Home विपक्ष विशेष दिल बहलाने को ‘अध्यक्ष’ बनाने का खयाल अच्छा है!

दिल बहलाने को ‘अध्यक्ष’ बनाने का खयाल अच्छा है!

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जब भी किसी चुनाव का समय आता है तो राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने की चर्चा अचानक तेज हो जाती है। लेकिन आखिर में यही होता आया है कि राहुल उपाध्यक्ष ही रह जाते हैं।

राहुल के सामने होगा उम्मीदवार?

अब एक बार फिर वही चर्चा है। सोमवार को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के हवाले से पार्टी इस बार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि लोकतांत्रिक तरीके से अध्यक्ष पद का चुनाव होगा। यानी अध्यक्ष चुनने के लिए अधिसूचना, नामांकन, नामांकन वापसी और मतदान सब कुछ होंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीति में वंश परंपरा की वकालत करने वाले राहुल गांधी के सामने कोई दूसरा उम्मीदवार खड़ा होने की हिम्मत करेगा? सब देख चुके हैं कि कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर कभी सोनिया गांधी को चुनौती देने वाले सीताराम केसरी और जितेंद्र प्रसाद जैसे नेता किस तरह किनारे लगा दिये गए थे।

2014 से ही चर्चा हो रही है अध्यक्ष बनाने की

जनवरी 2013 में राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष बनाये गए थे। उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर पिछले करीब चार वर्षों से जब ना तब पार्टी के किसी ना किसी फोरम पर चर्चा उठती रही है। 2014 में लोकसभा चुनावों को लेकर हुए पार्टी के एक चिंतन शिविर में राहुल को अध्यक्ष के साथ प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की भी मांग उठी थी, लेकिन तब बीजेपी के पीएम उम्मीदवार रहे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने कांग्रेस ने ये रिस्क नहीं लेने में ही भलाई समझी। इस साल फरवरी-मार्च में हुए उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से करीब आठ महीने पहले जगदीश टाइटलर जैसे नेताओं ने राहुल गांधी को अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपने की वकालत की थी। दलील दी गई थी कि तकनीकी रूप से सारे फैसले भी तो वही कर रहे हैं तो कमान भी क्यों ना सौंप दी जाये।   

राहुल का नेतृत्व स्वीकारना कई नेताओं की मजबूरी

राहुल को अध्यक्ष बनाने को लेकर कांग्रेस के भीतर मतभेद और उधेड़बुन की स्थिति रही है। पार्टी के अंदर का एक वर्ग ऐसा है जो राहुल में नेतृत्व की काबिलियत नहीं देखता। ये और बात है कि कई नेता विरोध को स्वर नहीं दे पाते। यही वो वजहें हैं कि राहुल को अध्यक्ष बनाने की चार वर्ष पहले शुरू हुई पहल अभी तक आकार नहीं ले पाई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की चाहत रही है कि राहुल की अगुआई में किसी चुनावी जीत के बाद बेटे को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए तो लेकिन वैसा मुहूर्त कभी निकल ही नहीं पाया जिसमें मां सोनिया खुशी-खुशी बेटे को यह जिम्मेदारी सौंप सकें। लेकिन अब जिस तरह के घटनाक्रम सामने आ रहे हैं उससे ऐसा लग रहा है कि सोनिया हारने वाले बेटे को भी ट्रॉफी थमाने की जल्दी में हैं।  

जब राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठाना भारी पड़ा

कांग्रेस में यह बात कहने वाले नेता भी सामने आ चुके हैं कि मां-बेटे के रहते पार्टी में किसी का कुछ नहीं होगा। पिछले साल राजस्थान के कांग्रेस विधायक भंवरलाल शर्मा ने ज्योंही कहा पार्टी के ऊपर नेताओं को थोपा नहीं जाना चाहिए, तो उन्हें फौरन सस्पेंड कर दिया गया था। भंवरलाल ने कहा था कि पार्टी के शीर्ष नेताओं को अब राहुल-प्रियंका के अलावा दूसरों के बारे में भी सोचना चाहिए। उससे पहले केरल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टीएच मुस्तफा ने राहुल गांधी को जोकर कहा था, जिसके बाद उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया था।

हर चुनावी अखाड़े में चित होते रहे राहुल  

सोनिया गांधी 1998 से कांग्रेस अध्यक्ष हैं लेकिन 2012 से पार्टी गतिविधियों से लेकर चुनावी रणनीति बनाने में राहुल गांधी ही मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं।  2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से लेकर अब तक के तमाम चुनाव राहुल की अगुआई में ही कांग्रेस ने लड़े हैं जिनमें से लगभग हर चुनाव में कांग्रेस पानी मांगती नजर आई। उत्तर प्रदेश के पिछले दो विधानसभा चुनाव हों या 2014 के लोकसभा चुनाव राहुल कांग्रेस के लिए सबसे भारी फजीहत वाली हार लेकर सामने आए हैं। आइए महज तीन उदाहरणों से सरसरी तौर पर एक निगाह इस पर डालते हैं कि राहुल ने कांग्रेस के लिए कैसा कमाल दिखाया है:  

राहुल की अगुआई में चुनावी प्रदर्शन

  • 2012 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव – कांग्रेस ने जीतीं 28 सीटें
  • 2014 लोकसभा चुनाव – कांग्रेस ने जीतीं 44 सीटें
  • 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव – कांग्रेस ने जीतीं 8 सीटें

देश में राहुल के लिए नो वैकेंसी!

अब गुजरात चुनावों के मौके पर कांग्रेस राहुल को पार्टी की कमान देने की तैयारी में है। कांग्रेस को लग रहा है कि क्या पता कहीं कोई चमत्कार हो जाए। यानी कांग्रेस पहले भ्रष्टाचार के बूते अपनी सत्ता को सींच रही थी और अब जब भ्रष्टाचार के चलते उसकी राजनीतिक शामत आई हुई है तो चमत्कार की उम्मीद कर रही है। लेकिन देशवासी देख चुके हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मौजूदा नेतृत्व ने देश में मेहनत और ईमानदारी की कितनी मजबूत नींव डाली है। जाहिर है राहुल कुछ बनेंगे तो ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस में ही बनेंगे। देश के लिए जनता उन्हें परमानेंट रूप से खारिज कर चुकी है।

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