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चीन और पाकिस्तान की मदद के लिए राफेल डील का विरोध कर रही है कांग्रेस!

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भारत ने सितंबर 2016 में फ्रांस के साथ एक इंटर-गर्वनमेंट समझौते को साइन किया था। इसके तहत 36 राफेल डील खरीदने का सौदा हुआ। इन फाइटर जेट्स की डिलीवरी सिंतबर 2019 से भारत को शुरू हो जाएगी।

देश की रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह बेहद आवश्यक डील है, जिसे इंडियन एयरफोर्स हर हाल में चाहती है। जाहिर है अगर इस डील में कोई बाधा आती है तो यह देश की सुरक्षा के लिए गंभीर स्थिति पैदा करेगा।

दूसरी ओर कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार फ्रांस के साथ राफेल फाइटर जेट के लिए हुई 58,000 करोड़ की डील पर देश को अंधेरे में रख रही है। उनका कहना है कि सरकार इस डील से जुड़ी जानकारियों को साझा नहीं कर रही है। वहीं रक्षा मंत्रालय ने भी साफ कर दिया है कि डील को लेकर जो गोपनीयता बरती जा रही है वह दरअसल डील का हिस्‍सा है।

आपको बता दें कि साल 2005 और 2008 में तत्‍तकालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी और एके एंटोनी ने भी इस डील से जुड़ी व्‍यावसायिक जानकारियों का साझा करने से मना कर दिया था।

साल 2005 में जब प्रणब मुखर्जी रक्षा मंत्री थे तो उनकी पार्टी के ही सांसद जर्नादन पुजारी ने दूसरे देशों से होने वाली रक्षा खरीद से जुड़ा सवाल पूछा था और मुखर्जी ने राष्‍ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कोई भी जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया था।

इससे तीन वर्ष बाद ही जब एके एंटोनी रक्षा मंत्री बने तो दिसंबर 2008 में उन्‍होंने भी यही रुख अपनाया। सीपीएम के दो सांसदों प्रशांता चटर्जी और मोहम्‍मद अमीन ने 10 बड़ी रक्षा आपूर्ति से जुड़ी जानकारियां हासिल करनी चाही। एंटोनी ने जानकारियां देने से साफ इनकार कर दिया।

इसी तरह से जब साल 2007 में सीताराम येचुरी ने रक्षा डील से जुड़ी कुछ जानकारियां हासिल करनी चा‍हीं तो तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने मना कर दिया। येचुरी ने एंटोनी से इजरायल से खरीदे जाने वाली मिसाइल की कीमतों के बारे में पूछा था।

 

जाहिर है वर्तमान भारत सरकार के लिए भी रक्षा खरीद से जुड़ी जानकारियों को साझा करना संभव नहीं है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि पूरी डिफेंस इंडस्‍ट्री अलग-अलग कीमतों पर काम करती है। वर्तमान सरकार ने 2016 में इसी करार को कन्टीन्यू किया गया।

जाहिर है कि राहुल गांधी एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष होते हुए भी देश को गुमराह कर रहे हैं। हालांकि सवाल उठ रहा है कि आखिर राहुल गांधी इस जानकारी को सार्वजनिक किए जाने का दबाव क्यों बना रहे हैं। क्या यह कोई षडयंत्र है?

सवाल यह भी कि क्या राहुल गांधी मोदी सरकार से रक्षा सौदे की जानकारी हासिल कर उसे पाकिस्तान और चीन तक पहुंचाना चाहते हैं?

बहरहाल आइये आपको दिखाते हैं राफेल डील पर राहुल गांधी द्वारा फैलाए जा रहे झूठ और सच्चाई

झूठ नंबर – 01
ज्यादा कीमत पर खरीदे गए विमान
फ्रांस की कंपनी से हुए सौदे के अनुसार 7.87 बिलियन यूरो यानी 59 हजार करोड़ की लागत से 36 राफेल विमान खरीदे जाएंगे। जबकि पुरानी डील की कीमत करीब 1.20 लाख हजार करोड़ रूपये थी। दरअसल सच्चाई यह है कि फ्रांस इस सौदे की कीमत करीब 65 हजार करोड़ चाहता था, लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के प्रयासों से सौदे की कीमत कम हो गई। अब ये सौदा 59 हजार करोड़ में तय हुआ यानी यूपीए सरकार के द्वारा तय की गई कीमत की तुलना में करीब 57 अरब 61 करोड़ रुपये बचाये जा सके।

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झूठ नंबर – 02
बिचौलियों की भूमिका पर सवाल
इस डील के पीछे प्रधानमंत्री की अपनी कोशिशें भी कम नहीं रही हैं। पीएमओ ने लगातार बातचीत के हर दौर पर नजर बनाए रखा और समुचित सुझाव भी दिए गए। प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने डेसॉल्ट (Dassault) एविएशन द्वारा बताई गई शर्तों से बेहतर शर्तों की आपूर्ति के लिए अंतर-सरकारी समझौते यानी एक देश की सरकार से दूसरे देश की सरकार के साथ हुए समझौते को अंतिम रूप दिया गया। इस समझौते से जहां कीमतें कम करने में सफलता मिली वहीं बिचौलियों के लिए कोई मौका नहीं रह गया।

झूठ नंबर – 03
एफडीआई में पक्षपात किया गया
राफेल विमान सौदे के बदले देश में निवेश की सीमा भी बढ़ाई गई। इसका मतलब यह है कि फ्रांस में निर्मित होने वाले विमानों का यह सौदा मेक इन इंडिया अभियान को भी गति देगा। रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के अनुसार 24 जून 2016 को सरकार द्वारा रक्षा क्षेत्र में जारी की गई नई नीति के तहत डिफेंस सेक्‍टर में बिना पूर्व अनुमति के 49 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी दी गई। अब संयुक्‍त उद्यम कंपनी का गठन करने के लिए केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल या सीसीएस की अनुमति की जरूरत नहीं है।

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झूठ नंबर – 04
मेक इन इंडिया को नजरअंदाज किया
3 अक्टूबर, 2016 को राफेल लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी डेसॉल्ट ने रिलायंस के साथ संयुक्त रणनीतिक उपक्रम स्थापित करने का ऐलान किया। यह उपक्रम विमान सौदे के तहत ‘ऑफसेट’ अनुबंध को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद फ्रांस 50 प्रतिशत ऑफसेट उपबंध के लिए सहमत हो गया था। यानी अब इसमें 50 प्रतिशत ‘ऑफसेट’ का प्रावधान भी रखा गया। इसका अर्थ यह हुआ कि छोटी बड़ी भारतीय कंपनियों के लिए कम से कम तीन अरब यूरो का कारोबार और ‘ऑफसेट’ के जरिये सैकड़ों रोजगार सृजित किए जा सकेंगे। 

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झूठ नंबर – 05
इन्फ्लेशन का लाभ नहीं मिलेगा
2016 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और भारतीय वायु सेना दल ने फ्रेंच अधिकारियों से डील को मौजूदा बाजार भाव पर लाने के लिए एक के बाद एक कई दौर की बातचीत की, जिसके साथ अधिकतम 3.5 प्रतिशत का इन्फ्लेशन तय किया गया। अगर यूरोपीय बाजारों में इन्फ्लेशन इससे कम रहेगा तो इसका लाभ भी भारत को मिलेगा। जबकि यूपीए के दौर में इन्फ्लेशन की शर्त 3.9 प्रतिशत निर्धारित हुई थी। इस डील के तहत फ्रेंच कंपनी डेसॉल्ट को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि फ्लीट का 75 प्रतिशत हर हाल में ऑपरेशनल रहे।

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झूठ नंबर – 06
 वारंटी को लेकर डील में कन्फ्यूजन
यूरोफाइटर (एईडीएस) और राफेल के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाद, राफेल ने सबसे कम बोली लगा कर यह सौदा जीता। ‘रेडी टू फ्लाई’ राफेल डील के तहत इसके लिए 5 साल की वारंटी पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके साथ ही वारंटी को बढ़ाने के प्रावधान भी रखे गए हैं। इतना ही नहीं अगर 36 महीने में राफेल विमान को देने में देरी हुई तो कंपनी पर पेनल्टी भी लगेगी।

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झूठ नंबर – 07
अनुभवहीन कंपनी को दिया काम
कांग्रेस का आरोप है कि फ्रांस की कंपनी डेसॉल्ट एविएशन ने भारतीय पाटर्नर रिलायंस डिफेंस को गलत तरीके से चुना है और उसे इस क्षेत्र का अनुभव नहीं  है, लेकिन यह जान लेना आवश्यक है कि रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लि. (आरडीईएल) पहले से दो नौसैनिक गश्ती जहाज बना रहा है और कंपनी को रक्षा मंत्रालय से करार के तहत भारतीय तटरक्षक बल के लिए 14 तेज रफ्तार गश्ती पोतों के निर्माण और डिजाइनिंग का ठेका पहले से मिला है। इसलिए इसे अनुभवहीन कंपनी कहना बिल्कुल गलत है।

झूठ नंबर – 08
HAL को मिलना था निर्माण ठेका
रिलायंस एरोस्पेस और डेसॉल्ट ने एक संयुक्त उद्यम पर हस्ताक्षर किया और भारत में युद्ध विमानों को निर्माण करने का निर्णय लिया। चूंकि एफडीआई के तहत कंपनियों को यह आजादी है कि वह किसके साथ अधिक सहज है इसको लेकर सवाल नहीं उठाए जा सकते। इस प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरती गई है और किसी भी प्रकार से देशहित से समझौता नहीं किया गया है। रिलायंस और डेसॉल्ट का ये संयुक्त उद्यम पहले चरण में विमान के स्पेयर पार्ट्स बनाएगा और द्वितीय चरण में डेसॉल्ट एयरक्राफ्ट का निर्माण शुरू करेगा।

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झूठ नंबर – 09
भारत के रक्षा मानक के अनुरूप नहीं
ये लड़ाकू विमान नवीनतम मिसाइल और शस्त्र प्रणालियों से लैस हैं और इनमें भारत के हिसाब से परिवर्तन किये गए हैं। ये लड़ाकू विमान मिलने के बाद भारतीय वायुसेना को अपने धुर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के मुकाबले अधिक ‘‘ताकत’’ मिलेगी। राफेल के साथ ही भारत ऐसे हथियारों से लैस हो जायेगा जिसका एशिया महाद्वीप में कोई सानी नहीं। राफेल के साथ मेटीओर मिसाइल्स जो हवा से हवा में 150 किमी तक मार कर सकती हैं। राफेल मीका मिसाइल से भी लैस है जिसकी रेंज हवा से हवा में 79 किमी है। स्काल्प मिसाइल भी राफेल के साथ है जो क्रूज मिसाइल की श्रृंखला में आती है और इसका रेंज 300 किमी है। इस डील के बाद चीन हो या पाकिस्तान भारत की हवाई ताकत के जद में आ जाएंगे और भारत के सामने कमतर ही महसूस करेंगे।

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झूठ नंबर – 10
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं कर रहा फ्रांस
यह झूठ बड़े जोर-शोर से फैलाया जा रहा है कि इसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात नहीं है, लेकिन सच्चाई यह है कि रिलायंस के साथ जॉइंट वेंचर के माध्यम से डेसॉल्ट कंपनी भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर रहा है।  रिलायंस और डसॉल्ट का ये संयुक्त उद्यम पहले चरण में विमान के स्पेयर पार्ट्स बनाएगा और द्वितीय चरण में दसों एयरक्राफ्ट का निर्माण शुरू करेगा।

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