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निष्पक्ष पत्रकारिता के नाम पर राजनीतिक एजेंडाबाजी

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स्वाति चतुर्वेदी पेशे से पत्रकार हैं। वे अंग्रेजी समाचार पत्र स्टेट्समैन, इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स में काम कर चुकी हैं। आजकल तमाम बेवसाइटों पर लिखने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहती हैं। सोशल मीडिया पर उनके बयान या लेख उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता की पोल खोलते हैं। इस निष्पक्ष पत्रकारिता की आड़ में वे कांग्रेस और राहुल गांधी का खुला समर्थन करती हैं और कांग्रेस के एजेंडे को बढ़ाने का काम करती हैं। उनके सिलसिलेवार बयान और लेख इस तथ्य के साक्षात प्रमाण हैं-

राहुल गांधी का सम्मान और मोदी का अपमान– 28 अक्टूबर को एक ट्वीट में राहुल की हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश से हुई भेंट पर लिखा गया कि राहुल गांधी हज करने गये। इस ट्वीट की प्रतिक्रिया में स्वाति ने लिखा कि यह हद निम्न दर्जे की कट्टरता है। दूसरी तरफ 29 अक्टूबर को राहुल गांधी ने एक कुत्ते को बिस्कुट खिलाते हुए एक वीडियो ट्वीट किया, जिस पर स्वाति ने लिखा कि राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी और अर्णब गोस्वामी के बीच के रिश्ते को समझा रहे हैं।जितना राहुल का समर्थन, उतना ही प्रधानमंत्री का विरोध– राहुल गांधी के कुत्ते को बिस्कुट खिलाते हुए ट्वीट पर असम के भाजपा नेता, जो पूर्व में कांग्रेस में थे, ने प्रतिक्रिया दी कि मुझसे बेहतर कौन जानता है कि जब मैं असम की समस्याओं के बारे में बात करना चाहता था तो वह बिस्कुट ही खिला रहे थे। इस पर स्वाति ने प्रतिक्रिया दी कि कुत्ते की वफादारी पर भरोसा कर सकते हैं, लेकिन दल-बदलुओं पर नहीं ।23 अक्टूबर को एक ट्वीट में राहुल गांधी की तारीफ करते हुए उन्होंने लिखा कि अब उनके पास अच्छा लिखने वाले लोग हैं, जिन्होंने गब्बर सिंह टैक्स का बढ़िया जुमला लिखा है।

लेकिन 26 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान पर कि उपभोक्ताओं के अधिकारों की बात वेदों में भी कही गई है , कटाक्ष करते हुए प्रतिक्रिया दी कि आधार संख्या का भी उल्लेख वेदों में मिलता है और शायद यह ऋग्वेद की पहली ऋचा रही हो।25 अक्टूबर को एक ट्विट में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादकीय निर्णय पर लिखा कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने यह निर्णय एचटी समिट में प्रधानमंत्री को बुलाने के लिए लिया है।22 अक्टूबर को किए गए ट्वीट से ऐसा लगता है, जैसे कोई निष्पक्ष पत्रकार नहीं, बल्कि एक कांग्रेसी नेता बयान दे रहा हो। प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात की जनसभा में कहा कि कांग्रेस जान -बूझकर परियोजनाओं को लटकाने का काम करती रही है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वाति ने लिखा कि- हां, भाजपा 22 साल तक गुजरात में और तीन साल तक केन्द्र में सत्ता में रही। यह सब तो कांग्रेस की ही गलती है!

राहुल गांधी के समर्थन में खुलकर बोलती हैं, लेकिन अपने को निष्पक्ष पत्रकार बताती हैं– केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रेस कांफ्रेस में राहुल गांधी को failed politician क्या कह दिया कि इन्होंने पलटकर स्मृति ईरानी को जवाब देना अपना धर्म समझ लिया। 20 सितंबर के ट्वीट में लिखा कि स्मृति ईरानी ने एक failed politician पर एक पूरी कांफ्रेस कर दी। मैडम उन्होंने आपको चुनाव में हराया है। 20 अक्टूबर को एक ट्वीट में आज तक चैनल की एंकर अंजना ओम कश्यप को जवाब देते हुए लिखा कि मैं अंजना की तरह से किसी दल या नेता से संबंधित नहीं हूं। मेरा संबंध सिर्फ और सिर्फ पत्रकारिता से है।

लेकिन जिस तरह से वे राहुल और कांग्रेस के समर्थन में लेख और सोशल मीडिया पर बयानबाजी करते हुए सक्रिय रहती हैं, उससे उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता की जगह कांग्रेस की स्वामिभक्ति ही नजर आती है।

कानून व्यवस्था के मुद्दों पर एजेंडा चलाना
कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्यों की चुनी हुई सरकारों की है, लेकिन कर्नाटक में जहां कांग्रेस की सरकार सत्ता में है, वहां पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को भगवा आतंकवाद से जोड़कर, कांग्रेस के भगवा आतंकवाद के एजेंडे को हवा देने का प्रयास किया।दूसरी तरफ, केरल में भाजपा और आरएसएस कार्यकर्ताओं की हो रही राजनीति हत्याओं के बारे में सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार के बयान से दूर रहना और लेखों में उस मुद्दे से परहेज करना, यह बताता है कि असल में वे कांग्रेसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम अपनी पत्रकारिता के माध्यम से कर रही हैं।

आज दो महीने बाद भी कर्नाटक की सरकार उन हत्यारों को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकी है, लेकिन स्वाति इस विषय में कोई आवाज उठाते हुए नजर नहीं आ रही हैं। कर्नाटक में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को भगवा आतंकवाद का नाम दिया जाता है तो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम विरोधी कारनामे के रूप में एजेंडा चलाया जाता है।

वहीं केरल की तरह से पश्चिम बंगाल के दंगों पर भी उनकी कलम बंद हो गई। बशीरहाट में जुलाई में हुए दंगों में, जिसमें मुस्लिम संप्रदाय के लोगों ने एक हिन्दू युवक की इस बात पर जमकर पिटाई कर दी कि उसने फेसबुक पर मोहम्मद साहब के खिलाफ कुछ गलत लिख दिया था, जिससे दंगा भड़क उठा। यह मुद्दा एजेंडे में फिट नहीं बैठता था, इसलिए इस पर मौन साध लिया गया।

बच्चों के मौत पर भी राजनीतिक एजेंडा– देश के अलग-अलग राज्यों में मानसून के दौरान बच्चों की इंफेक्शन के कारण मौतें हुई, जो निसंदेह एक दुःखद घटना है, लेकिन ‘निष्पक्ष’ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने गुजरात में 9 बच्चों की हुई मौत और उससे पहले उत्तर प्रदेश में हुई बच्चों की मौतों पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि क्या यह योगी मॉडल या गुजरात मॉडल है, जबकि कर्नाटक में जहां कांग्रेस की सरकार है, वहां 90 बच्चों की मौत होती है, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया या लेख से परहेज कर लिया जाता है।


कांग्रेस के एजेंडे के लिए झूठी तस्वीरों का सहारा लेना– बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में, सितंबर में छात्राओं के धरना-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को अति रंजित करके पेश करने के लिए, सहारनपुर में हुई मार-पीट में घायल एक लड़की की तस्वीर को, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की तस्वीर बताकर ट्वीट कर दिया, ताकि देश में और अधिक रोष पैदा हो और दुनिया को बताया जाए कि प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में पुलिस हिंसा कर रही है।

इस घटना को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अनुभवहीनता से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि वह केवल गोरखनाथ मठ चलाने में ही सक्षम हैं, लेकिन पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल में हो रही हत्याओं और दंगों के लिए वहां के मुख्यमंत्रियों के अनुभव पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जाता है और न ही उस पर कोई प्रतिक्रिया दी जाती है।

विकास के मुद्दे पर भी राजनीतिक एजेंडा- सड़कें विकास का मुख्य पैमाना हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अमेरिका की यात्रा पर गये थे, जहां उन्होंने राज्य की सड़कों की तारीफ की थी। उस पर कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कुछ तस्वीरों के साथ एक ट्विट किया, जिस पर स्वाति का ट्वीट था-
लेकिन कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु की सड़कों पर 15,935 गड्डों पर आई रिपोर्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

पत्रकार का एक धर्म होता है, जनता के विकास और हक की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना, लेकिन जब इस धर्म पर राजनीतिक एजेंडा हावी होता है तो पत्रकारिता की विश्वसनियता और प्रजातंत्र में उसकी उपयोगिता का अंत हो जाता है।

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