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रोहिंग्या के हमदर्द, कश्मीरी पंडितों के लिए पेट में दर्द !

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देश में कुछ लोगों और संस्थाओं की ओर से एक ऐसी छवि बनाने की कोशिश दिख रही है कि रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ के लिए भारत सरकार के हृदय में वेदना नहीं है। लेकिन इस कोशिश के अंदर से एक साजिश की बू आती है क्योंकि इसमें उस पहलू की जानबूझकर अनदेखी की जाती है जो पहलू देश की सुरक्षा से जुड़ा है। मोदी सरकार का संकल्प रहा है कि वो ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से खिलवाड़ नहीं होने देगी। अपनी उसी भावना के आधार पर वो रोहिंग्या के मुद्दे को भी देख रही है, क्योंकि रोहिंग्या अगर देश के लिए खतरा बने तो फिर वो एक नई समस्या होगी जिसे दूर करने में न जाने देश को कितने संसाधन झोंकने पड़ेंगे और कितने साल खप जाएंगे।  

रोहिंग्या के पैरोकार हिंदुओं की सामूहिक हत्या पर मौन

खतरा एक नये घटनाक्रम से और गंभीर रूप में उभरकर सामने आया है। म्यांमार सेना प्रमुख की वेबसाइट पर पोस्ट किये गए एक बयान में ये दावा किया गया है कि हिंसाग्रस्त रखाइन स्टेट में जिन 28 हिंदुओं की सामूहिक कब्र मिली है उन्हें रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने मारा है। पोस्ट के मुताबिक रखाइन में अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA) के आतंकियों ने काफी क्रूर और हिंसक तरीके से इन हिंदुओं की हत्या की। ताज्जुब तो इस बात का होता है कि जो लोग रोहिंग्या के प्रति अपनी कथित संवेदनाओं को लगातार जताते रहे हैं वो हिंदुओं की सामूहिक हत्या जैसे मुद्दे पर मौनव्रत में नजर आते हैं।

करीब 50 मुस्लिम देशों का रोहिंग्या को अपनाने से इनकार

रोहिंग्या के असदुद्दीन ओवैसी जैसे पैरोकारों की दलील है कि ‘दर-दर की ठोकरें खाने वाले’ रोहिंग्या को 125 करोड़ की आबादी वाला देश शरण दे ही देगा तो क्या फर्क पड़ जाएगा। लेकिन ये पैरोकार इस विसंगति से आंखें मूंदे रह जाते हैं कि रोहिंग्या जिन देशों के नागरिक हैं वही इन्हें आतंकी मानते हुए अपने यहां रखना नहीं चाहते। म्यांमार के दूसरे पड़ोसी देश बांग्लादेश, इंडोनेशिया, थाइलैंड भी रोहिंग्या को शरण देने को तैयार नहीं। ये सुरक्षा संबंधी चिंता ही है जो बांग्लादेश में रोहिंग्या समुदाय के लोगों को फोन कनेक्शन देने पर रोक लगा दी गई है। ये साफ किया गया है कि जिन कंपनियों ने रोहिंग्या लोगों को फोन कनेक्शन दिया, उन पर जुर्माना होगा। एक जानकारी के मुताबिक करीब 50 मुस्लिम देशों ने आतंक से रोहिंग्या का नाता देखकर इन्हें शरण देने से मना कर रखा है। ऐसे में फिर भारत में इनके प्रति हमदर्दी को आने वाले समय के लिए वोट बैंक के इंतजाम की कोशिश के रूप में क्यों ना देखा जाए?

भारत में आतंकी गतिविधियों के लिए रोहिंग्या का इस्तेमाल

कुछ खुफिया जानकारियों ने इस बात की तस्दीक की है कि रोहिंग्या समुदाय के कुछ सदस्य अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों से जुड़े हुए हैं। इनमें से कुछ संगठन ‘टेररिस्तान’ बने पाकिस्तान स्थित हैं। पिछले दिनों रोहिंग्या को आतंक का प्रशिक्षण देने वाला अल कायदा का आतंकी भी दिल्ली से गिरफ्तार किया जा चुका है। 28 वर्षीय समियुन रहमान वैसे तो मूल रूप से बंग्लादेशी है, लेकिन उसने ब्रिटिश नागरिकता ले रखी थी। इसकी योजना दिल्ली, मणिपुर और मिजोरम में बेस बनाकर रोहिंग्या शरणार्थियों की अलकायदा में भर्ती करने की थी। इस अल कायदा आतंकी ने बताया कि वो दिल्ली, बिहार, झारखंड के हजारीबाग और उत्तरी-पूर्वी कश्मीर में 12 रोहिंग्या शरणार्थियों के संपर्क में था।

रोहिंग्या के पैरोकार कर रहे देशहित से खिलवाड़

गृह मंत्री राजनाथ सिंह का साफ-साफ कहना है कि म्यांमार से भारत में घुस आए रोहिंग्या मुसलमान, शरणार्थी नहीं हैं और इस वास्तविकता को हमें समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि शरणार्थी का दर्जा प्राप्त करने की एक प्रक्रिया होती है और इनमें से किसी ने भी इस प्रक्रिया को पूरा नहीं किया है। लेकिन प्रशांत भूषण जैसे वकीलों का तो रोहिंग्या पर ऐसा दिल आया है कि वो रोहिंग्या को भारत में बसाने और बढ़ाने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे नजर आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या मुसलमानों के लिए प्रशांत भूषण पैरवी में लगे हुए हैं जहां सरकार ने देश की सुरक्षा के पक्ष को मजबूती से उठाया है।

‘टेररिस्तान’ भी कर सकता है रोहिंग्या का इस्तेमाल

भारत में कुछ खास संगठनों और लोगों की ओर से रोहिंग्या मुसलमानों को जम्मू और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में बसाने पर जोर दिख रहा है। इसके खिलाफ जम्मू कश्मीर के इन हिस्सों में समय-समय पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं। विरोध करने वाले अपने साथ ही देश की सुरक्षा का भी हवाला देते हैं। दरअसल राज्य में कुछ ऐसी वारदातें हो चुकी हैं, जिनमें रोहिंग्या शरणार्थियों के शामिल होने की बात सामने आ चुकी है। जम्मू कश्मीर में 38 रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ 17 एफआईआर भी दर्ज की जा चुकी है। इन्हें हटाने की मांग कुछ खास हिंसक घटनाओं के बाद और जोर पकड़ने लगी। पिछले साल अक्टूबर में एक मुठभेड़ में मारे गए दो आतंकियों में से एक म्यांमार का निकला था। डर ये भी है कि पाकिस्तान रोहिंग्या समुदाय को अपना समर्थन देकर उनका भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे में जम्मू कश्मीर में आतंक का सफाया करने में जुटी सरकार के लिए दोहरी चुनौती सामने होगी। 

काश! कश्मीरी पंडितों के लिए भी आवाज उठती

लेकिन खतरे जताती इन तमाम तस्वीरों से रोहिंग्या के पक्षकारों को कोई परवाह नहीं। क्या ये अच्छा नहीं होता कि रोहिंग्या की जगह इन्होंने ये आवाज बुलंद की होती कि सभी कश्मीरी पंडित अपने कश्मीर में ही रहेंगे। अपनी जड़-जमीन छोड़ने को बेबस कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं। लेकिन सच ये है कि रोहिंग्या के हमदर्द को कश्मीरी पंडितों के हक की बात से ही पेट में दर्द होने लगता है। ये 40 हजार उन रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में अपनी पूरी ताकत तो लगा सकते हैं जिनका भारत से कोई नाता  नहीं, लेकिन उन तीन लाख कश्मीरी पंडितों के लिए इनके दिल में कोई जगह नहीं जिन्हें अपने ही घर-मकान से निकाल दिया गया था।  

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