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यूपी की जनता नहीं, आप डरी हुईं हैं ममताजी

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यूपी में हाल की घटनाओं पर चिंता जतायी है। वो लोगों को डरा हुआ देख रही हैं, जाति, धर्म और संप्रदायों में बंटा हुआ देख रही हैं। यह चिंता ममता ने ट्विटर पर सार्वजनिक की है। पड़ताल करते हैं कि डरा हुआ कौन है यूपी की जनता या खुद ममता बनर्जी।

ममता क्यों हुईं परेशान?

ममता की चिंता को समझने और परखने के लिए कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है। पहली बात कि वो कौन सी बातें हैं जो ममता को 9 दिन की सरकार ने परेशान कर दिया है। दूसरी बात यूपी के चुनाव से ममता दूर क्यों रहीं, जबकि वह बिहार चुनाव में बीजेपी विरोधियों को इकट्ठा करने के लिए यूपी घूम रही थीं?  तीसरी बात कि ट्वीट करके चिंता प्रकट करना तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में या फिर बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और लाचारी दोनों को प्रकट करता है।

नवरात्र से पहले के 9 दिन : योगी सरकार के 9 बड़े फैसले

योगी सरकार ने नौ दिन में जो अहम फैसले किए हैं पहले उस पर एक नजर डाल लेते हैं।

  1. एंटी रोमियो दल का गठन
  2. अवैध बूचड़ खाने बंद हो गये
  3. हज सब्सिडी छोड़ने की अपील
  4. मान सरोवर यात्रा करने वालों को 1 लाख की मदद
  5. ढाई महीने में गड्ढा मुक्त यूपी बनाने का लक्ष्य
  6. पार्टी नेताओं को नहीं मिलेंगे ठेके के काम
  7. कोई भूखा नहीं मरेगा
  8. पैदल घूमें पुलिसकर्मी
  9. गोमती की सफाई का काम एक साल में पूरा करने के निर्देश

बूचड़खाने बंद होने से चिंतित हो गयीं ममता

सवाल है कि ममता बनर्जी को इन फैसलों में दिक्कत कहां है? निश्चित तौर पर अवैध बूचड़खानों को बंद करने और एंटी रोमियो स्क्वॉयड को लेकर उनकी चिंता होगी, क्योंकि वे लोगों के डरे होने की बात दुनिया के सामने ला रही हैं। इस कथित डर को इन्हीं दो मुद्दों को छूते हुए आगे बढ़ाया जा रहा है। अवैध बूचड़ खाने बंगाल में कुकुरमुत्ते की तरह हैं। यहां तो गाय को काटना भी गैर कानूनी नहीं है। तभी तो आज़म खां जैसे लोग सही या गलत कहने के बजाए केरल और प. बंगाल में गोकशी को कानूनी रहने का उदाहरण देकर देश के दूसरे हिस्सों के लिए सवाल उठा रहे हैं।

तीन तलाक खत्म होने की संभावना से भी डरी हुई हैं ममता

बंगाल और केरल में मुस्लिम तुष्टीकरण की सियासत किसी से छिपी नहीं है। ममता बनर्जी खुद कामरेडों से सत्ता छीन सकीं तो इसलिए कि उन्होंने तुष्टिकरण के मामले में उन्हें भी पीछे छोड़ दिया। इसलिए जो चिंता ममता बनर्जी यूपी के बहाने प्रकट कर रही हैं वह चिंता कम, सियासत ज्यादा है। यह चिंता अपने सरकते आधार को मजबूत करने की कवायद है। खासकर इसलिए क्योंकि ममता को ये चिंता सता रही है कि अगर देश में तीन तलाक खत्म कर दिया गया, तो मुस्लिम महिलाओं का वोट कहीं बीजेपी की ओर खिसक ना जाए। संकेत यूपी में मिल चुका है।

यूपी में जनादेश तक पचा नहीं पा रही हैं ममता

ममता बनर्जी जब यूपी में ‘हाल में घटी घटनाओं’ का जिक्र करती हैं तो उसमें बीजेपी को मिली बड़ी चुनावी जीत भी शामिल है। बीजेपी को मिले जनादेश को ममता बनर्जी पचा नहीं पा रही हैं। पीएम मोदी के नेतृत्व में मिली यह जीत उन्हें चिढ़ाती हुई दिख रही है। वजह दुनिया जानती है। खुद ममता कह चुकी हैं कि वो पीएम मोदी के साथ बैठकों में जाना नहीं चाहतीं। हालांकि इसकी वजह वह खुद को ‘नौकरानी समझा जाना’ बताती हैं लेकिन इसकी असली वजह राजनीतिक है।

मोदी विरोध की धुरी बनना है ममता की ख्वाहिश

मोदी विरोधी की राजनीति का केन्द्र बनने की उनकी कोशिश है। ममता बनर्जी इस राजनीति में लालू, नीतीश, केजरीवाल से आगे निकलने को बेचैन हैं। एक सच्चाई ये भी है कि यही ममता मोदी विरोधियों को एकजुट होने की स्थिति में ईर्ष्या भाव से भर जाती हैं। उन्हें लालू-नीतीश की एकजुटता पसंद नहीं आती, उन्हें नीतीश-केजरीवाल का मिलना भी अच्छा नहीं लगता। दरअसल महत्वाकांक्षी ममता बनर्जी केवल और केवल खुद को मोदी विरोध की राजनीति का केन्द्र बनाना चाहती हैं। इसी मकसद से वो अपनी सियासत के प्यादे चलती हैं।

अपना कद बढ़ाना चाहती हैं ममता बनर्जी

बिहार में मोदी विरोध की राजनीति में अलग-थलग पड़ने के बाद यूपी में भी कोशिश कर वह चुनाव से पहले ही हार गयीं। फिर अखिलेश ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर जो प्रयोग किया, उसने भी ममता को यूपी में घुसने का मौका नहीं दिया। अब अखिलेश हार चुके हैं और पीएम मोदी के नेतृत्व में जीत के बाद वहां योगी सरकार है, तो ममता अपने लिए वही पुरानी घिसी पिटी अल्पसंख्यकों को एकजुट करने की सियासत की ओर कदम बढ़ाती दिख रही हैं। उनका एक मकसद तो खुद को राष्ट्रीय नेता के तौर पर खड़ा करना है और दूसरा मकसद बंगाल में अपने जनाधार को बनाए रखना।

खुद कानून नहीं मानतीं, चिंता संविधान की?

कानून को ठेंगा दिखाती रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को संविधान की चिंता खाए जा रही है। ममता कह रही हैं कि संविधान खतरे में है। इसे बचाना जरूरी है। अभी हफ्ता भर भी नहीं बीता है जब ममता नारद स्टिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर रही थीं, प्रदर्शन और हड़ताल कर रही थीं। इससे पहले शारदा घोटाले में भी ममता अपने सहयोगियों का बचाव इसी तरीके से कर चुकी हैं। न केन्द्रीय जांच एजेंसी को मान रही थीं, न ही अदालत के निर्देशों को। संविधान की रक्षा का ये है चेहरा ममता का।

तब क्यों चुप थीं ममता जब हिन्दू खदेड़े जा रहे थे?

तब ममता कहां थीं जब उनका प्रदेश सांप्रदायिक दंगों में झुलस रहा था, हिन्दुओँ के घर जलाए जा रहे थे, उन्हें खदेड़ा जा रहा था। धुलागढ़ में मीडिया की रिपोर्टिंग तक को रोक दिया गया। रिपोर्टरों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करा दिए गये। ममता के राज में सांप्रदायिक दंगों ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। खास बात ये है कि अब ये दंगे एकतरफा हो रहे हैं और निशाना सिर्फ हिन्दुओं को बनाया जा रहा है।

तुष्टिकरण की सियासी राह में भटक रही हैं ममता

ममता की सोच संकीर्ण है,  राजनीति संकीर्ण है और मकसद संकीर्ण है। ये सोच कभी परवान नहीं चढ़ सकती।  एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपने प्रदेश में विफल रहीं ममता अपने खराब परफॉर्मेंस से ध्यान बंटाना चाहती हैं और इसलिए उन्होंने चुनी है तुष्टिकरण की सियासी राह। अब समझ में आयी न पूरी बात कि डरी हुई यूपी की जनता नहीं, डरी हुईं खुद ममता हैं।

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