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राहुल गांधी को नहीं पता कि 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने ‘अर्बन नक्सलियों’ को बताया था कितना खतरनाक!

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भीमा कोरेगांव हिंसा से जुड़े मामलों में पड़ताल करते हुए पुलिस ने पुख्ता सबूतों के आधार पर जिन पांच लोगों को मंगलवार को पकड़ा, उनसे कांग्रेस नेताओं की सहानुभूति जगजाहिर है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन गिरफ्तारियों पर हायतौबा मचा रहे हैं। लेकिन लगता है कि उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार के पांच साल पहले के उस एफिडेविट के बारे में नहीं पता जिसमें यूपीए सरकार की राय कांग्रेस की आज की राय से ठीक उल्टी थी।

सामने आया कांग्रेस का दोगलापन
नवंबर 2013 में ‘किशोर समरीत बनाम भारत सरकार एवं अन्य’ के मामले में तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस बात को विस्तार से बताया था कि कैसे एक्टिविस्ट्स का माओवादियों से संपर्क है और किस प्रकार से ये अपनी अलग पहचान रखते हुए भी नक्सलियों की मदद करते हैं। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने एफिडेविट में यूपीए सरकार ने माना था कि शहरों में शैक्षणिक जगत से जुड़े कुछ लोग और एक्टिविस्ट मानवाधिकार की आड़ में ऐसे संगठनों को चला रहे हैं, जिनका लिंक माओवादियों से है। गौर करने वाली बात है कि आज ऐसे ही आरोपियों को पकड़कर पुलिस ने एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश किया है, तो कांग्रेस में नक्सलियों से भी अधिक खलबली मची दिख रही है।

‘जंगलों में सक्रिय माओवादियों से भी अधिक खतरनाक’
तब की यूपीए सरकार ने अपने एफिडेविट में शहरी इलाकों के कुछ एक्टिविस्ट को जंगलों में सक्रिय माओवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) से भी कहीं अधिक खतरनाक करार दिया था। इसमें कहा गया था कि अर्बन नक्सल सीपीआई (माओवादी) से जुड़े हैं जिनका कैडर गुरिल्ला आर्मी से भी अधिक खतरनाक है। PLGA सीपीआई (माओवादी) की ही एक सशस्त्र विंग है। गौर करने वाली बात है कि 2001 से लेकर अब तक माओवादियों ने 5,969 नागरिकों और 2,147 सुरक्षाकर्मियों की हत्याएं की है, साथ ही पुलिस एवं केंद्रीय अर्धसैनिक बलों से 3,567 हथियारों की लूट को भी अंजाम दिया है।

एफिडेविट में बताया था, कानूनी कार्रवाई क्यों मुश्किल
उस दौरान सुशील कुमार शिंदे के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय ने यह भी स्वीकार किया था कि यदि इन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है तो इससे एनफोर्समेंट एजेंसियों की नकारात्मक छवि बनती है। इसकी वजह है कि इन एकेडमिशियन्स और एक्टिविस्ट्स की प्रॉपेगेंडा मशीनरी खासी प्रभावशाली है। ऐसे में यदि इनके खिलाफ कोई ऐक्शन लिया जाता है तो सरकारी एजेंसियों के खिलाफ नकारात्मक प्रचार को बल मिलेगा। अब इससे यह समझना किसी के लिए भी आसान है कि कांग्रेस भले ही कार्रवाई से बचती रही हो, लेकिन नक्सली गतिविधियों के संदिग्ध एक्टिविस्ट को लेकर क्या महसूस करती थी। जाहिर है कांग्रेस का दोगलापन नवंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट में दायर उसकी तत्कालीन सरकार के एफिडेविट से खुलकर सामने आ जाता है।

‘आरोपियों के माओवादियों से संबंध’
गौर करने वाली बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में पुलिस ने जिन पांच लोगों को पकड़ा है, माओवादियों से उनके संबंध की पुख्ता जानकारी सामने आई है। महाराष्ट्र पुलिस के एडीजी परमबीर सिंह के मुताबिक जांच से यह खुलासा हुआ है कि माओवादी बड़ी वारदात को अंजाम देने की साजिश कर रहे थे और गिरफ्तार आरोपी इसमें उनकी मदद कर रहे थे। यहां तक कि इसमें एक आतंकी संगठन भी शामिल था। 17 मई को आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया था। एडीजी परमबीर ने बताया कि देश में अराजकता फैलाना इनका मकसद था और ऐसे सबूत मिले हैं कि ये सभी आपस में ईमेल के जरिए संपर्क में थे। ये ईमेल खास तरह के पासवर्ड प्रोटेक्टेड थे।  

‘गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया के तहत’
पुलिस के मुताबिक 31 दिसंबर,2017 को हुई घटना के सिलसिले में 8 जनवरी, 2018 को मामला दर्ज किया गया था। साक्ष्यों ये साफ हो रहा है कि भीमा-कोरेगांव में भाषण का उद्देश्य सोची-समझी साजिश के साथ नफरत फैलाना था। भीमा कोरेगांव हिंसा से संबंधित मामलों में देश के कई हिस्सों में मंगलवार को पुणे पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने कई एक्टिविस्ट और माओवादी नेताओं के ठिकानों पर छापे मारे। महाराष्ट्र, गोवा, तेलंगाना, दिल्ली और झारखंड में ये छापेमारी पुणे पुलिस और स्थानीय पुलिस ने मिलकर की। इनके ठिकानों पर छापेमारी में बड़ी मात्रा में नक्सली साहित्य बरामद हुए हैं। इन छापों के बाद दिल्ली, हरियाणा और हैदराबाद से एक-एक जबकि मुंबई से दो लोगों को पुलिस ने अपनी गिरफ्त में लिया।

सबसे खतरनाक साजिश रचने के आरोपी
सुरक्षा एजंसियों ने फरीदाबाद से सुधा भारद्वाज को गिरफ्तार करने के साथ उनका लैपटॉप और पेन ड्राइव भी जब्त कर लिया। ठाणे से अरुण परेरा और मुंबई से वरनन गोंजाल्विस को पकड़ा गया, जबकि दिल्ली से गौतम नवलखा और हैदराबाद से वरवर राव को भी गिरफ्तार किया गया। नक्सलियों से साठगांठ के आरोप में इन सबको सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी गिरफ्त में लिया था। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी पर हमले की साजिश रचने में ये सभी शामिल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिलहाल सभी आरोपियों को उनके घर में नजरबंद किया गया है।

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