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आईना देखते ही क्यों टूट जाते हैं राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब ?

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राहुल गांधी को राजनीति में आए 14 साल से अधिक हो चुके हैं। विरासत में कांग्रेस अध्यक्ष का पद मिल जाने के बाद अब वो हर रात प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब तो देख रहे हैं, लेकिन सुबह आईने के सामने आते ही सपनों से मिली उनकी खुशियां चूर-चूर हो जाती हैं। इसकी वजह है आईने में देखते ही खुद को ये महसूस हो जाना कि प्रधानमंत्री तो बनना चाहते हैं, लेकिन इतने वर्षों में आखिर अपनी उपलब्धि क्या रही है? आइए, एक नजर डालते हैं 14 सालों में राहुल गांधी की ‘14 विशेष उपलब्धियों’ पर जिनसे पता चल जाएगा कि आखिर आईना देखने से उन्हें डर क्यों लगता है।

‘उपलब्धि’ नं.1: विरासती परंपरा में बने सांसद
राहुल गांधी चूंकि राजीव-सोनिया के बेटे थे इसलिए कांग्रेस की विरासती परंपरा के तहत उन्हें बड़े आराम से चुनाव लड़ने का मौका मिल गया। 2004 में अपनी मां से उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई और सोनिया अपने लाडले के लिए अमेठी सीट छोड़कर रायबरेली चली गईं।  

‘उपलब्धि’ नं.2 : वंशवाद की राजनीति के पोषक
राहुल गांधी देश के शायद ऐसे पहले नेता हैं जिन्होंने खुलेआम वंशवाद का समर्थन किया। अमेरिका में बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया में एक संवाद के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत वंशवाद से ही चलता है। यानि राहुल गांधी खुद भी मान चुके हैं कि योग्यता तो उनके काम आने से रही, उन्हें कुछ हासिल हो सकता है तो बस वंशवाद से!

‘उपलब्धि’ नं.3: यूपी में पहली बड़ी परीक्षा में ही फेल 
राहुल गांधी की पहली परीक्षा थी 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में, जिसमें उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई थी। लेकिन पार्टी के खाते में सिर्फ 22 सीटें आ सकीं, जिसके चलते तब यह भी सुनने को मिल रहा था कि राहुल नहीं होते तो शायद कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर होता।

‘उपलब्धि’ नं.4 : गरीबों से वादा कर तोड़ देना
महाराष्ट्र की कलावती और मध्य प्रदेश का कौशल शाक्य, ये वो दो नाम हैं जिन्हें राहुल गांधी ने आश्वासन तो बढ़-चढ़कर दिया, लेकिन उस पर ठीक से अमल नहीं किया। कलावती वो महिला हैं जिनके पति ने 2005 में आत्महत्या कर ली थी और राहुल गांधी ने जिनके नाम पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश की थी। वहीं कौशल शाक्य नामके नाबालिग को राहुल ने पढ़ाई का जिम्मा उठाने का आश्वासन दिया था लेकिन उसे भी नहीं निभा सके।

‘उपलब्धि’ नं.5: 2012 के यूपी चुनावों में भी फिसड्डी
2012 के यूपी विधानसभा चुनावों में राहुल की देखरेख में कांग्रेस को 28 सीटें मिली थीं। राहुल ने वहां पार्टी के लिए ऐसी फील्डिंग लगाई कि कांग्रेस के करीब 70 प्रतिशत उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए!

‘उपलब्धि’ नं.6: तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह का अपमान
सितंबर, 2013 में राहुल गांधी ने तबके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए एक अध्यादेश को सरेआम फाड़कर ये जताया था कि मनमोहन सिंह को वे अपनी मुट्ठी में रखते हैं। राहुल ने तब विदेश गए अपने प्रधानमंत्री के लौटने का इंतजार करना भी ठीक नहीं समझा था।

‘उपलब्धि’ नं.7: सबसे खराब सांसदों में से एक
2014 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी अघोषित रूप से कांग्रेस के प्रधानमंत्री उम्मीदवार तब माने जा रहे थे, जब एक सांसद के रूप में भी वे सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में शुमार रहे थे! इंडिया टुडे ग्रुप रैंकिंग्स (2014) में अपनी पार्टी के पांचवें सबसे खराब सांसद बने थे राहुल गांधी।

‘उपलब्धि’ नं.8: औपचारिक विपक्ष भी नहीं रही कांग्रेस
2014 के लोकसभा चुनावों में राहुल की अगुआई में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटकर रह गई जिसके चलते 16वीं लोकसभा में वो औपचारिक विपक्ष का दर्जा भी नहीं पा सकी। गौर करने वाली बात है कि 2013 में उपाध्यक्ष बनने पर राहुल गांधी ने कहा, ”कांग्रेस को ऐसा बदलेंगे जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते।” देश ने देख लिया राहुल गांधी का बदलाव!

‘उपलब्धि’ नं.9: ‘देश-विरोधियों’ का समर्थन
मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष के अंदर राष्ट्रप्रेम इतना भरा हुआ है कि वे देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के प्रति भी अपना खुला समर्थन जताने से नहीं चूके! गौर करने वाली बात है कि 11 साल पहले जब राहुल को कांग्रेस महासचिव बनाया गया था, तब उन्होंने युवाओं की राजनीति में सुधार लाने का वादा किया था।  

‘उपलब्धि’ नं.10: सबसे खराब चुनाव नतीजों का रिकॉर्ड! 
कोई हैरानी नहीं होगी अगर आने वाले समय में राहुल गांधी कांग्रेस को सबसे खराब नतीजे दिलाने वाले ‘नायक’ के रूप में जाने जाएं। आखिर उनकी अगुआई में 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी। सपा से गठबंधन करने के बावजूद कांग्रेस सिर्फ 7 सीटें जीतकर पानी-पानी हो गई थी।  

‘उपलब्धि’ नं.11: भारत नहीं, चीन की सरकार पर विश्वास
2017 में जब डोकलाम को लेकर तनाव का माहौल बना था, राहुल गांधी गुपचुप तरीके से बिना किसी को बताए चीनी राजदूत से मिले थे। इससे देश भर में राहुल के बारे में ये संदेश गया कि उन्हें अपने देश की सरकार पर नहीं, बल्कि चीन की सरकार पर विश्वास है।   

‘उपलब्धि’ नं.12: अध्यक्ष बनने के बाद भी लगातार फेल
एक पर एक ‘उपलब्धियों’ के बाद जब दिसंबर 2017 में राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो नजरें इस पर थीं कि आने वाले चुनावों में वो क्या कमाल दिखाते हैं। लेकिन अध्यक्ष के रूप में भी वे पहले ही विधानसभा चुनावों में चारों खाने चित हो गए। इस वर्ष हुए मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा और कर्नाटक के चुनावों में कांग्रेस को शिकस्त मिल चुकी है।

‘उपलब्धि’ नं.13: माल्या, मेहुल और नीरव को विदेश भगाया
अब यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आर्थिक घोटाले के शातिर आरोपियों को विदेश भगाने में राहुल गांधी ही शामिल थे। कांग्रेस ने ऐसा अपनी चुनावी रणनीतियों को देश की बजाय विदेश से ही संचालित करने के इरादे से किया था ताकि राहुल के लिए जमीन मजबूत की जा सके। विजय माल्या, मेहुल चोकसी और नीरव मोदी तीनों से राहुल की करीबी रही है।

‘उपलब्धि’ नं.14: झूठ की खेती करने में माहिर
यह एहसास होने के बाद कि अपनी ‘उपलब्धियों’ से कभी जनता के चहेते नहीं बन सकते, राहुल गांधी मौजूदा सरकार की कई उपलब्धियों को लेकर झूठ गढ़ने और भ्रम फैलाने पर उतर आए हैं। राफेल हो चाहे जीएसटी, ऐसे कई मुद्दों पर बिना ठोस तथ्यों के वे सवाल उठाने में लगे हैं।

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