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रोहिंग्या मुसलमानों ने किया हिंदुओं का नरसंहार-एमनेस्टी इंटरनेशनल

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जिन रोहिंग्या मुसलमानों को राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शरणार्थी का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं, उसके बारे में विश्व की सबसे बड़ी मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सनसनीखेज खुलासा किया है। 23 मई को जारी अपनी रिपोर्ट में एमनेस्टी ने कहा है कि अराकान रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (ARSA)  ने सैकड़ों हिंदुओं की सामूहिक हत्या की थी। संस्था ने 99 लोगों के नरसंहार की बात स्वीकार किया है। हालांकि स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स में ये संख्या लगभग 1000 बताई जा रही है।

दरअसल म्यांमार के बौद्ध और हिंदू, दोनों समुदायों के लोग कई वर्षों से कहते आ रहे हैं कि रोहिंग्या मुसलमान क्रूर हैं, वे इस्लाम छोड़कर किसी दूसरे धर्म को देखना नहीं चाहते, ये आतंकवादी हैं और वे गैर मुस्लिमों का नरसंहार करते हैं।  हालांकि उनकी बातों को किसी ने तवज्जो नहीं दी थी, परन्तु अब इस बात के पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं कि रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिये दया के पात्र कतई नहीं हैं।

म्यांमार में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार के सामने आए सबूत
एमनेस्टी इंटरनेशनल की जांच के अनुसार रोहिंग्या मुसलमान आतंकवादियों ने 2017 के अगस्त में म्यांमार के सैकड़ों हिंदू नागरिकों की सामूहिक हत्या की थी। इस नरसंहार को ‘आरसा’ नाम के संगठन ने अंजाम दिया था, जिसने 99 निर्दोष लोगों को क्रूर तरीके से मौत के घाट उतार दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार 26 अगस्त, 2017 को ‘आरसा’ के आतंकवादियों ने म्यामांर में रखाइन प्रांत के ‘अह नौक खा मौंग सेक’ गांव के सभी पुरुषों को सामूहिक तौर पर मार दिया और महिलाओं को बंदी बना लिया था। बच्चों के सामने ही उनके परिजनों की सामूहिक हत्या की गई और बाद में उन्हें सामूहिक कब्र में दफना दिया गया।

शरणार्थी कैंप में भी हिंदुओं पर जुल्म कर रहे रोहिंग्या मुसलमान
जिन रोहिंग्या मुसलमानों के लिए पूरी दुनिया मानवाधिकार की बात कह रही है, वही लोग दूसरे धर्मों के लोगों के मानवाधिकार का हनन करने में लगे हैं।  बांग्लादेश के राहत कैंपों में रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में शरण लिए हुए हिंदुओं की हत्या कर रहे हैं। हिंदू महिलाओं को इस्लाम स्वीकार करने और शादी के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्हें मुस्लिम बनने और रोहिंग्या मुसलमान से शादी करने को कहा जाता है। दुखद पहलू ये है कि समर्पण के अलावा उनके पास विकल्प नहीं है।

रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने की रची गई साजिश
जम्मू और सांबा में बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये बसे हुए हैं। ये लोग राजीव नगर, कासिम नगर, नरवाल, भंठिड़ी, बोहड़ी, छन्नी हिम्मत, नगरोटा और अन्य क्षेत्रों में बड़ी तादाद में हैं। दरअसल इन क्षेत्रों के भौगोलिक और जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए ही इन्हें बसाने की साजिश रची गई है। गौरतलब है कि 2010 से लेकर अब तक रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या में करीब चार गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हाल में हरियाणा के गुरुग्राम में खुले में नमाज के लिए जो विवाद उत्पन्न हुआ था, वह भी इन्हीं घुसपैठियों की बढ़ती आबादी के कारण था। ध्यान देने की बात यह भी है कि कई कट्टरपंथी संगठन जिस तरह से रोहिंग्या मुसलमानों के साथ खड़े हो रहे हैं, इससे एक बड़ी साजिश की भी बू आ रही है। 

देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं रोहिंग्या मुसलमान
कांग्रेस, टीएमसी, लेफ्ट, एआईएआईएम, समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे राजनीतिक दल रोहिंग्या मुसलमानों को वोट बैंक की नजर से देख रहे हैं। जबकि भारत सरकार का मानना है कि रोहिंग्या घुसपैठिये देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। कट्टरपंथी इस्लाम से भी इनका निकट संबंध माना जाता है। दरअसल दिल्ली, जम्मू, हैदराबाद और मेवात में आतंकियों से जुड़े रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठिये पकड़े गए हैं। रोहिंग्या को आतंक का प्रशिक्षण देने वाला अलकायदा का आतंकी समियुन रहमान भी दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। केंद्र सरकार के अनुसार रोहिंग्या आईएसआईएस के साथ पाकिस्तानी और अन्य आतंकी संगठनों से भी जुड़े हो सकते हैं।

बांग्लादेश भी रोहिंग्या मुसलमानों से चाहता है निजात
म्यांमार के पड़ोसी देश इंडोनेशिया और मलेशिया ने मुस्लिम देश होने के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने से इनकार कर दिया है। करीब 50 मुस्लिम देशों ने भी आतंक से रोहिंग्या का नाता देखकर इन्हें शरण देने से मना कर रखा है। ये सुरक्षा संबंधी चिंता ही है जो बांग्लादेश भी रोहिंग्या मुसलमानों से निजात चाहता है। वहां की सरकार ने रोहिंग्या समुदाय के लोगों को फोन कनेक्शन देने पर रोक लगा दी है। अब इन्हें एक अलग द्वीप पर बसाने की योजना बनाई गई है, ताकि बांग्लादेश के आम नागरिकों को मुश्किल न हो।

सेक्युलर पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की जुबान क्यों बंद है?
रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार ने क्यों खदेड़कर भगाया है इसकी सच्चाई सामने है, लेकिन हिंदुओं पर इन रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा किए जा रहे अत्याचार पर सब खामोश हैं। रवीश कुमार, मृणाल पांडे, राणा अयूब, राजदीप सरदेसाई, अभिसार शर्मा, प्रशांत भूषण… जैसे पत्रकार और तथाकथित बुद्धिजीवी यहां भी अपना दोहरा चरित्र दिखा रहे हैं। ये लोग भारत में अवैध रोहिंग्या मुस्लिमों की मदद का आह्वान तो कर रहे हैं, लेकिन अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार करने वालों पर चुप्पी साध रखी है। गौरतलब है कि रखाइन में बहुत से ऐसे इलाके हैं, जहां रोहिंग्या मुसलमानों ने हिंदुओं की पूरी आबादी को खत्म कर दिया है। जाहिर है सिलेक्टिव रिपोर्टिंग के तहत पूरे मुद्दे का धार्मिक विभाजन कर दिया गया है और रोहिंग्या मुसलमानों के दर्द को ही दिखाया जाता है।

बॉलीवुड के सेक्यूलरों को रोहिंग्या हिंदुओं और कश्मीरी पंडितों का दर्द क्यों नहीं दिखता?
21 मई को बॉलीवुड की जानी-मानी हस्ती प्रियंका चोपड़ा बांग्लादेश के कॉक्स बाजार रोहिंग्या शरणार्थी कैंप में गईं। उन्होंने लिखा कि वे इन्हें हमारी मदद की जरूरत है और दुनिया को इनकी मदद करनी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि हर जरूरतमंद को मानवीय मदद जरूर मिलनी चाहिए, लेकिन सवाल ये कि मानवाधिकार के मामले भी धार्मिक आधार पर सिलेक्टिव होंगे क्या? गौरतलब है कि  प्रियंका चोपड़ा अक्सर दिल्ल-एनसीआर आती हैं और उन्होंने यहां के शरणार्थी कैंपों में रह रहे कश्मीरी पंडितों का हाल-चाल जानने की भी कभी कोशिश नहीं की। सवाल ये है कि सिलेक्टिव सेंसिटिविटी दिखाकर क्या प्रियंका चोपड़ा या इनके जैसी अन्य हस्तियां मानवीय मूल्यों का उपहास नहीं उड़ा रही हैं?

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