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बुजुर्गों का अपमान तो कांग्रेस की वंशवादी परम्परा में शामिल है राहुल गांधी जी!

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध में राहुल गांधी इतना गिरते जा रहे हैं कि उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक मर्यादाओं को भी ताक पर रख दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा अपने सीनियर नेताओं का सम्मान करती है जबकि पीएम मोदी अपने बुजुर्ग नेताओं का सम्मान नहीं करते हैं।

सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी को बुजुर्ग नेताओं के अपमान की बात करने से पहले खुद की गिरेबां में नहीं झांकना चाहिए?

दरअसल बुजुर्ग नेताओं का अपमान करने की तो कांग्रेस पार्टी में परम्परा सी रही है। इसके अनगिनत उदाहरण हमारे सामने हैं। आइये हम सिलसिलेवार तरीके से उन प्रमुख प्रकरण पर नजर डालते हैं जिनमें कांग्रेस ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सीताराम केसरी, प्रणब मुखर्जी और नरसिम्हा राव जैसे दिग्गज राजनेताओं का अपमान किया गया है-

…जब बुजुर्गों को दरकिनार कर कांग्रेस पर थोपे गए राहुल गांधी 
12 सितंबर, 2017 को अमेरिका में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ”भारत की प्रकृति वंशवाद की है।” 13 अक्टूबर, 2017 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा, ”अब समय आ गया है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी राहुल गांधी को सौंप दी जाए।” यानी सब सेट था… और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना भी। कांग्रेस पार्टी के इस निर्णय से यह बात एक बात फिर सिद्ध हो गई है कि कांग्रेस पार्टी में ‘बाप’ का नाम ही चलता है और पार्टी एक बार फिर वंशवाद की ‘अमरबेल’ से मुक्त नहीं हो पाई! दरअसल बीते सात दशकों में हमारे सामने कई उदाहरण हैं जब कांग्रेस पार्टी में नेता, उपाध्यक्ष, अध्यक्ष और प्रधानमंत्री या तो गांधी फैमिली से रहे हैं या फिर उन्हें ‘थोपा’ गया है। यानि बुजुर्गों को दरकिनार कर अपमानित करने का सबसे बड़ा उदाहरण तो स्वयं में राहुल गांधी हैं। 

सोनिया और सीताराम केसरी के लिए चित्र परिणाम

प्रणब मुखर्जी की जगह मनमोहन सिंह को बनाया गया था प्रधानमंत्री
14 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ”द कोलिशन इयर्स” की लॉन्चिंग हुई। इस पुस्तक में कई ऐसी बातें सामने आई हैं जो कांग्रेस पार्टी पर गांधी फैमिली के कब्जे की कहानी कहती हैं। प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस पुस्तक में 2 जून, 2012 की बैठक को याद करते हुए अपना संस्मरण लिखा है। उन्होंने लिखा, ”बैठक में सोनिया गांधी से हुई बातचीत से उन्हें ऐसा लगा कि वो मनमोहन सिंह को यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाना चाहती हैं। मैंने सोचा कि अगर वो मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति उम्मीदवार चुनती हैं तो शायद मुझे प्रधानमंत्री के लिए चुनें। मैंने इस तरह की कुछ बातें सुनी थीं कि वो कुछ ऐसा सोच रही हैं।

”द कोलिशन इयर्स” की लॉन्चिंग के अवसर पर ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी गांधी फैमिली की ‘दादागिरी’ की पोल खोल दी। उन्होंने कहा, ”प्रणबजी मेरे बहुत ही प्रतिष्ठित सहयोगी थे। इनके (मुखर्जी के) पास यह शिकायत करने के सभी कारण थे कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की तुलना में वह इस पद (प्रधानमंत्री) के लिए अधिक योग्य हैं। पर वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानते थे कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।” 

जाहिर है प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह जैसे कद्दावर नेताओं की ये बात साबित करती है कि पार्टी में एक मात्र सोनिया गांधी की ही चलती थी और वो जो तय करती थीं वही होता था। 

pranab and sonia manmohan के लिए चित्र परिणाम

सीताराम केसरी को बेइज्जत कर सोनिया गांधी को बनाया अध्यक्ष
कांग्रेस के दिवंगत अध्यक्ष सीताराम केसरी पूरी जिंदगी ईमानदार रहे, लेकिन परिवारवाद की पोषक कांग्रेस के कारण इस दलित नेता को कितना अपमान झेलना पड़ा इस बात का प्रमाण नीचे दी गई तस्वीर है। ये तस्वीर उन दिनों की है जब सोनिया गांधी से त्रस्त होकर सीताराम केसरी अपने से उम्र में कई साल छोटे नरसिम्हा राव के कदमों में झुकना पड़ा था… फिर भी नरसिम्हा राव उन्हें सोनिया के कहर से नहीं बचा सके।

दरअसल 1997 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन के दौरान ही सोनिया गांधी पहली बार कांग्रेस पार्टी की साधारण सदस्य बनी। उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। लेकिन सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनने की तीव्र इच्छा जाग गई। कांग्रेस पार्टी पर कब्जा करने की इतनी जल्दी थी कि सीताराम केसरी को बीच कार्यकाल से ही हटाना चाहती थीं, लेकिन सीताराम केसरी अपना पद नहीं छोड़ना चाहते थे। तब दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल के साथ अन्य कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने की साजिश रची। अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा करने से तीन साल पहले ही कांग्रेस ने 80 साल के इस बुजुर्ग दलित नेता का अपमान किया। 

सोनिया गांधी के लिए फाड़ दी गई सीताराम केसरी की धोती
सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस के सारे नियम कायदे को ताक पर रख दिया जिस सोनिया गांधी ने कभी कहा था कि अपने बच्चों के हाथ में कटोरा दे देंगी लेकिन राजनीति मे नही आएंगी। हुआ यूं कि 14 मार्च 1998 को सीताराम केसरी के बारे में कांग्रेस कार्यसमिति ने कहा कि उन्होंने इस्तीफे की पेशकश कर दी है। कांग्रेस के संविधान की धारा 19 (जे) के तहत उनकी सेवाओं के लिए आभार प्रदर्शन का प्रस्ताव पढ़ना शुरू कर दिया गया, लेकिन केसरी ने जब इस कदम को असंवैधानिक करार दिया तो सबने उन्हें डांट कर चुप करा दिया। वे तैश में उठ कर खड़े हुए तो किसी ने उनकी धोती खींच दी गई। इस दलित नेता को बेइज्जत कर कार्यसमिति की बैठक से धक्के देकर बाहर कर दिया गया। वह बाहर आए तो उनकी केबिन से उनका नेमप्लेट तक हटाया जा चुका था और वहां सोनिया गांधी का नेमप्लेट लग चुका था। उस समय टीवी पर पूरे देश ने एक बुजुर्ग दलित नेता को कांग्रेस के इस कुकर्म से आहत होकर फूट फूट कर रोते देखा था। तब उन्होंने कहा भी था कि काश वो बाबा साहब अम्बेडकर की बात मान लेते कि ”कांग्रेस न अभी दलितों की हितैषी है न कभी थी और न कभी रहेगी।”

नरसिम्हा राव के शव को भी नहीं दे पाए सम्मान
बुजुर्गों के अपमान करने के काले अध्याय में एक अध्याय भूत पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का भी है। 2004 में उनका देहांत दिल्ली में हुआ था, लेकिन उनके शव को कांग्रेस मुख्यालय में सिर्फ इसलिए नहीं रखने दिया गया क्योंकि उन्हें सोनिया गांधी नापसंद करती थीं। दरअसल दिल्ली हाई कोर्ट की ओर से बोफोर्स मामले को खारिज किए जाने के खिलाफ राव सरकार ने अपील कर दी थी। इससे सोनिया गांधी भड़क गईं थीं। उन्हें लगा था कि नरसिम्हा राव उन्हें जेल भिजवाना चाहते हैं। सोनिया गांधी को इस बात की भी खीझ थी कि बगैर उन्हें जानकारी में लिए बोफोर्स मसले पर सीबीआई से सीधे कैसे डील कर ली गई थी। 

बदले की आग में जल रही सोनिया गांधी ने नरसिम्हा राव के परिवार पर ‘दबाव’ बनाने की कोशिश की थी कि राव का अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाय हैदराबाद में हो। हैरत की बात यह रही कि तेईस दिसंबर 2004 को दिल्ली में मृत हुए नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार हैदराबाद में किया गया था।  

इस पूरे प्रकरण पर दुख जताते हुए कांग्रेस की नेता रहीं मार्गेट अल्वा ने कहा था, “राव के शव को एआइसीसी के परिसर में नहीं लाने दिया गया। आपके बीच जैसे भी मतभेद रहे हों, वह प्रधानमंत्री थे। वह कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे। किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। मुझे इससे गहरा धक्का लगा था।”

डॉ राजेंद्र प्रसाद को मरणोपरांत भी नहीं दिया सम्मान
राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद को पटना में कांग्रेस कार्यालय सदाकत आश्रम में रहना पड़ा था। हालात इतने बुरे थे कि उनके लिए टॉयलेट तक की व्यवस्था नहीं दी गई थी। जब सीलन भरे कमरे में रह रहे राजेंद्र बाबू को जय प्रकाश नारायण ने देखा तो उन्होंने कमरे की मरम्मत करवाई थी। सवाल उठता है कि क्या देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री संविधान सभा के पहले अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति के लिए एक रहने लायक मकान की व्यवस्था नहीं करवा सकते थे?

इसके बाद 1963 में राजेंद्र बाबू का देहांत हो गया। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके निधन को प्राथमिकता नहीं दी और जयपुर जाने का कार्यक्रम बना लिया। इतना ही नहीं नेहरू ने राजस्थान के राज्यपाल संपूर्णानंद को भी राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका। दरअसल संपूर्णानंद राजेंद्र बाबू की अंतिम क्रिया में शामिल होने के लिए पटना जाना चाहते थे, लेकिन संपूर्णानंद ने नेहरू से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। आखिरकार डॉ संपूर्णालनंद को अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा।

पंडित नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन को भी पटना नहीं जाने की सलाह दी थी। हालांकि डॉ राधाकृष्णन ने नेहरू की बात नहीं मानी और वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। यह प्रकरण साफ करता है कि कांग्रेस पार्टी में बुजुर्गों को सम्मान देने का कैसा गौरवशाली इतिहास रहा है।

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