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मोदी के खिलाफ मुंह खोलते ही बुरे फंसे गये राहुल

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राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर फिर जोरदार हमला बोला, लेकिन ये हमला उल्टा पड़ गया। राहुल ने उद्योगपतियों को दिए 8 लाख करोड़ रुपये के बैड लोन का सवाल उठाया, पर उन्हें ये नहीं मालूम कि उद्योगपतियों को ये लोन कांग्रेस के ही शासनकाल में दिए गये थे। लिहाज़ा खुद राहुल की ओर ही उंगलियां उठ रही हैं।

दरअसल देश के सभी कमर्शियल बैंकों में साल 2015-16 के दौरान कुल बैड लोन 8.32 लाख करोड़ का है। 2014-15 में ये बैड लोन 7.28 लाख करोड़ रुपये था। यानी लगभग 90 फीसदी बैड लोन कांग्रेस सरकार में ही बांटे गये। ऐसे में राहुल गांधी बैड लोन का सवाल उठाकर सस्ती लोकप्रियता बटोरने की कोशिश जरूर कर रहे हैं लेकिन उनका ये दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। राहुल से ये पूछा जाना चाहिए कि एक-एक उद्योगपतियों को हज़ारों करोड़ लोन देने की पात्रता क्या रही? ये लोन क्यों नहीं रिकवर किए जा सके? कांग्रेस शासनकाल में सरकार जनता की गाढ़ी कमाई को रिकवर करने के लिए क्यों कभी गम्भीर नहीं दिखी?

राहुल एंड कम्पनी अगर ये दावा भी करे कि सार्वजनिक बैंकों के डूबे कर्जों की हालत 2004-12 के बीच 4 फीसदी की दर से बढ़ी लेकिन ये दर अब 2013-15 के बीच 7 फीसदी हो गयी है। तब भी ये याद रखना जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री बने थे। ऐसे में बैड लोन की विकास दर के लिए भी खुद कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ज़िम्मेदार हुई।

वित्त मामले में विश्व की अग्रणी संस्था मॉर्गन स्टेनले की रिपोर्ट को भी आधार मानें तो पिछले सात साल से दुनिया मंदी की चपेट में है। लेकिन इसका असर भारत पर वैसा नहीं है जैसा दूसरे देशों पर। पिछले चार साल में वित्तीय चिंता जस की तस है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि 2012 में लोन की चिंता भारत में सबसे ज्यादा थी जो धीरे-धीरे कम होती गयी है। यानी बैड लोन बढ़ने की रफ्तार वैसी नहीं है जैसी कि दुनिया के बाकी देशों में। इस रिपोर्ट का अगर मतलब निकाला जाए तो बैड लोन उपहार के तौर पर मोदी सरकार को पिछली सरकार से मिले हैं जिसे ढोने की मजबूरी बन आयी है।

बैड लोन का सवाल विपक्ष ने संसद में भी उठाया था। राज्यसभा में केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इसका जवाब देते हुए जो जानकारी दी थी उससे भी सच्चाई सामने आ जाती है। सरकार ने जानकारी दी है कि 2015-16 में 8,167 इरादतन चूककर्ता थे। ऐसे लोगों पर बैंकों का 76,685 करोड़ रुपये बकाया था। इस पर 1724 प्राथमिकियां दर्ज की गयी। एक साल पहले 2014-15 में ऐसे चूककर्ताओं की संख्या 7031 थी और उन पर बैंकों का 59,656 करोड़ रुपये बकाया था। साफ है कि डिफाल्टर्स को कानून की जद में लाने की कोशिश मोदी सरकार में हुई है। इससे पहले ऐसी कोशिश का इतिहास नहीं मिलता।

केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने राज्यसभा में जो जानकारी दी थी उसके मुताबिक 30 जून 2016 तक 50 करोड़ रुपये से अधिक कर्ज राशि वाले एनपीए खातों की संख्या 2071 थी जिन पर 8 लाख 88 हज़ार 919 करोड़ रुपये का बकाया है। ये दोहराने की जरूरत नहीं हैं कि ये सभी कर्ज़दार पुराने हैं।

सुप्रीम कोर्ट जिन औद्योगिक घरानों की लिस्ट आरबीआई से मांग रहा है उसमें वो लोग हैं जिनका बकाया 500 करोड़ रुपये से ज्यादा है। ये लोन कांग्रेस के राज में लिए गये थे। देश के 29 राष्ट्रीय बैंकों ने 1 लाख 14 हज़ार करोड़ रुपये के डूबे हुए कर्जों को 2013-14 में माफ किया। ये कौन लोग थे? सबके सब वही उद्योगपति थे जिन्होंने कांग्रेस के शासनकाल में लोन लिए।

ये सवाल जरूर उठना चाहिए कि गलत कर्ज देकर आम लोगों की गाढ़ी कमाई लुटाने के लिए ज़िम्मेदार कौन है? राहुल गांधी ये सवाल मोदी सरकार से कर रहे हैं लेकिन सच ये है कि इस सवाल का जवाब खुद उन्हें देना चाहिए क्योंकि तमाम कर्ज उनकी ही पार्टी के शासनकाल में बांटे गये हैं।

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