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प्रधानमंत्री मोदी के सामने विपक्ष की मुश्किल राह, मुकाबले का नहीं सूझ रहा कोई रास्ता

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश आगे बढ़ रहा है। मोदी सरकार की नीतियों से देश का आम नागरिक लाभान्वित हो रहा है। आर्थिक क्षेत्र में भारत समृद्धि के पथ पर अग्रसर है और विदेशों में भी भारत का डंका बज रहा है।  2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी ने देश की बागडोर संभाली थी तब ऐसी स्थिति नहीं थी। उस वक्त देश में लूट-खसोट का माहौल था, केंद्र की यूपीए सरकार लाखों करोड़ के घोटालों के आरोपों में घिरी थी, देश के नागरिकों का आत्मबल निचले स्तर पर था, निराशा का माहौल था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन हालातों को बदला और आज देश सही दिशा में आगे जा रहा है, इसलिए देश के हर हिस्से में पीएम मोदी और बीजेपी को समर्थन भी मिल रहा है।

बीजेपी के सामने बौने होते जा रहे हैं विपक्षी दल
2014 में जब पीएम मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे, तब एनडीए की कुल 7 राज्यों में सरकार थी और उनमें से 4 मुख्यमंत्री बीजेपी के थे। आज 22 राज्यों में एनडीए की सरकार है और 15 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री है। बीजेपी और सहयोगी दलों की देश के 75 प्रतिशत भू-भाग सत्ता है और 68 प्रतिशत से ज्यादा आबादी पर एनडीए की राज्य सरकारों का शासन है। यह आंकड़े साबित करने के लिए काफी हैं कि देश में किस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की लोकप्रियता बढ़ रही है। यही लोकप्रियता कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों की चिंता का सबब बनी हुई है। विपक्षी दल पीएम मोदी के करिश्माई नेतृत्व के सामने हताशा की मुद्रा में हैं। हालांकि कांग्रेस पार्टी विपक्षियों को एकजुट करने में जुटी हुई है लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। आगे उन वजहों को टटोलते हैं जो विपक्षी दलों की एकजुटता में आड़े आ रही हैं।

बिखरा हुआ विपक्षी कुनबा
देश में कांग्रेस पार्टी, वाम दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी जैसे तमाम विपक्षी पार्टियां, जो पहले कभी देश की सत्ता का केंद्र हुआ करती थीं। आज इन दलों को कोई पूछने वाला नहीं है। इनमें से कई दल अपने-अपने प्रभाव वाले राज्यों तक ही सीमित हो कर रह गए हैं, कुछ दलों की अपने राज्यों में भी पकड़ ढीली हो चुकी है। कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और वह बीजेपी विरोधी दलों को एकजुट करने की कोशिश में जुटी हुई है, लेकिन उसमें सफलता मिलती नहीं दिख रही। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी एकजुटता दिखाने के लिए 13 मार्च को तमाम दलों के नेताओं को डिनर पर बुलाया है, लेकिन एनसीपी के शरद पवार और टीएमसी की ममता बनर्जी ने इससे दूरी बना ली है। यानी सोनिया गांधी की विपक्षी एकजुटता की कोशिशें परवान चढ़ती नहीं दिख रही हैं। पिछले महीने बजट से पहले भी सोनिया गांधी ने एनडीए सरकार के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए विपक्षी दलों की बैठक बुलाई थी, तब उस बैठक से समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने दूरी बना ली थी।

राहुल गांधी में नेतृत्व को हजम करना मुश्किल
यूपीए की सरकार के कार्यकाल में सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष थीं और यूपीए की चेयरपर्सन भी। सोनिया के नेतृत्व में विपक्षी दलों के एक साथ आने में नेताओं का ईगो आड़े नहीं आता था। जब से राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने हैं, विपक्षी दलों के कद्दावार नेताओं को राहुल की अगुवाई में एक साथ आने में दिक्कत हो रही है। जाहिर है राहुल को कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है, न ही देश के अहम मुद्दों पर उनकी कोई स्पष्ट राय है। अपने बयानों से मजाक का पात्र बनने वाले राहुल गांधी के नीचे काम करना इन नेताओं को मंजूर नहीं है। यही वजह है कि समय-समय पर सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं की बैठकों को बुलाती रही हैं। विपक्षी नेताओं के सामने मुश्किल है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते उन्हें कभी न कभी राहुल के साथ करना पड़ेगा और इसके लिए वो तैयार नहीं है।

विपक्ष की अगुवाई कौन करेगा?
विपक्षी दलों के नेताओं के बीच यह भी एक बड़ा सवाल है कि उनकी अगुवाई कौन करेगा। कुछ दिनों पहले टीएमसी के नेताओं ने कहा था कि विपक्ष की अगुवाई वही नेता करे, जिसे प्रशासनिक अनुभव हो और वरिष्ठ भी हो। यानी उनका मतलब साफ था कि राहुल गांधी तो कम से कम विपक्ष की अगुवाई के लिए काबिल नहीं है। शरद पवार, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव सरीखे नेता दशकों से राजनीति में हैं, इनकी अपने-अपने राज्यों में जनता पर पकड़ भी है, लेकिन एक दूसरे के तहत काम करने को कोई राजी नहीं है। मतलब साफ है कि विपक्ष में नेतृत्व कौन करेगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है। 

विपक्षी दलों के विचारों में विरोधाभाष
विपक्षी एकजुटता की राह में यह भी बड़ा कांटा है, कि उनके विचारों में एकरूपता नहीं है। दरअसल, विपक्षी दल भानुमती के कुनबे की तरह हैं, यहां हर किसी का लक्ष्य अलग है, मकसद अलग और विचार भी अलग है। हालांकि इन सभी का उद्देश्य प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी को चुनौती देना है, लेकिन इससे पहले ये लोग खुद ही एक दूसरे के लिए चुनौती बन जाते हैं।

कांग्रेस की नीतियों पर अविश्वास
सभी जानते हैं कि देश की सबसे पुरानी और देश पर सबसे ज्यादा वक्त तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी का दामन घोटालों के दागों से भरा हुआ है। यूपीए के कार्यकाल में लाखों करोड़ रुपये के घोटालों से कांग्रेस पार्टी की छवि को जो बट्टा लगा है उसे हर कोई जानता है। इसके साथ ही अभी विपक्ष में जो दल हैं उनमें से कई कभी न कभी कांग्रेस से ही निकले हुए हैं।  इतना ही नहीं अपने राज्यों में ये पार्टियों कांग्रेस से लड़ती रही हैं। इन दलों के नेताओं को कांग्रेस का डीएनए अच्छी तरह से मालुम है, यह भी विपक्षी एकता के आड़े आ रहा है।

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