Home विशेष कठुआ मामले को तूल देने के पीछे कहीं रोहिंग्या मुद्दा तो नहीं!

कठुआ मामले को तूल देने के पीछे कहीं रोहिंग्या मुद्दा तो नहीं!

580
SHARE

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। जनवरी महीने में हुए इस अपराध की जांच की गई और लगभग चार महीने बाद, जब पुलिस अदालत में आरोप पत्र दाखिल करने वाली थी तो सोशल मीडिया और न्यूज वेबसाइट पर बच्ची की तस्वीर के साथ खबरों को प्रकाशित किया जाने लगा। जम्मू-कश्मीर के दो समाचार पत्रों ने पहले बच्ची की तस्वीर के साथ खबर छापी, उसके बाद कुछ समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों ने तस्वीर को दिखाना शुरु कर दिया।

इसके बाद एक रणनीति के तहत कांग्रेस और लेफ्ट के साथ मीडिया के लोग एकाएक चार महीने पुरानी घटना पर सक्रिय हो गए। असल में इसके पीछे कांग्रेस और पक्षकार पत्रकारों का एक दूसरा ही खेल चल रहा है। दरअसल जम्मू में रोहिंग्या मुस्लिमों को बसाने का लगातार विरोध हो रहा है। लोग सड़कों पर निकल रहे हैं। पिछले दिनों जब विदेशी रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने के खिलाफ जम्मू के हिंदू सोशल मीडिया के साथ सड़कों पर निकलने लगे और उन्हें भगाने के लिए प्रदर्शन करने लगे तो हिंदुओं के विरूद्ध कांग्रेस के साथ कथित सेक्यूलर पक्षकार और वामपंथी समूह सक्रिय होकर अभियान चलाने लगे।

बच्ची को बनाया गया मोहरा!
दरअसल, जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्या मुसलमानों को अवैध रूप से बसाया जा रहा है। वोट बैंक की राजनीति के लिए रोहिंग्या मुसलमानों के अवैध रूप से बसने से यहां के स्थानीय निवासी कई तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में बताया जा रहा है कि रोहिंग्या मामले को दबाने के लिए छोटी बच्ची को मोहरा बनाते हुए चार महीने पुरानी घटना को उछाला गया। इस कठुआ मामले में रोहिंग्या का हाथ होने का अंदेशा भी जताया जा रहा है। हिंदुओं के मंदिर में कथित रेप की घटना पर जम्मू के हिंदू खुद ही सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।

मंदिर में तहखाने की बात झूठी
इस पूरे प्रकरण में यह बात भी फैलाई जा रही है कि मंदिर में तहखाना है। तो क्या कोई मीडिया का आदमी उस तहखाने तक पहुंचा है। इतना ही नहीं बिना सबूत हिंदुओं और मंदिर के खिलाफ जहर उगला जा रहा है और पूरे समुदाय को बदनाम किया जा रहा है। आरोप ये है कि मंदिर में चार दिनों तक बच्ची को कैद रखा गया। तथ्य यह है कि मंदिर खुला हुआ है और वहां सुबह-शाम पूजा की जाती है, ऐसे में किसी को चार दिन तक कैसे कैद रखा जा सकता है। जाहिर है यह एक घिनौना अपराध था और इसके दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन इस रेप केस के साथ एक्टिव कुछ संगठन और लोग जिस मंशा के साथ काम कर रहे हैं उसे भी समझना जरूरी है। वे चाहते हैं कि रोहिंग्या के खिलाफ जम्मू के हिंदु जो आवाज उठा रहे हैं उसे खामोश किया जा सके। कठुआ रेप और मर्डर मामले को लेकर लगातार कैंपेन चलाया जा रहा है ताकि हिंदुओं को मुस्लिम विरोधी ठहराया जा सके और जम्मू में रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने को लेकर हो रहे विरोध को दबाया जा सके।

कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान
रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। म्यांमार सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है, हालांकि वहां ये कई पीढ़ियों से रह रहे हैं। ऐसे में पिछले करीब सात साल से वहां की सेना और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच एक संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। इस दौरान एक लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान विस्थापित हो चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 40,000 रोहिंग्या मुसलमान हैं जिन्हें कुछ खास संगठनों और लोगों की ओर से जम्मू और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में बसाने पर जोर दिख रहा है।

रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने के खिलाफ प्रदर्शन
जम्मू में रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने के खिलाफ पिछले कई महीनों से प्रदर्शन के दौर चलते रहे हैं। यहां अवैध रूप से बसे रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को बाहर निकाले जाने की मांग को लेकर नेशनल पैंथर्स पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी प्रदर्शन किया था। इनका कहना है कि जिन लोगों को आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने पर म्यांमार से बाहर निकाल दिया गया, वे जम्मू में आकर अवैध रूप से बस गए हैं। ये डोगरों की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए रोहिंग्या और बांग्लादेशी लोगों को खतरा बताते हैं। 

जम्मू और लद्दाख में बढ़ते जा रहे ‘रोहिंग्या’
दरअसल जम्मू व सांबा में बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी बसे हुए हैं। ये लोग राजीव नगर, कासिम नगर, नरवाल, भंठिड़ी, बोहड़ी, छन्नी हिम्मत, नगरोटा व अन्य क्षेत्रों में बसे हुए है। इन लोगों के बसने से जम्मू की भौगोलिक स्थिति के तब्दील होने का खतरा 2010 से लेकर अब तक रोहिंग्या और बांग्लादेशी शरणार्थियों की संख्या में करीब तीन गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एक जानकारी के मुताबिक जम्मू में 5,086, सांबा जिले में 634 और लद्दाख में सबसे अधिक 7,664 रोहिंग्या मुसलमानों ने अपने ठिकानें बना रखे हैं। है। चिंता की बात इसलिए भी है क्योंकि 38 रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ 17 एफआईआर भी दर्ज की जा चुकी है। इन्हें हटाने की मांग कुछ खास हिंसक घटनाओं के बाद और जोर पकड़ने लगी। पिछले साल अक्टूबर में एक मुठभेड़ में मारे गए दो आतंकियों में से एक म्यांमार का निकला था।

क्या हो सकता है ‘रोहिंग्या’ की रिहायश का राज?
सवाल है कि जम्मू कश्मीर ही इनकी असली जगह क्यों बन रहा है? अखबारों में ऐसी रिपोर्ट आती रही है कि कुछ खास मुस्लिम संगठन रोहिंग्या और बांग्लादेशी अवैध मुस्लिम शरणार्थियों को जम्मू और लद्दाख में बसाने की कवायद में जुटे हुए हैं। लोगों ने इस कोशिश को देश के खिलाफ साजिश बताते हुए पुलिस-प्रशासन से इन विदेशियों को निकाले जाने की मांग की थी। एक तरफ जम्मू सिटीजन फोरम जैसी संस्था ने इनकी रिहायश को अवैध बताते हुए इन्हें निकाले जाने की मांग की थी तो जम्मू मुस्लिम ऐक्शन कमेटी इनके बचाव में उतरी नजर आई। जम्मू चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (JCCI) ने तो यहां तक एलान कर दिया था कि अगर सरकार ने इन शरणार्थियों को बाहर निकालने की पहल नहीं की तो वह लोग खुद सीधी कार्रवाई करेगा।

राज्य में सांख्यिकीय बदलाव की कोशिश
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी रोहिंग्या मुसलमान और बांग्लादेशी मुसलमानों की पृष्ठभूमि की जांच को कहा था। उन्होंने कहा था : ‘’कुछ लोग एक तरफ तो पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों को पहचान पत्र जारी करने को लेकर सवाल करते हैं लेकिन रोहिंग्या और बांग्लादेशी शरणार्थियों को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताते। इससे लगता है कि एक निहित स्वार्थ के चलते ऐसा किया जा रहा हो। कुछ खास तरह के विदेशियों के रहने का समर्थन कर वो राज्य में सांख्यिकीय बदलाव चाहते हैं।‘’

फिर तो धारा 370 का मतलब क्या?
जम्मू कश्मीर को धारा 370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। इस धारा के तहत देश के ही दूसरे राज्यों के नागरिकों को यहां जमीन के मालिकाना हक की अनुमति नहीं। इसी धारा में 370 में बाद में जोड़े गए अनुच्छेद 35(ए) के तहत जम्मू कश्मीर का नागरिक तभी राज्य का हिस्सा माना जाएगा जब वो वहां पैदा हुआ हो। यानी एक तरफ तो कोई भी दूसरा नागरिक जम्मू कश्मीर में ना तो संपत्ति खरीद सकता है और ना ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता है, दूसरी ओर राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों के पैरोकार उभरकर सामने आ रहे हैं जो इन्हें यहां बसाने पर आमादा हैं। ऐसे में धारा 370 के औचित्य का सवालों में आना लाजमी है।

अवैध शरणार्थियों को निकाले जाने की पहल में अड़ंगा
भारत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में भी है। रोहिंग्या समुदाय ने भारत से निकाले जाने की तेज हुई मांगों के बीच सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग करते हुए अर्जी दे रखी है। उन्होंने मीडिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा है कि गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने संसद में बयान दिया है कि केंद्र सरकार ने राज्यों को रोहिंग्या सहित अवैध अप्रवासियों की पहचान करने और उन्हें देश से निकालने का निर्देश दिया है। रोहिंग्या मुसलमानों के लिए यहां प्रशांत भूषण पैरवी में लगे हुए हैं। ऐसे में आगे उस कवायद की दरकार है ताकि प्रशांत भूषण जैसों की हमदर्दी देश की सुरक्षा पर भारी ना पड़े।

रोहिंग्या शरणार्थी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा
म्यांमार के सभी पड़ोसी देश रोहिंग्या शरणार्थियों को अपने देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा मानते हैं। भारत सरकार का भी मानना है कि रोहिंग्या शरणार्थी देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकते हैं। इसके पीछे सरकार के कई ऐसे दावे हैं जिनको खारिज नहीं किया जा सकता।

अलकायदा से कनेक्शन
दिल्ली, जम्मू, हैदराबाद और मेवात में आतंकियों से जुड़े रोहिंग्या पकड़े गए हैं। रेडिकल इस्लाम से इनका निकट संबंध माना जाता है। रोहिंग्या को आतंक का प्रशिक्षण देने वाला अलकायदा का आतंकी भी दिल्ली से गिरफ्तार किया गया है। 28 वर्षीय समियुन रहमान वैसे तो मूल रूप से बंग्लादेशी है, लेकिन उसने ब्रिटिश नागरिकता ले रखी थी है। अलकायदा का यह आतंकी भर्ती और प्रशिक्षण देने का काम करता था। इसकी योजना दिल्ली, मणिपुर और मिजोरम में बेस बनाकर रोहिंग्या शरणार्थियों की अलकायदा में भर्ती करना था। रहमान अलकायदा के टॉप कमांडर से सीधे संपर्क में था और उनके निर्देश पर काम कर रहा था। अलकायदा आतंकी ने बताया कि उसने दिल्ली, बिहार, उत्तरी-पूर्वी कश्मीर और झारखंड के हजारीबाग में 12 रोहिंग्या शरणार्थियों के संपर्क में था।

रोहिंग्या के आतंकियों से जुड़े तार
सरकार का मानना है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के तार कई बड़े आतंकी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं। वैश्विक समस्या बन चुके आईएसआईएस के रोहिंग्या से संबंध होने की आशंका निराधार नहीं है। केंद्र सरकार के पास इसके लिए ठोस आधार है। म्यांमार से खदेड़े गए रोहिंग्या, म्यांमार में उन पर हुई कार्रवाई का बदला भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर ले सकते हैं। भारत के बौद्ध समुदाय को अपना निशाना बना सकते हैं। इसके अलावा रोहिंग्या शरणार्थियों के तार कई अन्य अलगाववादी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं।

पाकिस्तान भी दे रहा है समर्थन
आईएसआईएस के अलावा रोहिंग्या से संबंध पाकिस्तान की एजेंसी आईएसआई से होने की प्रबल आशंका जाहिर की गई है। पाकिस्तान रोहिंग्या शरणार्थियों को समर्थन देकर उनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सकता है। पाकिस्तान हमेशा से ऐसे मौकों की फिराक में रहता है, जब उसे भारत के खिलाफ परोक्ष युद्ध करने का मौका मिले। रोहिंग्या शरणार्थियों के रूप में पाकिस्तान को भारत के खिलाफ एक ऐसा हथियार मिल जाएगा, जिसका वो अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करेगा। रोहिंग्या शरणार्थी पाकिस्तान के मुस्लिम देश होने के कारण प्रति निकटता का भाव रखते हैं। इसलिए पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसुद अजहर ने रोहिंग्या शरणार्थियों को समर्थन दिया है। पाकिस्तान भारत के साथ दुश्मनी निकालने के लिए उनको इस्तेमाल कर सकता है।

रोहिंग्या म्यांमार की आतंक फैलाने के दोषी
केंद्र सरकार का मानना है कि रोहिंग्या शरणार्थी देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा साबित हो सकते हैं। इसके पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह दिया जा रहा है कि म्यांमार ने जब रोहिंग्या को अपने देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा मानकर इनको खदेड़ने का काम कर रही है तो रोहिंग्या शरणार्थी किसी और देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा क्यों नहीं बनेंगे। दरअसल म्यांमार सरकार रोहिंग्या को देश में आतंक फैलाने का दोषी मानती है। इसलिए म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या पर देश में आतंक और हिंसा फैलाने के आरोप में उनको खदेड़ने की कार्रवाई की है। ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमान मूलतः बांग्लादेश के रहने वाले हैं और ये अनाधिकृत रूप से म्यांमार में रह रहे थे। 1962 से 2011 के सैनिक शासन के दौरान तो रोहिंग्या पर सरकार का अंकुश रहा, लोकतंत्र का बदलाव आते रोहिंग्या मुसलमान आतंक फैलाने में जुट गए।

50 से अधिक मुस्लिम देशों का इंकार
दूसरी सबसे बड़ी बात यह समझने की है कि रोहिंग्या शरणार्थी मुस्लिम बहुल हैं। उनकी तादाद का बड़ा हिस्सा मुसलमानों का है, हालांकि उनमें कुछ हिन्दू भी शामिल हैं, लेकिन मुस्लिम बहुल रोहिंग्या शरणार्थियों को 50 से ज्यादा मुस्लिम देशों ने शरण देने से मना कर दिया है। म्यांमार के पड़ोसी और मुस्लिम देश होने के बावजूद मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी इन्हे अपने यहां शरण नहीं देना चाहते। दरअसल ये देश भी इन रोहिंग्या को अपने लिए खतरा मानते हैं। बांग्लादेश ने भी अब रोहिंग्या को खतरा मान लिया है। बांग्लादेश के भीतर भी इस बात का विरोध किया जा रहा हैं। ये मुस्लिम देश भी रोहिंग्या शरणार्थियों को देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा मान रहे हैं। अधिकतर मुस्लिम देश जिनका निर्माण धर्म के आधार पर हुआ है, वे देश अगर अपने मुसलमान भाइयों का शरण देने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे भी भारत सरकार को ऐसी कोई वजह दिखाई नहीं देती जिसके चलते रोहिंग्या शरणार्थियों को देश में शरण दी जाए।

देश में कुछ संगठन कर रहे समर्थन
देश में कुछ ऐसे भी संगठन हैं जो सरकार पर रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने का दबाव बना रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, नेशनल कॉफ्रेंस के उमर अब्दुला और कई अन्य क्षेत्रीय दल रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने की मांग कर रहे हैं। कुछ एनजीओ रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर ज्यादातर प्रदर्शन पश्चिम बंगाल और कश्मीर में हो रहे हैं। वहीं जम्मू और शेष भारत के लोगों में रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण ना देने की आम राय है। कश्मीर के अलगावादी संगठन, हुरियत और कट्टरपंथी नेता रोहिंग्या का समर्थन कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने म्यांमार के पड़ोसी देशों समेत भारत से रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने की अपील की है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के अलावा कई अन्य संगठन भी भारत सरकार पर इसके लिए दबाव बना रहे हैं।

जनकल्याण का पैसा करना होगा
भले ही कागजों में रोहिंग्या का तादाद 40 हजार बतायी जा रही हो, लेकिन असल में इनकी संख्या लाखों में है। ऐसे में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि सरकार अगर लाखों रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देती है तो उसे रोहिंग्या को बसाने के लिए और उनकी देखरेख के लिए उन पर करोड़ों-अरबों रुपया खर्च करना पड़ेगा। जो धनराशि सरकार अपने नागरिकों के कल्याण के लिए खर्च करनी चाहिए, वह धनराशि रोहिंग्या शरणार्थियों पर खर्च होती है, तो इससे देश के नागरिकों का सीधा नुकसान होता है। देश के नागरिक भी यही सवाल खड़ा कर रहे हैं। देश के नागरिकों में आम राय यही है कि जब देश के सामने पहले से समस्याएं हैं तो देश रोहिंग्या को शरण देकर मुसीबत क्यों मोल लेना चाहता है।

वोट बैंक का जरिया न बन जाएं रोहिंग्या
रोहिंग्या को लेकर एक और आशंका गहरा रही है। यह आशंका भी निराधार नहीं है। कुछ राजनीतिक दल और क्षेत्रीय पार्टियां रोहिंग्या को वोटबैंक के रूप में देख रही हैं। वोटबैंक की राजनीति के कारण क्षेत्रीय पार्टियां स्वयं अपने एजेंटों के माध्यम से अवैध शरणार्थियों को बसाने का काम करती हैं। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर पहले से ही वोटबैंक और तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप लगते रहे हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर की कुछ क्षेत्रीय पार्टियां भी रोहिंग्या को अपना वोटबैंक बनाकर राजनीति करने की मंशा रखती हैं। इसी कारण से ये पार्टियां रोहिंग्या शरणार्थियों का पुरजोर समर्थन कर रही हैं। मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति के कारण बांग्लादेशी शरणार्थियों को पश्चिम बंगाल, असम और बिहार में बसाया गया। इसके कारण पश्चिम बंगाल, असम और बिहार की आबादी का समीकरण बिगड़ चुका है। बंगाल के 18 जिलों में हिन्दुओं की जनसंख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। तीन जिलों में हिंदू अल्पसंख्यक बन चुके हैं। असम में मुस्लिम आबादी बढ़कर 30 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

विवादित रहा है रोहिंग्या का इतिहास
रोहिंग्या का इतिहास पर अगर नजर डालें तो तस्वीर पूरी तरह से साफ हो जाती है। रोहिंग्या मुसलमानों की जून 2012 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में स्थानीय बौद्धों के साथ जातीय हिंसा हुई। इस जातीय संघर्ष में लगभग 200 लोग मारे गए जिनमें मुसलमान और बौद्ध दोनों थे। इसके बाद रोहिंग्या ने अक्टूबर 2016 में 9 पुलिस वालों की हत्या कर दी और कई पुलिस चौकियों पर हमले किए। छिटपुट घटनाएं लगातार होती रहीं, लेकिन इसी वर्ष 25 अगस्त को रखाइन प्रांत में रोहिंग्या घुसपैठियों ने दर्जनों पुलिस पोस्ट और एक आर्मी बेस पर हमला करके सरकार की सत्ता को ही चुनौती दे दी। जवाबी कार्रवाई में करीब 400 लोगों की जान चली गई और म्यांमार से रोहिंग्या को खदेड़ने की कार्यवाही आरंभ हुई।

मानवीयता और सहिष्णुता के नाम पर आत्मघात कब तक
सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश मानवीयता और सहिष्णुता के नाम पर आत्मघात कब तक सहन करेगा। इससे सीधे देश के संसाधनों को नुकसान पहुंचता है। साथ ही जो संसाधन सरकार और राजनीतिक दलों को देशवासियों के लिए नीतियां-योजनाएं बनाने और जनकल्याण में उपयोग करना चाहिए, वे संसाधन रोहिंग्या पर खर्च करना कहां की बुद्धिमानी है। मानवीयता और सहिष्णुता का अर्थ तभी तक होता है, जब तक देश की सुरक्षा को कोई खतरा न हो। रोहिंग्या शरणार्थियों में सबसे बड़ा सवाल देश की सुरक्षा व्यवस्था का ही है और मानवीयता और सहिष्णुता के नाम पर देश की सुरक्षा को बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।

LEAVE A REPLY