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क्यों गुजरात चुनाव भी हारेंगे राहुल गांधी?

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गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की जातिवादी संगठनों के नए नेताओं से गठबंधन करने की कवायद, उसकी उस हताशा का बयान करती है, जैसे कोई व्यक्ति नदी में डूबने से बचने के लिए अपने हाथ-पांव मारता है, ताकि किसी तरह जान बच सके। लगातार तीन विधानसभा चुनावों से हार का मुंह देख रही कांग्रेस, राहुल गांधी के कंधों के सहारे राज्य में खड़े होने का प्रयास कर रही है। इन जातिगत संगठनों के साथ कांग्रेस के समझौते का यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि गुजरात को उस सुशासन से विकास दिया जाए, जिस पर राज्य पिछले 15 सालों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बढ़ रहा है।जनता से दूरी रखने वाली कांग्रेस -दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी होते हुए भी कांग्रेस सबसे अधिक अलोकतांत्रिक पार्टी रही है, जिसमें नेताओं को ताकत लोकतंत्र के दम पर नहीं, बल्कि दिल्ली में बैठी हाई कमान सोनिया गांधी से मिलती है। कांग्रेस के पास गुजरात में जनता से कटे हुए ऐसे नेताओं की भरमार है। एक तरफ भरतसिंह सोलंकी, अर्जुन मोड़वाढ़िया, सिद्धार्थ पटेल हैं तो दूसरी तरफ मोहनसिंह रथवा, शक्तिसिंह गोविल और तुषार चौधरी हैं। जनता से कोसों दूर रहने वाले ऐसे नेताओं की लिस्ट को लंबी करने वालों में अहमद पटेल, मधुसूदन मिस्त्री और दीपक बाबरिया है, जिनका एकमात्र काम दिल्ली में सोनिया दरबार लगाना है। इनमें से किसी भी नेता का राज्य में जनाधार व्यापक स्तर पर नहीं है, इसलिए कांग्रेस ने राज्य में प्रचार के लिए जिन पोस्टरों को छपवाया है, उनमें गांधी परिवार के अतिरिक्त सरदार पटेल की तस्वीर का भी उपयोग किया गया है। आजादी के बाद सरदार पटेल को भूल चुकी कांग्रेस को अब अचानक से सरदार पटेल की याद आ रही है, क्योंकि राज्य में इस समय उसे कोई दूसरा खेवनहार दिखाई नहीं दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के दिल में सरदार पटेल का जो सम्मान है, उससे कांग्रेस और बिलबिला गई है।राहुल का ‘HAJ’- जनता से कटे हुए नेताओं की भरमार ने राहुल गांधी को HAJ पर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। इस मजबूरी में वह हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी से हर हाल में समझौता करने को तैयार हैं। हार्दिक पटेल, पाटीदार समुदाय के लिए शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर एक नए नेता के रुप में उभरे हैं, जो आरक्षण को अपनी राजनीति का हथियार बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं। दूसरी तरफ अल्पेश ठाकोर हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों को मिलने वाले आरक्षण के कोटे को किसी भी हाल में पाटीदार समुदाय से साझा करने को तैयार नहीं हैं और उन्होंने पाटीदारों के आरक्षण की मांगों का विरोध करके अपनी राजनीति को चमकाया है। अल्पेश ठाकोर ने कांग्रेस का दामन तो थाम लिया है, लेकिन हार्दिक पटेल ने कांग्रेस को 7 नवबंर तक अल्टीमेटम दे रखा है कि वह बताए कि कैसे पाटीदारों को 10 प्रतिशत का आरक्षण देगी। इस पर कांग्रेस ने अभी तक चुप्पी साध रखी है। इस पर कोई भी बयान देने से वह बच रही है। हार्दिक की शर्तों को पूरा करना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर है। राज्य में फिलहाल 49.5 प्रतिशत आरक्षण लागू है, जिसे बढ़ाया नहीं जा सकता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।

राहुल गांधी अभी हार्दिक की मांगों से निपट ही रहे हैं कि उनकी HAJ यात्रा के लिए दलित नेता जिग्नेश मेवाणी सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़े हो गए हैं। जिग्नेश कभी कांग्रेस से हाथ मिलाने की बात करते हैं तो कभी किसी को समर्थन न देने की बात करते हैं। अभी तक राहुल गांधी जिग्नेश के साथ कोई पक्का समझौता करने में सफल नहीं हो सके हैं।
मोदी के विकास की मंशा पर गुजरात के विश्वास से कांग्रेस का दांव बेकार– नरेन्द्र मोदी पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री के रूप में जिस तरह से राज्य को विकास के पथ पर आगे ले जाते रहे हैं और योजनाओं को लागू करते रहे हैं, उससे गुजरात की जनता वशीभूत है। राज्य के मतदाताओं का नरेन्द्र मोदी पर पूर्ण विश्वास है। गुजरात की जनता जानती है कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने विकास के लिए ही अपने हर क्षण और अपनी ऊर्जा को समर्पित किया है। जनता यह भी समझती है कि नरेन्द्र मोदी के निर्णय कठोर हो सकते हैं, लेकिन उनके विकास करने की मंशा पर कोई सवाल नहीं किया जा सकता है। गुजरात के इस अटूट विश्वास का सबूत 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव हैं, जिनमें मोदी को कांग्रेस ने वैसे ही निशाना बनाया था, जैसा कि आजकल बना रही है, लेकिन फिर भी दोनों चुनावों में नरेन्द्र मोदी को बड़े बहुमत से विजय मिली। गुजरात राज्य में ही नहीं, नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में भी प्रधानमंत्री मोदी की विजय ने यही साबित किया कि उनके निर्णय से परेशानी हो सकती है, लेकिन उनकी विकास करने की मंशा सौ फीसदी खरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस कर्मठता और जनता के विश्वास के आगे राहुल गांधी विवश दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि अब उनके तरकश में वे तीर नहीं, जिनसे वे जनता के इस विश्वास को तोड़ सकें।यूपीए सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार राहुल का साथ नहीं छोड़ रहे –राहुल गांधी वंशवाद की बेल पकड़कर जिस कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं, उसी कांग्रेस की दस सालों के शासन के दौरान, 2004-14 तक, केन्द्र में रही मनमोहन सिंह की सरकार ने देश में जिस निराशा और भ्रष्टाचार का माहौल पैदा किया था, उस पीड़ा को जनता आज तक भूल नहीं पाई है। जनता की वही पीड़ा आज भी राहुल गांधी का पीछा कर रही है। कोयला, स्पेक्ट्रम, जमीन, सैन्य सामानों, दाल, आदर्श, कॉमनवेल्थ खेल आदि के घोटालों में घिरी हुई मनमोहन सिंह की सरकार किसी भी निर्णय को लागू नहीं कर पा रही थी और देश निराशा की गर्त में पहुंच चुका था। सरकार कोई काम नहीं कर पा रही थी, अर्थव्यवस्था ठप्प पड़ गई थी, बेरोजगारी बढ़ चुकी थी। जब ऐसी सरकार के कर्ता-धर्ता राहुल गांधी रहे हों तो जनता में कैसे विश्वास पैदा होगा कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अच्छी सरकार गुजरात की जनता को देंगे, जो अपने सुशासन से निरंतर विकास सुनिश्चित करती रही है।

18 दिसबंर को गुजरात की जनता जो फैसला करने जा रही है, उसे राहुल गांधी अच्छी तरह से समझ रहे हैं, इसलिए उनका हताशा में हाथ-पांव मारना स्वाभाविक है। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए गुजरात का चुनाव एक बार फिर से निरंतर हार के इतिहास को ही दोहराएगा, क्योंकि कांग्रेस ने अपनी हार से कोई भी सबक सीखना बंद कर दिया है।

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