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कांग्रेस के वीआईपी – कभी भी खुल जाते हैं कोर्ट के भी दरवाजे

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28 अगस्त को पुलिस की छापेमारी, 5 तथाकथित बुद्धिजीवी गिरफ्तार, 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, गिरफ्तारी पर रोक
30 जुलाई की सुबह फांसी का आदेश, 29 जुलाई को रात भर आतंकवादी याकूब मेमन मामले में सुनवाई, पूरी रात चली बहस

क्या कभी ऐसी स्थिति किसी आदमी के साथ हुई है। क्या आप ऐसा कोई केस जानते हैं जिसमें किसी आम आदमी के लिए कोर्ट में रात भर सुनवाई हुई हो या फिर एक दिन बाद ही कोर्ट में मामले को सुना गया हो। दरअसल इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह कांग्रेसी या उससे जुड़े वकीलों की ऐसी फौज है, जो कोर्ट पहुंचती है और फिर माहौल पैदा कर दबाव बनाने की कोशिश करती है। आतंकवादियों के लिए आधी रात को भी कोर्ट जाने वाले इन वकीलों में प्रशांत भूषण, अभिषेक मनु सिंघवी, तुषार मेहता, कपिल सिब्बल, इंदिरा जय सिंह जैसे नाम शामिल हैं। लेकिन सवाल ये कि क्या किसी गरीब या आम आदमी के लिए आपने इन्हें कभी खड़ा होते हुए देखा है?

दरअसल बीते छह दशकों में कांग्रेस ने ऐसा सिस्टम विकसित किया है जिससे देश के आम आदमी के लिए सुप्रीम कोर्ट क्या, निचली अदालतों में भी अपनी अर्जी देने और सुनवाई करवाने में सालों-साल लग जाते हैं, लेकिन मामला आतंकियों और नक्सलियों का हो तो सुप्रीम कोर्ट में सीधे अर्जी दी जाती है।

कांग्रेसी वकीलों को आम लोग नजर नहीं आते

बिना जुर्म के कैद में रहे 38 साल
उत्तर प्रदेश के 80 साल के जगजीवन राम यादव जीवन को बिना किसी जुर्म के 38 साल जेल में बिताने पड़े। 18 जनवरी 2006 को इन्हें बाइज्जत रिहा कर दिया गया।

बिना ट्रायल के कैद में रहे 50 साल
26 अगस्त, 2005 को असम के 77 साल के मचांग लालंग को रिहा गया। 1951 से कैद में रहे लालंग को बिना किसी अपराध के 50 साल से अधिक जेल में बिताने पड़े।

स्कूली बच्चों ने कैदियों को रिहा कराया
बरेली के सेंट फ्रांसिस कॉन्वेंट स्कूल के छात्रों ने पॉकेट मनी 14,000 रुपये जमा किए और जमानत के पैसे नहीं देने के कारण जेल में बंद 14 कैदियों को रिहा करवाया।

एक ही जुर्म के लिए दो बार मिली सजा
गुजरात के 68 साल के दीपक कोहली को 3 साल की सजा के बदले 14 साल जेल में बिताने पड़े। एक ही अपराध के लिए इन्हें दो बार सजा मिली, जबकि अधिकतम सजा भी 10 साल ही होती।

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