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यूपी निकाय चुनाव में भी कांग्रेस की करारी हार, क्या राहुल जिता पाएंगे कोई चुनाव ?

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उत्तर प्रदेश में नगर निकाय चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं, इन चुनावों में बीजेपी को जबरदस्त कामयाबी मिली है, जबकि कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। राज्य के 16 नगर निगम में से 14 पर बीजेपी को सफलता मिली है। नगर निगम चुनाव में कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल सकी है। प्रदेश के दूसरे इलाके तो छोड़िए कांग्रेस के गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी कांग्रेस प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं कर पाए हैं। राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में ही कांग्रेस का शर्मनाक प्रदर्शन रहा है। अमेठी नगर पंचायत के साथ सुल्तानपुर नगर पालिका में भी कांग्रेस उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ा है। गौरीगंज में तो कांग्रेस उम्मीदवार चौथे नंबर पर रहा है। बीजेपी के इस शानदार प्रदर्शन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य के लोगों को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं।

निकाय चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी बीजेपी नेताओं के निशाने पर आ गए हैं। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि “गुजरात में राहुल गांधी बीजेपी को क्या टक्कर देंगे, उनके अपने लोकसभा क्षेत्र के लोगों ने उन्हें नकार दिया है।“ जाहिर है कि यूपी की जनता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामों पर मुहर लगाई है, और बीजेपी को भारी बहुमत के साथ निकाय चुनाव में जिताया है।

क्या गुजरात में बीजेपी को टक्कर दे पाएंगे राहुल ?

यूपी नगर निकाय चुनाव में हार गुजरात में बीजेपी को टक्कर दे रहे राहुल गांधी के लिए बड़ा झटका हैं। अब सवाल ये उठने लगा है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कोई चुनाव जीत पाएगी? आखिर लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा चुनाव या फिर निकाय चुनाव कांग्रेस की हार की वजह क्या है? क्या कांग्रेस अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है? क्या कांग्रेस का जनाधार टूट चुका है? क्या कांग्रेस का वोट बैंक ध्वस्त हो चुका है? क्या कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है? ऐसे बहुतेरे सवाल हैं जिसका जवाब ढूंढा जा रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल है पार्टी के नेतृत्व का।

दरअसल जिस राहुल गांधी के भरोसे कांग्रेस पार्टी देश की सत्ता में फिर से वापसी की उम्मीद कर रही है वह बेहद कमजोर है। राहुल गांधी का रिकॉर्ड तो ये है कि अब तक उनके नेतृत्व में जितने भी चुनाव लड़े गए उसमें कांग्रेस हारती ही चली आ रही है। उनके नेतृत्व में बीते 5 साल में कांग्रेस पार्टी 24 चुनाव हार चुकी है। आइये हम देखते हैं कि कहां और कितनी बड़ी हार दिला चुके हैं राहुल।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार

कांग्रेस की हालत खराब होती जा रही है। लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

2014 आम चुनाव में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटी

दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित कर दी गई है और युवा नेतृत्व के नाम पर राहुल को थोपने की कवायद चल रही है। कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी को अब तक 28 बार लॉन्च करने की कोशिश की है, लेकिन वह हर बार फेल रही है। 2014 में पार्टी की किरकिरी हर किसी को याद है। जब 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार

2015 में महागठबंधन के चलते जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2017 में पांच में से चार राज्यों में शिकस्त

इसी वर्ष पांच राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने भी राहुल की पोल खोल दी। यूपी और उत्तराखंड में कांग्रेस को करारी हार मिली। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह के कारण हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों। दूसरी ओर इन चुनावों में भी राहुल के मुकाबले अखिलेश एक युवा नेता के तौर पर जनता के सामने उभरकर आए।

दरअसल, कांग्रेस अपने अस्तित्व पर संकट के दौर से गुजर रही है। वहीं कांग्रेस की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में अब राहुल गांधी को अध्यक्ष का पद सौंपना कितना विश्वास भरा साबित हो सकता है। बहरहाल कांग्रेस अब केंद्र के विपक्षी दलों के सहयोगी की भूमिका में है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एक के बाद एक बड़ी हार के जिम्मेदार राहुल गांधी के नेतृत्व पर भरोसा करना कांग्रेस पार्टी के लिए कितना सही रहेगा?

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