थे उसमें यह भी लिखा था कि यदि बोस आजाद भारत में भी लौटेंगे तो उन्हें बंदी बनाया जाएगा। उन पर यूनाइटेड किंगडम के खिलाफ युद्ध करने का अभियोग चलाया जाएगा। इससे नेहरू और बोस के संबंधों को आंका जा सकता है। 
  • नेहरू की हां में हां नहीं मिलाने के कारण आजादी के बाद बोस कहां और किस हालत में रहे, देश को आज तक पता नहीं लगा। उनकी मौत हुई तो कैसे, आज भी रहस्य है। 
  • बोस से जुड़े दस्तावेज मोदी सरकार के आने से पहले तक सार्वजनिक होने नहीं दिया गया।
  • आज तक यही पढ़ते रहे इतिहासों में कि पूर्ण स्वराज का नारा 26 जनवरी, 1930 में लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू ने दिया था जबकि यह नारा सबसे पहले 1927 में सुभाषचंद्र बोस ने दिया था। 

सरदार पटेल

  • नेहरू और पटेल के बीच के कैसा संबंध रहा। यह किसी से छिपी नहीं रही। इसी का नतीजा है कि सरदार पटेल को संबंधों की खटास को लेकर बीच की तनातनी किसी से छिपी नहीं है। 
  • सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार से लेकर रियासतों के एकीकरण तक, हर मौके पर नेहरू और पटेल के बीच मतभेद रहा है। इसके बाद भी सरदार पटेल के योगदान को नेहरू ने नकारने की कोशिश करते रहे।
  • खुद को भारत रत्न से सम्मानित करने वाले जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को कभी भी सरदार पटेल की याद नहीं आई। उन्हें 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया जा सका जब देश में दूसरी बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। 

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 

    • नेहरू की आंख में आंख डालकर बात करने का ही नतीजा है कि राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जिंदगी गुमनाम और बेतरबीत हो गई। नेहरू के विरोध के बावजूद राजेन्द्र बाबू सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद पूजन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इसके कारण नेहरू के कोपभाजन का शिकार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ताउम्र झेलनी पड़ी।
    • संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे बाबू राजेन्द्र प्रसाद का संविधान निर्माण के योगदान को भूला दिया गया। राष्ट्रपति पद से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें सही तरीके का एक आवास नेहरू ने मुहैया नहीं कराया। उन्हें पटना के सदाकत आश्रम में सीलन भरे कमरे में बाकी जिंदगी गुजारनी पड़ी। यहां तक कि वो जिस शौचालय का इस्तेमाल करते थे, उसकी बाल्टी तक टूटी हुई थी।
    • जयप्रकाश नारायण एक बार राजेन्द्र बाबू से मिलने पहुंचे तो उनकी दशा देखकर पहले तो फूट-फूटकर रोये और अपने पैसे से उनके शौचालय की मरम्मत कराई थी। 

बाबू जगजीवन राम

  • इंदिरा गांधी की आंखों में आंख डालकर बात करने वाले बाबू जगजीवन राम की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। वह चाहते थे कि अंतिम सांस कांग्रेस सदस्य के रूप में लें लेकिन इंदिरा गांधी ने ऐसा होने नहीं दिया। 
  • हरित क्रांति लाने वाले कृषि मंत्री, 1971 के पाकिस्तान युद्ध के समय रणनीतिक रक्षा मंत्री रहे बाबू जगजीवन राम ने आपातकाल का विरोध किया था।
  • इंदिरा गांधी को यह इतना नागवार गुजरा कि जिंदा रहते ही नहीं बाबू जगजीवन राम की मौत के बाद उनकी नाराजगी बरकरार रही। बाबू जगजीवन राम अछूत हो गए।
  • छूत भावना ही है कि मरणोपरांत बाबू जगजीवन राम के लिए उनकी समाधि समता स्थल के लिए एकदम अलग-थलग स्थान चुना गया। सारी समाधि एक तरफ, समता स्थल दूसरी तरफ। ऐसा विभाजन, ऐसी अस्पृश्यता कहीं नहीं देखी। 

मोरारजी देसाई 

  • देश में आपातकाल के बाद पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। उसका नेतृत्व मोरारजी देसाई ने किया। देसाई सरकार में ही पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी विदेशमंत्री बने जबकि लाल कृष्ण आडवाणी सूचना मंत्री बने।
  • मोरारजी देसाई के नेतृत्व में उनकी सरकार ने एक के बाद एक फैसले किए, उनमें नोटबंदी भी एक फैसला था। लेकिन नेहरू-इंदिरा के आंखों में आंख डालकर बात करने का नतीजा है कि उनके अच्छे फैसलों के बारे में देश को जानकारी न के बराबर है लेकिन उन्हें देशवासी घृणा की नजर से देखे। वह क्या पीते थे और क्या नहीं, इसके लिए एक से एक अफवाह फैलाई गई। 

पीवी नरसिंहा राव 

  • राजीव गांधी की हत्या के बाद देश के प्रधानमंत्री बने पीवी नरसिंहा राव को भी नेहरू-इंदिरा खानदान की बहू सोनिया गांधी से आंख में आंख मिलाकर बात करने का खमियाजा भुगतना पड़ा है।
  • पत्रकार और वकील विनय सीतापति की लिखी पुस्तक ‘हाफ लॉयन : हाउ पीवी नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्म्ड इंडिया’ में दावा किया गया है कि राव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आईबी के मार्फत सोनिया गांधी की जासूसी करवाई थी और 1995 में भी खुफिया सूत्रों के माध्यम से यह पता लगाने की कोशिश की थी कि पार्टी के कितने नेता उनके साथ हैं और कितने सोनिया के।
  • इससे नाराज कांग्रेस ने तेलुगू मूल के नेता पीवी नरसिंहा राव का अपमान हर स्तर पर किया और आज भी पार्टी उन्हें वाजिब सम्मान नहीं देती।
  • पीवी नरसिंहा राव को हाशिए पर रखने के लिए 1998 में चुनाव लड़ने तक का टिकट कांग्रेस ने नहीं दिया। यह ऐतिहासिक घटना थी।
  • सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं तो राव को अनौपचारिक रूप से बहिष्कृत कर दिया गया। बहिष्कार की पराकाष्ठा 2004 में उनके निधन के बाद देखने को मिली।
  • पीवी नरसिंहा राव की मौत 23 दिसंबर, 2004 को दिल्ली में हुई। उनके पार्थिव शव को कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड में अंतिम दर्शन के लिए रखने तक नहीं दिया गया। यहां तक कि कोई श्रद्धांजलि सभा तक आयोजित नहीं होने दी गई।
  • केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। राव का अंतिम संस्कार उनके बेटे और बेटी की इच्छा के विरुद्ध दिल्ली के बजाय हैदराबाद में किया गया। इस काम को अंजाम देने के लिए कांग्रेस ने शिवराज पाटिल और वायएस राजशेखर रेड्डी को जिम्मेदारी दी थी।
  • प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने ”1991- द ईयर दैट चेंज्ड इंडिया” पुस्तक लिखकर दावा किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में पीवी नरसिंहा राव का अमूल्य योगदान रहा है और वह भारत रत्न के हकदार हैं।

चौधरी चरणसिंह 
नेहरू-इंदिरा के सामने आंख में आंख डालकर बात करने का ही नतीजा है कि चौधरी चरणसिंह बतौर प्रधानमंत्री संसद का मुंह नहीं देख पाए। 

दीपक राजा

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