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बुलेट ट्रेन लाने का दावा करने वाले राहुल जी इन 10 नाकामियों पर भी गौर फरमाइये…

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4 जुलाई को राहुल गांधी ने अमेठी में कहा कि देश में अगर कोई सरकार बुलेट ट्रेन ला सकती है तो वह कांग्रेस की सरकार ला सकती है। राहुल गांधी इस बात को जिस भी संदर्भ में कह रहे हों, लेकिन इस बहाने इन तथ्यों की पड़ताल करने का अवसर जरूर मिल गया कि राहुल गांधी के अपने संसदीय क्षेत्र में आज भी कच्ची सड़कों की भरमार है। ऐसा एक भी दिन नहीं बीतता जब बुनियादी समस्याओं के प्रति लोग आक्रोश व्यक्त न करते हों। बहरहाल आइये हम इस बहाने यह भी देखते हैं कि बुलेट ट्रेन देने का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी ने देश पर कितनी समस्याएं थोप दी हैं- 

जातिवाद का जहर

कांग्रेस पार्टी ने देश में जातिवाद का जहर फैलाने के लिए विदेशी कंपनियों तक को ठेका दिया हुआ है। मार्च, 2018 में इस बात का खुलासा तब हुआ था जब कैंब्रिज एनालिटिका ने खुलासा किया उसने कांग्रेस के लिए भारत के कई राज्यों में सर्वे किया था। इसी को आधार बनाकर हिंदुओं के बीच फूट डालने की नीति को अंजाम तक पहुंचाया गया। इसका परिणाम आपको हाल में ही दिखा भी होगा।

संप्रदायवाद का कहर

देश में संप्रदायवाद की राजनीति का अगर कोई सबसे बड़ा कारक है तो वह कांग्रेस है। पहले तो देश का धर्म के आधार पर बंटवारा किया और लाखों मुसलमानों को देश में रहने दिया। जवाहर लाल नेहरू ने धर्म के आधार पर कश्मीर में पहली गलती की और संविधान में अनुच्छेद 35A का प्रावधान करवा दिया। आज देश में अलगाववाद के मूल में इस कानून को माना जा रहा है। इसके बाद इंदिरा गांधी ने ही मुस्लिमों का पर्सनल लॉ बोर्ड के गठन को मंजूरी दी और देश में मुसलमानों में देश के अलग समझने की एक बीज डाल दी।  इसके बाद राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट को नीचा दिखाते हुए मुसलमानों के लिए कानून ही बदल दिया।

गरीबी हर गांव शहर

देश में पहली बार कांग्रेस की सरकार बनी थी तो गरीबी खत्म करने के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई। 2014 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार सच्चाई यह है कि देश में दुनिया के समस्त निर्धनतम लोगों का 32.9 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता था। यह अनुपात चीन, नाइजीरिया और बांग्लादेश के अनुपात से भी ज्यादा था। बाल मृत्यु दर भी भारत में सर्वाधिक था। यहां 2012 में 14 लाख बच्चों की मौत पांच वर्ष की अवस्था से पहले हो गई थी। बहरहाल मोदी सरकार के आने के बाद गरीबी खत्म करने के तमाम उपाय किए गए हैं। ब्रुकिंग्स के अनुमान के अनुसार 2022 तक 3 प्रतिशत से भी कम भारतीय गरीब रह जाएंगे जबकि 2030 तक देश से अत्यंत गरीबी का पूरी तरह खात्मा हो जाएगा। भारत में फिलहाल 7 करोड़ 30 लाख अत्यंत गरीब आबादी रह रही है जिसमें मोदी सरकार के प्रयास से हर मिनट 44 लोग घट रहे हैं।

संविधान में धारा 370

भारत के विभाजन के समय कश्मीर समस्या का हल निकाल पाने में जवाहरलाल नेहरू की असफलता की देश भारी कीमत चुका रहा है। इस मामले में नेहरू में न तो साहस था न ही दूरदर्शिता थी। अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान है जिसे अब तक क्यों कायम रखा गया है यह भी एक सवाल है। 1971 में भी भारत ने कश्मीर मुद्दे को हल करने का मौका गंवा दिया था। 1990 में हिंदुओं के नरसंहार के बाद कांग्रेस की चुप्पी ने तो कट्टरपंथियों के हौसले को नये उत्साह से भर दिया था। कश्मीर में कट्टरपंथ की ‘आग’ भड़काने और चार लाख कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के लिए जिम्मेवार कांग्रेस ने अब तक गलती नहीं मानी है।

चीन से मिली हार  

1962 में चीन से मिली हार भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की अदूरदर्शिता का नतीजा थी। इसकी कीमत आज भी देश चुका रहा है। उस समय भारत को अपना विशाल भू-भाग चीन को देने के लिए विवश होना पड़ा था। आज भी भारत का 93 हजार वर्गमील जमीन चीन के कब्जे में है। उस हार के कारण चीन भारत पर अपना दबदबा दिखाता रहता है। हालांकि पीएम मोदी के नेतृत्व में चीन को भी भारत की ताकत का अहसास हो रहा है। मई-जून 2017 में डोकलाम विवाद के समय चीन को अपनी हेकड़ी दिखाना महंगा पड़ा और चीनी सैनिकों को वापस उसकी सीमा में धकेल दिया गया।

आपातकाल का कहर

25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में बदल दिया था। इस दौरान लोगों के मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया था, यहां तक कि जीने का अधिकार भी छीन लिये थे। लोगों को जबरदस्ती जेलों में बंद किया जा रहा था। इंदिरा गांधी सरकार ने जयप्रकाश नारायण सहित लगभग एक लाख राजनीतिक विरोधियों को देश के अलग-अलग जेलों में ठूंस दिया था। कड़ा प्रेस सेंसरशिप लगा दिया गया था। कांग्रेस ने लोकतंत्र को कैद में रखने की गलती के लिए भी आज तक गलती नहीं मानी है।

हिंदुओं की जबरन नसबंदी

आपातकाल के दौरान 1975 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में नसबंदी अभियान शुरू किया गया। मुस्लिमों के विरोध के कारण यह अभियान सफल नहीं हुआ, लेकिन इसका नुकसान हिंदुओं को उठाना पड़ा। दरअसल अधिकारियों को महीने के हिसाब से टारगेट दिए गए और उनकी रोज समीक्षा होने लगी। इसको पूरा करने के लिए अधिकारियों ने करोड़ों हिंदुओं की ही नसबंदी कर दी जबकि मुस्लिम आबादी बढ़ती रही

दंगों की राजनीति

देश के इतिहास में जितने दंगे हुए हैं उसमें कांग्रेस की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। देश के 11 सबसे बड़े दंगों का इतिहास देखें तो इनमें से 10 कांग्रेस के शासन वाले राज्यों में हुए हैं। दरअसल कांग्रेस ने मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के भीतर भारतीय जनता पार्टी का डर बिठाकर उसे किस तरह राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया, यह भी हर कोई जानता है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद दिल्‍ली में सिख विरोधी दंगे हुए थे। इसमें पांच हजार से अधिक सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया। ये दंगा भी कांग्रेस प्रायोजित था और पार्टी के कद्दावर लीडर जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार सरीखे नेताओं पर दंगे की अगुआई करने के आरोप हैं।

बांग्लादेशी घुसपैठिये

असम, पश्चिम बंगाल समेत देश के पूर्वोत्तर इलाके में आबादी का संतुलन बिगाड़कर देश तोड़ने की साजिश रची जा रही है। कांग्रेस ने बांग्लादेशियों को असम समेत पूर्वोत्तर में नागरिकता दी, वोटर कार्ड दिए, राशन कार्ड दिए। ऐसे जनसांख्यिकीय असंतुलन से देश की एकता अखंडता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक असम में मुसलमानों की आबादी में सबसे तेज बढ़ोतरी हुई है और अब आबादी के आधार पर भारत के एक और विभाजन की तस्वीर बनती दिख रही है। कांग्रेस ने इस गलती के लिए भी अब तक देश से माफी नहीं मानी है।

उत्तर -दक्षिण भारत का भेद

साठ सालों तक सत्ता में काबिज रही कांग्रेस ने देश की समस्याओं का हल तो ढूंढ नहीं पाई … उल्टे क्षेत्रवाद और प्रांतवाद की राजनीति को बढ़ावा ही दिया। 2017 में केरल में जब कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने सरेआम गाय काटा तो देश में विरोध के स्वर सुनाई देने लगे। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच विभेद पैदा करने की कुत्सित कोशिश की गई। ट्विटर और सोशल मीडिया पर ‘द्रविनाडु’ यानी दक्षिण भारत के चारों प्रमुख राज्यों को मिलाकर अलग देश निर्माण की मांग को हवा दी गई।

 

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