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स्मृति ईरानी के कारण राहुल को अमेठी में सताया हार का डर, केरल की वायनाड से भी लड़ सकते हैं चुनाव

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कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को अपनी परंपरागत अमेठी सीट पर इस बार हार का डर सता रहा है। राहुल गांधी इस बार अमेठी के साथ केरल की वायनाड संसदीय सीट से भी चुनाव लड़ सकते हैं। कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने पार्टी के गढ़ वायनाड संसदीय सीट से चुनाव चुनाव लड़ने पर सहमति जता दी है। टाइम्स नाउ की खबर के अनुसार केरल कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस चुनाव समिति के प्रमुख मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष ने सहमति जता दी है। बीजेपी ने अमेठी से स्मृति ईरानी को फिर से अपना उम्मीदवार बनाया है। पिछले पांच साल के दौरान स्मृति ईरानी ने अमेठी में इतने काम किए हैं कि राहुल की स्थिति डंवाडोल हो गई है।

वायनाड सीट अमेठी की तुलना में अधिक सुरक्षित
अमेठी सीट राहुल गांधी के लिए सुरक्षित नहीं रही है। ऐसे में उन्होंने दूसरी सीटों पर नजर गड़ा दी है। मौजूदा परिस्थियों में केरल की वायनाड संसदीय सीट अमेठी की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हैं। जाहिर है कि यूपी में कांग्रेस के पास संगठन के नाम पर कुछ नहीं है, ऐसे में राहुल गांधी अमेठी के साथ वायनाड से भी चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं।

अमेठी में आसान नहीं है राहुल की राह
गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी पर कई बार से गांधी खानदान का ही कोई सदस्य चुनाव जीतता आ रहा है। अमेठी को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। इसके बाबजूद आखिर राहुल गांधी को यहां हाल का डर क्यों सता रहा है। जानकारों का कहना है कि दरअसल इस डर के पीछे वजह भी है। आम चुनाव 2014 में राहुल गांधी के खिलाफ बीजेपी ने स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा था। स्मृति ईरानी के लिए अमेठी निर्वाचन क्षेत्र नया था, लेकिन महज 15 दिनों के जबरदस्त चुनावी अभियान में उन्होंने फिजा बदल दी। स्मृति ईरानी के चुनावी प्रचार का असर नतीजों में भी दिखाई दिया। अमेठी से जहां कांग्रेस प्रत्याशी और विरोधी उम्मीदवारों के बीच अंतर पांच लाख वोटों से ज्यादा होता था वो अंतर सिमट कर महज एक लाख से कम रह गया था।

अमेठी में हार सकते हैं राहुल
पिछले विधानसभा चुनावों में अमेठी लोकसभा की पांच विधानसभा सीटों के वोटों के आंकड़े को देखें तो कांग्रेस, भाजपा से एक लाख से भी अधिक वोटों से पिछड़ रही है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस और सपा ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा, फिर भी 5 में से 4 सीटें बीजेपी जीती और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। कांग्रेस ने जिस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा, उनके लिए आज की तारीख में अपनी सीट बचाने के भी लाले पड़ गए हैं।

गांधी परिवार ने अमेठी को ‘अछूत’ बना दिया
लोकतंत्र में नेताओं की लोकप्रियता का असली पैमाना तो चुनाव ही होता है। अमेठी में पार्टी के पुराने कामों की पड़ताल जब आज की युवा पीढ़ी कर रही है तो वे अचंभित हो जाते हैं। दरअसल गांधी परिवार से संबद्ध होने के कारण देश-प्रदेश की सरकारें यह मानकर चलती हैं कि यहां तो विकास हुआ ही होगा, लेकिन अमेठी के गांवों में आते ही ये विकास होने या हो रहे होने की सारी हवाबाजी काफूर हो जाती है। गांधी परिवार ने अमेठी को विकास के मामले में ‘अछूत’ बना दिया।

अमेठी को अपनी जागीर समझते हैं राहुल गांधी
दरअसल यह सब इसलिए है कि गांधी परिवार ने अमेठी को एक संसदीय क्षेत्र के तौर पर नहीं बल्कि अपनी जागीर माना है। कोई आपदा या मृत्यु में भी वह चार-छह महीने के बाद पहुंचते हैं। यही नहीं बल्कि वे अमेठी दौरे पर हमेशा ही चुनिंदा जगह ही पहुंचते हैं। वह भी उनके कुछ खास लोग तय करते हैं कि उन्हें कहां जाना है या कहां जाना चाहिए। राहुल गांव-गांव अमेठी में दौरा तो करते हैं, लेकिन कोई उनसे सुरक्षा व्यवस्था के चलते अलग से नहीं मिल सकता है। अमेठी राहुल का संसदीय क्षेत्र है, लेकिन कभी चार महीने पर, कभी छह महीने पर ही वह अमेठी में नजर आते हैं।

अमेठी में भाजपा का बढ़ रहा जनाधार
2014 लोकसभा चुनावों में पहली बार राहुल गांधी को टक्कर देने के लिए बीजेपी ने स्मृति ईरानी को उतारा था। स्मृति ईरानी ने उस समय हार कर भी राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी थी। तभी लग गया था कि अमेठी की जनता में तीन पीढ़ियों की गुलामी से बाहर निकलने की छटपटाहट है। इसके बाद भाजपा ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का किला ध्वस्त कर दिया। दरअसल कांग्रेस की नजर में अमेठी की जनता सिर्फ वोट देने के लिए एक साधन के तौर पर रही है और ऐसे में वहां की जनता स्वयं को सिर्फ साधन मानने नहीं देना चाहती बल्कि वह विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहती है।

अमेठी की जनता की चहेती हैं स्मृति ईरानी
केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का विकास को लेकर स्पष्ट नजरिया और उनका आक्रामक अंदाज राहुल गांधी पर भारी पड़ रहा है। स्मृति ईरानी का अमेठी में सतत सम्पर्क, संवाद और विकास ने राहुल गांधी की राजनीतिक जमीन हिला दी है। उन्होंने अपनी पहचान पार्टी कार्यकर्ता से ऊपर उठकर ‘अमेठी की दीदी’ के तौर पर बना ली है। चुनाव प्रचार के दौरान ईरानी ने वादा किया था कि हारूं या जीतूं, अमेठी नहीं छोड़ूंगी। हार के बाद भी वह अपने वादे पर कायम हैं। चुनाव हारने के बाद भी स्मृति ईरानी लगभग हर दो महीने पर अमेठी आतीं हैं- चाहे वह सरकारी कार्यक्रम हो, पर्व-त्योहार हो या कुछ और।

ईरानी के आने से अमेठी को लाभ
राहुल गांधी से भले ही अमेठी को लाभ न मिला हो, लेकिन स्मृति ईरानी के मंत्री बनने के बाद अमेठी में विकास की बयार बह रही है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इलाके के विकास के लिए कई काम किए गए हैं। इसके अलावा भी कई परियोजनाएं हैं जिसे पूरा कराने में वो जी-जान से जुटी हैं।

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