Home चुनावी हलचल राहुल के प्रमोशन से कांग्रेस के ‘हाथ’ क्या लगेगा ?

राहुल के प्रमोशन से कांग्रेस के ‘हाथ’ क्या लगेगा ?

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राहुल गांधी अब नई पारी खेलने के लिए तैयार है। उनका प्रमोशन हो रहा है, अब वो कांग्रेस के उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बनने वाले हैं, यानी देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के सर्वेसर्वा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी के इस प्रमोशन से आखिर पार्टी को हासिल क्या होगा? अभी राहुल गांधी उपाध्यक्ष हैं और उनकी मां सोनिया गांधी अध्यक्ष, पार्टी के हर बड़े फैसले में राहुल गांधी की निर्णायक भूमिका होती है। पिछला लोकसभा चुनाव और तमाम राज्यों का विधानसभा चुनाव भी राहुल के नेतृत्व में लड़ा गया था। उम्मीदवारों को चुनने से लेकर राज्यों में पार्टी किसके साथ गठबंधन करेगी सबका फैसला राहुल गांधी ही कर रहे थे। अपनी हरकतों और बेतुके बयानों से जग हंसाई कराने वाले राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व में ऐसा कौन सा परिवर्तन आ जाएगा, जिससे देश की राजनीति में हाशिए पर पहुंच रही कांग्रेस में नई जान आ जाएगी। Perform India ने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की।

राहुल को देश ने कभी गंभीरता से नहीं लिया

47 साल के राहुल गांधी 2003 में सार्वजनिक मंचों पर अपनी मां सोनिया गांधी के साथ दिखने लगे थे और उनके राजनीति में उतरने की कयास लगने लगे थे। मई 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी सक्रिय राजनीति में उतरे और अपने पिता की अमेठी सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। उसके बाद धीरे-धीरे राहुल का कद पार्टी में बढ़ता गया और 2007 में वो कांग्रेस के महासचिव बना दिए गए। 2007 में ही राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी निभाई, लेकिन उस चुनाव में कांग्रेस को महज 22 सीटें मिलीं। अपने 13 साल के सक्रिय राजनीतिक करियर में अभी तक राहुल कोई ऐसा मुकाम हासिल नहीं कर पाए हैं, जिसके लिए उनके नेतृत्व की तारीफ की जाए।

राहुल के नेतृत्व में चुनाव हारने का बना रिकॉर्ड

2012 में राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद से ही कांग्रेस पार्टी सभी चुनाव उनके निर्देशन में ही लड़ रही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि हर चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव में कांग्रेस पार्टी को बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा है। 16 नगर निगम में से कांंग्रेस पार्टी का एक में भी खाता तक नहीं खुला। राज्य के दूसरे इलाके तो छोड़िये अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी में भी राहुल को मुंह की खानी पड़ी है। दरअसल जिस राहुल गांधी के भरोसे कांग्रेस पार्टी देश की सत्ता में फिर से वापसी की उम्मीद कर रही है वह बेहद कमजोर है। राहुल गांधी का रिकॉर्ड तो ये है कि अब तक उनके नेतृत्व में जितने भी चुनाव लड़े गए उसमें कांग्रेस हारती ही चली आ रही है। उनके नेतृत्व में बीते 5 साल में कांग्रेस पार्टी 24 चुनाव हार चुकी है। आइये हम देखते हैं कि कहां और कितनी बड़ी हार दिला चुके हैं राहुल।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार

लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

2014 आम चुनाव में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटी

दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित कर दी गई है और युवा नेतृत्व के नाम पर राहुल को थोपने की कवायद चल रही है। कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी को अब तक 28 बार लॉन्च करने की कोशिश की है, लेकिन वह हर बार फेल रही है। 2014 में पार्टी की किरकिरी हर किसी को याद है। जब 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार

बिहार में 2015 में महागठबंधन के चलते जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2017 में पांच में से चार राज्यों में शिकस्त

इसी वर्ष पांच राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने भी राहुल की पोल खोल दी। यूपी और उत्तराखंड में कांग्रेस को करारी हार मिली। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह के कारण हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों। दूसरी ओर इन चुनावों में भी राहुल के मुकाबले अखिलेश यादव एक युवा नेता के तौर पर जनता के सामने उभरकर आए।

राहुल गांधी के बेतुके बयान

राहुल गांधी में राजनीतिक गंभीरता कहीं दिखाई नहीं देती। जब देखो तब वो अपनी हरकतों और बयानों से गंभीर विषयों की खिल्ली उड़ते हैं वहीं खुद भी मजाक का पात्र बनते आए हैं। देश किसी गंभीर समस्या का सामना कर रहा हो, संसद में किसी गंभीर विषय पर चर्चा हो रही हो, लेकिन राहुल गांधी बेतुके बयान देते रहते हैं। नोटबंदी के बाद शायरी करना और मंच से अपनी फटी जेब दिखाना उनको भारी पड़ गया था। नोटबंदी के बाद एक सभा में अपनी फटी जेब जनता को दिखाकर खुद ही हंसी के पात्र बन गये। वहीं जब नेपाल दूतावास में जब सांत्वना संदेश लिखने की बारी आयी, तो अपनी जेब से मोबाइल निकालकर उसमें से देखकर सांत्वना संदेश लिखा। तमाम टीवी चैनलों ने उनके इस कृत्य को उजागर करने का काम किया।

राहुल गांधी के कुछ अन्य बेतुके बयान
“राजनीती आपकी कमीज और पेंट में होती है।”
“अगर भारत एक कंप्यूटर है, तो कांग्रेस उसका डिफाल्ट प्रोग्राम है।”
“गुजरात यूके से भी बड़ा है।”
“भारत यूरोप और अमेरिका को मिलाने पर भी उससे बड़ा है।”
“क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं, कि आप कैसे मदद करेंगी।”
“गरीबी महज एक मनोदशा का नाम है।”
“मैं यूपी के किसानों के लिए आलू की फैक्टरी नहीं खोल सकता।”

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार
अपने बेतुके बयानों के कारण राहुल गांधी को अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है। वैसे ट्रोलिंग कोई बुरी बात नहीं है। ट्रोलिंग बड़े-बड़े सितारों की होती है। वैसे इस ट्रोलिंग से भी राहुल गांधी को कोई खास फर्क पड़ता नहीं है। जब किसी व्यक्ति के जीवन में कोई घटना आये दिन की कहानी बन जाती है तो वह उसके लिए सामान्य सी घटना बनकर रह जाती है। फिर उससे उस व्यक्ति को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। हाल ही में राहुल गांधी पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिले थे, जिसकी तस्वीर राहुल ने अपने ट्विटर पर भी शेयर की है। राहुल ने अपने ट्वीट में लिखा है कि, “राष्ट्रपति ओबामा जी आपसे दोबारा मिलकर अच्छा लगा।” राहुल गांधी ने यह लिखते हुए भारी चूक कर दी है। ओबामा अब पूर्व राष्ट्रपति हो चुके हैं और यही गलती राहुल गांधी के लिए मुसीबत बन गई। लोग ट्विटर पर राहुल गांधी को ट्रोल करने लगे।

अति उत्साह का खामियाजा
राहुल गांधी देश और अपनी पार्टी को शर्मिंदा करते रहते हैं, लेकिन कभी भी स्वयं शर्मिंदा महसूस नहीं करते हैं। कई बार वे अति उत्साह में अति आक्रामक व्यवहार कर देते हैं। जिसका बाद में उनको खामियाजा भुगतना पड़ता है। जेएनयू प्रकरण में अति उत्साह के कारण उनका दांव उल्टा पड़ा गया। ऐसा ही उन्होंने खून की दलाली के बयान के समय किया। जिसकी वजह से बाद में उनको काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी।

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