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कांग्रेस ने अभिव्यक्ति की आजादी पर फिर बोला हमला!

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”प्रेस के लोग डरे हुए हैं, सुप्रीम कोर्ट के जजों को न्याय के लिए मीडिया के सामने आना पड़ा।”

08 मार्च, 2018 को पार्टी के 84वें अधिवेशन को संबोधित करते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता की बात करते हुए खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा पैरोकार बताया था।

राहुल गांधी के कथनी और करनी में कितना अंतर है इसके दो प्रत्यक्ष प्रमाण 25 जुलाई को सामने आए।

नेशनल हेराल्ड केस मामले में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रमनियन स्वामी की चुभती सच्चाई से घबराकर कांग्रेस ने उनकी अभिव्यक्ति पर चोट करने का प्रयास किया है।

मामले के आरोपी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मोतीलाल वोरा ने स्वामी की अभिव्यक्ति की आजादी छीनने के लिए मेट्रोपोलिटन कोर्ट में केस दायर किया है। उन्होंने अपने आवेदन में कोर्ट से नेशनल हेराल्ड मामले में स्वामी को ट्वीट नहीं करने देने की मांग की है। आरोपी कांग्रेस नेताओं ने कहा, ”स्वामी के ट्वीट निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकारों का हनन करते हैं।”


गौरतलब है कि यही कांग्रेस मोदी सरकार पर संविधान और मौलिक अधिकारों के हनन का आरोप लगाती है। आज एक व्यक्ति की सच्चाई को कुचलने के लिए उसके मौलिक अधिकार तक छीनने पर उतारू है। दरअसल कांग्रेस का यही तानाशाही चरित्र रहा है। उसके लिए न संविधान महत्वपूर्ण है न ही आमलोगों की मौलिक स्वतंत्रता।

सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस अभी सत्ता में नहीं है इसलिए कोर्ट के माध्यम से स्वामी की आजादी छीनने की कोशिश कर रही है। अगर सत्ता में होती तो क्या करती?

राहुल गांधी की बातों में कितनी सच्चाई है यह कर्नाटक सरकार के ताजा फरमान से भी समझा जा सकता है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा, ”पत्रकार विधानसभा में यहां-वहां घूमते रहते हैं और बिना पूरी जानकारी के बहुत ही खराब और अनुचित सवाल पूछते हैं।”

अब सवाल उठ रहा है कि आखिर जिस मीडिया को कुमारस्वामी दीया लेकर ढूंढा करते थे, अचानक उससे ये कैसी चिढ़ हो गई कि मीडिया के विधानसभा में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी?

हालांकि कहा तो ये जा रहा है कि कर्नाटक की सरकार ने ये फैसला कांग्रेस नेताओं के ‘हुकुम’ से किया है। दरअसल पत्रकार गठबंधन दलों के भीतर सुराख को लेकर कई प्रश्न करते रहे हैं। मीडिया कुमारस्वामी और कांग्रेस की कशीदगियों पर प्रश्न करती रही है। जाहिर है ऐसे ही प्रश्नों से कांग्रेस का वास्तविक कैरेक्टर जनता के सामने भी आ जाता था। ऐसे में ये फैसला कांग्रेस द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी पर एक और चोट है। गौरतलब है कि कुमारस्वामी ने पहले ही कहा है कि वह कांग्रेस के ‘आदेश’ का पालन करने को बाध्य हैं।

जब मधुर भंडारकर को जुबान बंद करने की दी गई धमकी

दरअसल कांग्रेस के शासनकाल में प्रेस की स्वतंत्रता पर कई बार कुठाराघात किए गए। हाल मे ही जब फिल्म इंदु सरकार रिलीज होने वाली थी तो कांग्रेस गुंडों ने अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात किया था।

दरअसल इमरजेंसी(1975) की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म इंदु सरकार पर कांग्रेस ने अघोषित आपातकाल लगा दिया है। जुलाई, 2017 में कांग्रेस के गुंडों ने मधुर भंडाकर की नागपुर में होने वाली प्रेस कांफ्रेंस नहीं होने दी। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के तथाकथित पैरोकार आज चुप रहे। उनकी तरफ से कहीं से कोई आवाज मधुर भंडारकर के लिए नहीं उठी। न तो कोई पुरस्कार वापसी हुई और न ही असहिष्णुता का राग अलापा गया। बहरहाल पुणे के बाद जब नागपुर में मधुर भंडारकर को अपनी प्रेस कांफ्रेंस रद्द करनी पड़ी तो उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी के खिलाफ खुद अपनी आवाज उठाई और राहुल गांधी तक पहुंचाने की कोशिश की।

नेहरू-गांधी परिवार ने प्रेस की स्वतंत्रता का दमन करने के लिए कभी कानून बनाकर तो कभी आपातकाल लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाया। आइये हम नजर डालते हैं गांधी परिवार द्वारा प्रेस की आजादी को खत्म करने के लिए कांग्रेस की कुत्सित कोशिशों पर :-

जवाहर लाल नेहरू ने प्रेस की आजादी पर लगाए बैन

  • कांग्रेस के नेता अक्सर जवाहर लाल नेहरू को अपना रोल मॉडल बताते रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका निभा रहे प्रेस की स्वतंत्रता को उन्होंने कुचलने कुचलने का काम किया है। 
  • पंडित नेहरू ने कई ऐसे कानून को पारित करवाए जिससे देश में प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ी।
  • 23 अक्टूबर 1951 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने “The Press Objectionable Matters Act” पारित करवाया।
  • यह कानून अंग्रेजों द्वारा 1908,1910, 1930 और 1931 में पारित कानूनों के समान प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने वाला था।
  • इस कानून के पारित होने पर देश में जबरदस्त विरोध हुआ, The All India Newspapers Editor’s Conference, The Indian Federation of Working Journalists ( IFWJ) और Language Newspapers Association ने इस कानून का विरोध किया, लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री नेहरू ने कानून पारित करवा दिया।

इंदिरा गांधी ने प्रेस की आजादी का दमन किया

कांग्रेसी कुशासन का सबसे बड़ा उदाहरण इंदिरा गांधी के समय देश में लगाया गया आपातकाल है। क्योंकि आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का जो काम इंदिरा गांधी ने किया वह अभूतपूर्व है

  • इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान न केवल लोगों के नागरिक एवं मौलिक अधिकारों का दमन किया, लोकतंत्र की गरिमा पर आघात किया, बल्कि प्रेस की आजादी को कुचल डाला। 
  • आजादी के बाद पहली बार इंदिरा सरकार ने 26 जून 1975 को ‘Central Censorship Order’ और ‘Guidelines for the Press’ जारी किया।
  • 11 फरवरी 1976 को Prevention of Publication of Objectionable Matters Act of 1976 को भी लागू कर दिया
  • इंदिरा गांधी ने 1971 में प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए पहली बार कदम उठाने के लिए सोचा, तब वो सूचना और प्रसारण मंत्रालय का भी जिम्मा संभाल रहीं थीं।
  • इंदिरा गांधी ने ऐसा कानून तैयार करवाया, जिसमें समाचारपत्रों के मालिकों का एकाधिकार खत्म करने के प्रवाधान थे।
  • ऐसे प्रावधान किए गए जिससे सरकार के प्रतिनिधियों को समाचार पत्रों के बोर्ड अधिक शक्ति मिले। हालांकि यह कानून की शक्ल नहीं ले सका।
  • 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने प्रेस की आजादी को यह कहते हुए खत्म कर दिया कि वह राष्ट्रीय नीति के विरूद्ध कार्य कर रहा है। इस दौरान वे सारी बंदिशें लगा दी गईं जो अंग्रेजों द्वारा प्रेस के ऊपर लगाए जाते थे।

राजीव गांधी ने प्रेस पर अंकुश के लिए लाया कानून

  • राजीव गांधी, प्रेस की आजादी और मुखरता को गलत मानते थे और अपनी सरकार के मुताबिक ही रखना चाहते थे।
  • राजीव गांधी ने लोकसभा से Defamation Bill 1988 पारित करवाकर प्रेस की आजादी को कुचलना चाहा, लेकिन पत्रकारों ने राजीव गांधी की सरकार को मजबूर कर दिया कि वह यह विधेयक राज्यसभा में पेश न कर सके।

एक और आंकड़े जो हैरत में डाल देते हैं, वो ये हैं कि प्रेस की आजादी की बात करने वाले राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने यूपीए-2 के पांच वर्षों के शासन काल में महज छह बार ही मीडिया से इंटरैक्शन किया उनमें से भी दो ऐसे मौके थे जिनमें महज दो मिनट के लिए ही मीडिया का सामना किया। 

नेहरू-गांधी परिवार प्रेस की आजादी को कितना तवज्जो देते हैं इसका अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि राहुल गांधी ने 2004 से राजनीति में आने के 10 साल बाद पहली बार किसी न्यूज चैनल को इंटरव्यू दिया। इसके साथ ही राहुल गांधी और सोनिया गांधी इस बात का भी विशेष ख्याल रखते हैं कि उनके करीबी पत्रकारों से ही वे मिलें, ताकि कोई मुश्किल प्रश्न पेश न आए।  

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