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तीन तलाक पर नरेन्द्र मोदी सरकार का सशक्त संकल्प, नए कानून से बदलेंगे मुस्लिम महिलाओं के दिन

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए बहुत जल्दी ही एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। मोदी सरकार का यह मानना है कि तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) के विरुद्ध एक ऐसे कड़े कानून का होना जरूरी है, जो मुस्लिम महिलाओं को इस स्थिति से बचाने में पूरी तरह से सक्षम हो। इसी के चलते सरकार इस शीतकालीन सत्र में तीन तलाक के विरुद्ध कानून बनाने संबंधी बिल पेश करने जा रही है।

तीन तलाक पर कानून के लिए बिल होगा पेश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार पहले भी समय-समय पर तीन तलाक की स्थिति की संवेदनशीलता को समझते हुए कड़े शब्दों में इसकी आलोचना करती रही है। उल्लेखनीय है कि पिछले अगस्त में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलााक को अवैध करार दिया था। यह याचिका उत्तराखंड की निवासी शायरा बानो ने वर्ष 2016 में दाखिल की थी, जिसमें मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु विवाह की प्रथा को अमान्य घोषित किए जाने की मांग की गई थी। प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में तीन तलाक दिए जाने के विरोध में आए इस निर्णय ने मुस्लिम महिलाओं को बहुत बड़ी राहत प्रदान की। कई शीर्ष मुस्लिम संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत किया।

मुस्लिम महिलाओं की दारुण स्थिति

शायरा बानो द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन को चुनौती दी गई थी। याचिका में उन्होंने कहा था कि ऐसी प्रथाओं के चलते मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की पूरी तरह से अनदेखी होती है और वे हमेशा डर के साये में जीने को मजबूर रहती हैं। इसके उलट मुस्लिम पुरुषों के पास अनगिनत अधिकार होते हैं, जिनका दुरुपयोग उनकी तरह-तरह की मनमानी के रूप में सामने आते हैं। तीन तलाक इसी का एक उदाहरण है, जिसमें मुस्लिम पुरुष एक बार में तीन बार तलाक कहकर अपनी पत्नी से संबंध विच्छेद कर सकते हैं। अब क्योंकि यह तलाक स्थिर होता है, इसलिए विवाह विच्छेद मान्य हो जाता है। गौर करने वाली बात है कि टेक्स्ट, फेसबुक, ई-मेल, फोन आदि के द्वारा भी बड़े अनुपात में तीन तलाक दिए जा रहे थे। यह उन महिलाओं की स्थिति को अत्यंत दारुण बना देता है, जो आर्थिक रूप से या सामाजिक कारणों से पूरी तरह अपने से अपने पति पर ही निर्भर होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में से तीन सदस्यों ने तीन तलाक को अवैध करार दिया था और इसके विरुद्ध फैसला दिया था। इस निर्णय के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी की सरकार इस दिशा में कानून बनाने के लिए प्रयासरत है, जिससे इस स्थिति से जुड़ी तकनीकी कमियों को दूर किया जा सके और इसे और अधिक सशक्त बनाया जा सके। ऐसा होने से मुस्लिम महिलाओं को कमजोर करने वाली इस कुप्रथा पर पूरी तरह से रोक लगाई जा सकेगी।

कड़े कानून का होगा प्रावधान

सामान्यत: जैसा कि देखने में आता है कि ज्यादातर कानूनों को लोग गंभीरता से न लेकर उसकी अवमानना करते रहते हैं। ऐसा ही रवैया तीन तलाक के मामले में भी देखने को मिला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने के बावजूद तीन तलाक देने वाला व्यक्ति यूसुफ खालिद अलीगढ़ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में कार्यरत है। उच्च शिक्षा प्राप्त इस व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध जाकर अपनी पत्नी से तीन तलाक द्वारा संबंध विच्छेद कर लिये। ऐसा इस कारण हो पाया कि सुप्रीम कोर्ट ने तो तीन तलाक को अवैध करार कर दिया, लेकिन पीड़ित महिला को न्याय दिलाने के लिए कानून में किसी धारा या दंड का कोई प्रावधान नहीं है, जिसका लाभ यूसुफ और उस जैसे कई और लोग उठा रहे हैं। इसी मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद पुलिस यूसूफ खालिद के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाई कि दोषी को सजा दे भी तो कानून की किस धारा के अंतर्गत।

कानून को यही सशक्तता प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ठोस और स्पष्ट कानून की व्यवस्था करने जा रही है।

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