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रिजिजू पर आरोप लगाने वाले अफसर की मानसिक हालत देखिए

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क्या संसद पर आतंकी हमला वाजपेयी सरकार ने खुद करवाया था?
क्या मुंबई में आतंकी हमला खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने करवाया?

क्या आप इन दोनों बातों से सहमत हो सकते हैं…. आप शायद बाकी लोगों की तरह सिरे से नकार देंगे। लेकिन भारत सरकार का एक बड़ा अधिकारी सालों पहले यही तर्क दे रहा था। आप समझ सकते हैं इस शख्स की मानसिकता किस हद तक विकृत हो चुकी है। ये शख्स हैं सतीश वर्मा जो इस समय नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिकल पावर लिमिटेड यानी NEEPCO के चीफ विजिलेंस ऑफिसर हैं।

  • सुर्खियों में रहना इस सरकारी अफसर सतीश वर्मा की आदत है, लेकिन अक्सर वो ऐसे कारणों से चर्चा में रहते हैं जो नेगेटिव होते हैं। इस बार उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में एक भ्रष्ट ठेकेदार को केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री का रिश्तेदार बताकर सुर्खियां बटोरी हैं।
  • आप सोचेंगे कि सालों बाद इस प्रकरण को क्यों याद किया जा रहा है, दरअसल इस शख्स ने एक बार फिर ऐसा ही शिगूफा छोड़ा है, जिसके बाद कांग्रेस ने फिर संसद को ठप करने का नया तरीका ढूंढ लिया है। इस बार NEEPCO के चीफ विजिलेंस ऑफिसर सतीश वर्मा के निशाने पर केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू हैं। रिजिजू का दोष ये है कि उनका टाइटल एक आरोपी शख्स के टाइटल से मिलता है। ऐसे में इस विकृत मानसिकता के शख्स सतीश वर्मा ने दोनों को भाई ठहरा दिया है।
  • सतीश वर्मा ने 450 करोड़ के घोटाले का पर्दाफाश करने का दावा किया है। इस दावे से आगे बढ़ते हुए उन्होंने जो एक और दावा कर डाला है वो ये कि इस मामले में आरोपी ठेकेदार गोबोई रिजिजू केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री के रिश्तेदार हैं।
  • इस आशय की रिपोर्ट एक अंग्रेजी अखबार में छपते ही राजनीति गरम हो उठी। और एक बार फिर सतीश वर्मा सुर्खियों में आ गये।
  • जबकि दोनों के टाइटल जरूर रिजिजू हैं लेकिन ये दोनों चचेरे, फूफेरे या किसी भी तरीके से एक-दूसरे के भाई नहीं हैं जैसा कि सतीश वर्मा दावा कर रहे हैं।

खुद केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने रिश्ते की बात को नकारा है। वहीं ये बात भी सामने आ रही है कि गोबोई रिजिजू को हाइड्रल प्रोजेक्ट में जो ठेका मिला था, वो कांग्रेस के शासनकाल में मिला था। जो भ्रष्टाचार की बात सामने आयी है, उसका समय भी कांग्रेस का शासनकाल है।

ऐसे में भ्रष्टाचार के एक आरोपी को सिर्फ इसलिए केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री से जोड़ देना कि दोनों का टाइटल रिजिजू है, लोगों को पच नहीं रहा है। लेकिन राजनीति में विपक्ष को बस मौका मिलना चाहिए और सतीश वर्मा इसके लिए हथियार बनते दिख रहे हैं। ऐसा वो जानबूझ कर करते हैं।

आपको याद होगा कि सतीश वर्मा वही अफसर हैं जिन्होंने संसद पर हमला और मुम्बई पर 26/11के आतंकी हमलों के लिए तत्कालीन सरकारों को ही दोषी ठहराया था। उन्होंने तर्क दिया था कि आतंकवाद के खिलाफ कानून सख्त करने के लिए इन सरकारों ने ही ये हमले कराए थे। अब आप समझ सकते हैं कि जिन हमलों को पाकिस्तान से संचालित होने के सबूत अमेरिका तक के पास हैं, जिन हमलों के लिए ज़िम्मेदार लोगों की गिरफ्तारी के लिए लगातार भारत सरकार पाकिस्तान को मोस्ट वांटेड लोगों की लिस्ट भेजती रही है, सतीश वर्मा उन हमलों के लिए अपनी ही सरकार को दोषी मानते हैं। ये वही सोच है जो पाकिस्तान की आईएसआई के पास होती है।

ये वही सतीश वर्मा हैं जिन पर गृह मंत्रालय के पूर्व अंडर सेक्रेटरी आरवीएस मणि ने अनर्गल तथ्य कबूल कराने की कोशिश के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था। मणि ने 21 जून 2013 को केन्द्रीय शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्णा को इस पूछताछ के बारे में बताया था। एसआईटी की ओर से मणि से पूछताछ के दौरान भी सतीश वर्मा ने संसद और मुम्बई अटैक के लिए खुद अपनी ही सरकार को ज़िम्मेदार बताया था जिसे सुनकर मणि स्तब्ध रह गये थे। आरवीएस मणि ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि पूछताछ के दौरान उन्हें सिगरेट से दागा गया था। हालांकि सतीश वर्मा ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था।

इशरत जहां के लश्कर तैयबा की आत्मघाती आतंकवादी साबित हो जाने के बावजूद सतीश वर्मा इस सच्चाई को मानने को तैयार नहीं हैं। मणि ने इस मामले में भी आरोप लगाया है कि इशरत के आतंकी होने की आईबी रिपोर्ट को झुठलाने के लिए भी सतीश वर्मा ने दबाव डाला था।

सतीश वर्मा के अतीत को देखते हुए ये तो साफ है कि सुर्खियों में रहना उनकी फितरत है। लेकिन जिस तरीके से कांग्रेस इसे एक मुद्दा बनाने में लगी है और सूत्रों के मुताबिक इस बहाने संसद में हंगामे की योजना बना रही है। वो अफसोसजनक है। माना जा रहा है कि हर बार की तरह इस बार भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ सकती है।

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