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देश में दो ही सरकारों ने किए हैं राजनीति से परे विकास, एक थी वाजपेयी सरकार और दूसरी है मोदी सरकार

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सक्षम नेतृत्व में भारत आज विकास की सीढ़ी दर सीढ़ी तय करता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है विकास का उनका स्पष्ट विजन, उसके अनुरूप योजनाओं की रूपरेखा तैयार करना और फिर उन पर जमीनी क्रियान्वयन। ये वही विशेषताएं हैं जिसका अनुभव देश ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में किया था। कांग्रेस के दशकों के शासनकाल में विकास के लिए ऐसी इच्छाशक्ति नहीं दिखी थी। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि कांग्रेस ने विकास के कार्यों को भी सत्ता की राजनीति से ऊपर जाकर नहीं देखा। आइए इसे कुछ तथ्यों के साथ समझते हैं।

गरीबी हटाओ का नारा नही, गरीबी दूर करने पर अमल
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हों या मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दोनों में से किसी ने भी कांग्रेस की तरह कभी गरीबी हटाओ का नारा नहीं दिया, बल्कि गरीबी हटाने की योजनाओं को जमीन पर लागू करके दिखाया। गौर करने वाली बात है कि 1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा उछाला था। तब चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जनसभाओं में आमजन की हमदर्दी ये कहते हुए बटोरी कि वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ। इस नारे के बूते चुनावों में कांग्रेस को दो-तिहाई सीटें मिल गई थीं। लेकिन जल्दी ही ये साफ हो गया कि गरीबी हटाओ का नारा महज चुनाव जीतने का एक हथकंडा था क्योंकि इंदिरा गांधी आम लोगों की गरीबी हटाने की जगह अपने बेटे संजय गांधी के निजी मारुति कार कारखाने के विकास जैसे कामों में लग गई थीं। मोदी सरकार में आज जन-धन और मुद्रा जैसी कई योजनाएं सफलतापूर्वक लागू की गई हैं जिनका मुख्य उद्देश्य ही गरीबों और शोषितों को विकास की मुख्यधारा में लाना है।

योजनाएं बनाने के साथ क्रियान्वयन पर भी जोर
कांग्रेस और बीजेपी शासन में एक बड़ा अंतर योजनाओं पर अमल के तरीकों को लेकर रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कभी खुद ये माना था कि उनके राज में सरकारी स्कीम के लाभार्थियों के हाथ 100 रुपये में से महज 15 रुपये लगते थे। लेकिन मौदी सरकार में सौ फीसदी रकम सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुंच रही है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम के जरिये सरकार ने पिछले चार साल में 90,000 करोड़ रुपये बचाए हैं। 33 करोड़ से अधिक जरूरतमंद लोग इसके जरिये लाभ उठा चुके हैं। इतना ही नहीं इस रास्ते से बिचौलिये और फर्जी लाभार्थी खत्म हो चुके हैं।

इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ऐसा जोर कांग्रेस के दिनों में कभी नहीं
प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास पर अत्यधिक जोर दिया था। देश के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने की योजना की शुरुआत उन्होंने ही की थी। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हाईवे के विकास के साथ ही ग्रामीण सड़कों के विस्तार पर बल है। दोनों के मूल में एक ही बात है कि अच्छी सड़कें न सिर्फ आवागमन को सुलभ बनाएंगी, बल्कि इससे व्यापार और कारोबार में भी एक नई गति आएगी जो आखिरकार देश की इकोनॉमी में मजबूती भरेगी। कांग्रेस और भाजपा में कामकाज का फर्क इससे समझा जा सकता है कि जहां 2013-14 में यूपीए शासन में हाईवे का निर्माण 12 किलोमीटर प्रतिदिन की रफ्तार से हो रहा था वहीं एनडीए के शासन में 2014 से 2018 के बीच बढ़कर 227 किलोमीटर प्रतिदिन हो गया।

यथास्थिति नहीं, विकास की प्रबल इच्छाशक्ति
कांग्रेस ने जैसे विकास की जगह यथास्थिति को ही बहाल रखने में विश्वास किया। यही वजह है कि उसने देश के उन हिस्सों में संसाधनों की संभावनाओं को नहीं तलाशा जो देश के विकास में काफी सहायक होते। यही वजह थी कि विकास के पटल पर पूर्वोत्तर के राज्य  पीछे रह गए थे। आज मोदी सरकार यह साबित करके दिखा रही है कि पूर्वोत्तर में संसाधनों की कितनी प्रचुरता है और किस प्रकार से यह क्षेत्र देश की इकोनॉमी में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। मौजूदा सरकार ने पहली बार पूर्वोत्तर को देश के पूरे रेल नेटवर्क के साथ एकीकृत करने का काम किया है। पूरे रेल नेटवर्क को बड़ी लाइन में कन्वर्ट किए जाने से मेघालय (दुधनोई-मेंदीपाथर), त्रिपुरा (कुमारघाट-अगरतला) और मिजोरम (कटखल-भैराबी) के बीच रेल कनेक्टिविटी स्थापित की जा चुकी है। इटानगर और सिलचर से दिल्ली के लिए ट्रेन कनेक्विटी हो चुकी है। वहीं, ऑर्गेनिक खेती हो या फिर नेशनल बैम्बु मिशन इस सरकार ने पूर्वोत्तर को ध्यान में रखते हुए ही इन योजनाओं पर फोकस किया है।  

एनडीए के शासन में लक्ष्य केंद्रित विकास पर बल
मोदी सरकार में गवर्नेंस का मूल सिद्धांत ‘सबका साथ सबका विकास’ रहा है और तमाम योजनाओं के केंद्र में समाज के आखिरी छोर का व्यक्ति रहा है। लेकिन कांग्रेस की अगुआई वाले दशकों के शासन का आलम यही था कि मोदी सरकार के आने तक भी देश के 18 हजार गांवों में बिजली नहीं पहुंची थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1000 दिनों की समयसीमा तय करके इन तमाम गांवों तक बिजली पहुंचाने का बीड़ा उठाया और उसे समय से पहले पूरा कर दिखाया। मौजूदा सरकार का एक स्पष्ट रोडमैप के साथ लक्ष्य केंद्रित विकास पर जोर है जिसका कांग्रेस के शासन में अभाव रहा था। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के दिनों में योजनाएं नहीं बनीं, लेकिन उन योजनाओं पर अमल का ना तो कोई खाका था ना ही नेतृत्व में उसके लिए कोई इच्छाशक्ति दिखती थी।    

एक प्रकार से देखें तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में विकास का यह दूसरा दौर है। कांग्रेस के शासन में राजनीतिक फायदे-नुकसान को देखते हुए अधिकतर फैसले हुआ करते थे। वहीं एनडीए के शासन के फैसलों में वोट बैंक नहीं, बल्कि जनहित और देशहित महत्वपूर्ण है। 

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