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राफेल फाइटर जेट डील से जुड़ी एक-एक हकीकत जानिये

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पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि राफेल डील की सच्चाई को छिपाना चाह रही है। उन्होंने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानि HAL को इस डील से बाहर रखने पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि यूपीए की सरकार के समय में ही सरकारी कंपनी प्रॉडक्शन टर्म्स पर डसॉल्ट एविएशन से सहमत नहीं हो सकी। ऐसे में यूपीए सरकार के समय में ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानि HAL इस डील से बाहर हो गई थी।

दरअसल राफेल डील को लेकर पिछले कई महीनों से कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। पक्ष और विपक्ष अपने-अपने तरीके से अपनी बात जनता के सामने ला रहे हैं। हालांकि हकीकत सामने नहीं आ पा रही है। परफॉर्म इंडिया की टीम ने सच्चाई सामने लाने के लिए रिसर्च के आधार पर जो जानकारियां जुटाई हैं, वह चौंकाने वाले हैं। साथ ही कांग्रेस पार्टी द्वारा झूठे दुष्प्रचार की पोल भी खोलती हैं।

सबसे पहले हकीकत ये है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने राफेल विमानों की कीमत को लेकर जब भी अपनी जुबान खोली है उससे गलत जानकारी ही बाहर आई है। राहुल गांधी ने हर दूसरे दिन विमान की अलग-अलग कीमत बताई और सही तथ्यों को झुठलाने की कोशिश की।

राहुल गांधी ने हर दिन बदल दी राफेल की कीमत

20 जुलाई, 2018
राहुल ने लोकसभा में 520 करोड़ रुपये बताया

13 अगस्त, 2018
कर्नाटक के बीदर में 526 करोड़ रुपये बताया

11 अगस्त, 2018
राजस्थान के जयपुर में 540 करोड़ रुपये बताया

10 मई, 2018
कर्नाटक के औड़द मे 700 करोड़ रुपये बताया

27 अप्रैल, 2018
कर्नाटक के मैसूर में 750 करोड़ रुपये बताया

राफेल की जरूरत क्यों ?

  • भारतीय वायुसेना के पास ज्यादातर मिग 21 और चालीस साल पुराने जगुआर विमान हैं जो 1970 में खरीदे गए थे।
  • सुखोई 1996 में खरीदा गया है जो अब आउटडेटेड हो गया है। 1999 के करगिल युद्ध में इनकी खामियों का पता चला।
  • ऊंचाई वाले इलाकों के लिए लड़ाकू विमानों की जरूरत को देखते हुए जून 2001 में 126 फाइटर एयरक्राफ्ट्स खरीदने की मंजूरी मिली।

यूपीए ने डील फाइनल करने में की देरी

  • डीफेंस एक्यूजेशन काउंसिल यानि DAC ने जून 2007 में अनुमति दी और यूपीए सरकार ने अगस्त 2007 में 126 एयरक्राफ्ट खरीदने के लिए बिड्स निकाली।
  • अप्रैल 2008 में 6 कंपनियों के प्रस्ताव आए, इनमें 2 कंपनियों को शॉर्ट लिस्ट किया गया। राफेल बनाने वाली डसॉल्ट और यूरो फाइटर बनाने वाली EADS के नाम सामने आए।
  • यह प्रक्रिया अप्रैल, 2011 में खत्म हुई यानि 10 साल लग गए। जनवरी 2012 में डसॉल्ट एविएशन ने सबसे कम बोली लगाकर इस बिड को जीत लिया।
  • बड़ी सच्चाई ये है कि यूपीए के समय में इस पर सहमति नहीं हुई इसलिए की HAL और डसॉल्ट में समझौता नहीं हो पाया था।

देश की सुरक्षा के लिए मोदी सरकार की पहल

  • अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस गए, दोनों देशों के साझा बयान में राफेल डील का जिक्र किया गया।
  • 10 अप्रैल, 2015 को भारत ने कहा कि इंटर गवर्मेंटल डील के तहत फ्रांस से 36 विमान खरीदना चाहता है।
  • मोदी सरकार ने कहा यूपीए की शर्तों से बेहतर टर्म एंड कंडीशन के साथ सौदा होगा और मई 2015 में डीएसी ने 36 राफेल विमान खरीद को मंजूरी दी।
  • 14 महीनों तक फ्रांस की सरकार से बातचीत और मोलभाव हुए जिसके बाद अगस्त 2016 को CCS ने इस खरीद को मंजूरी दे दी।
  • यह तय हुआ कि सितंबर 2019 से अप्रैल 2022 के बीच इन विमानों की डिलवरी होगी। यानि सरकार ने सभी मानक प्रक्रियाओं का पालन किया।

कांग्रेस के तीन मुख्य आरोप

पहला- यूपीए ने 525 करोड़ में खरीदती जबकि एनडीए इसे 1680 करोड़ में खरीदेगा।

दूसरा– कांग्रेस कहती है कि HAL को 36 हजार करोड़ का काम मिलता जो अब नहीं मिलेगा।

तीसरा– रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को 30 हजार करोड़ का फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया।

आरोपों की हकीकत

  • अगस्त 2007 में यूपीए की डील में एक विमान की कीमत 538 करोड़ थी। उस वक्त एक यूरो 67.87 रुपये का था।
  • मई 2015 में अगर यूपीए डील करती तो बेसिक कीमत 737 करोड़ होती क्योंकि एक यूरो की कीमत 73.08 रुपये हो गई थी।
  • एनडीए की डील के मुताबिक एक बेसिक राफेल की कीमत 670 करोड़ रुपये है, यानि हर विमान पर 67 हजार करोड़ की बचत।
  • अभी यूरो की कीमत 82 रुपये के मुताबिक सितंबर, 2019 में यूपीए के हिसाब से कीमत 938 करोड़ रुपये होगी, जबकि मोदी सरकार द्वारा खरीदा गया राफेल 794 करोड़ का होगा।

एनडीए की डील इसलिए है बेहतर

  • यूपीए के समय डिलिवरी के लिए 72 महीने की समय सीमा तय हुई थी, जबकि इस सरकार ने 67 महीने में ही डिलवरी समय सीमा तय की है।
  • यूपीए की डील में एडवांस ट्रेनिंग का कोई प्रावधान नहीं था, जबकि एनडीए की डील में फ्रांस की एयरफोर्स के साथ ट्रेनिंग शामिल है।
  • यूपीए की डील में ‘बियोंड विजुअल रेंज’ की क्षमता- मीडियम थी जबकि इसे बढ़ाकर हाइयर यानि उच्च की गई है। छह महीने की अतिरिक्त वारंटी भी है।
  • वर्तमान राफेल डील में ‘मैटोर’ और ‘स्काल्प’ मिसाइल ले जाने की क्षमता है, जो पिछली डील के तहत नहीं मिलने वाला था।
  • मोदी सरकार की डील में लड़ाकू विमान में लक्ष्य साधने से लेकर विशेष हथियार रखने तक के लिए विशेष उपकरण लगाने की व्यवस्था है, जो अन्य लड़ाकू विमान से इसे अलग और विशेष बनाता है।
  • विमान में भारत की मांग के अनुरूप विशेष बदलाव भी किया गया है। जैसे- “मॉड्यूलर डेटा प्रोसेसिंग यूनिट” (एमडीपीयू) भी लगाई गई है जो नई पीढ़ी के मिशन का एक नया कंप्यूटर है।
  • यूपीए की डील में स्पेयर सपोर्ट 40 साल का था जबकि मोदी सरकार में यह 50 साल का है। इसके अलावा सर्विस कांट्रेक्ट भी है। 

असली कीमत क्यों नहीं बताना चाहती सरकार? जानिये सच
वर्ष 2008 में यूपीए ने फ्रांस के साथ समझौता किया था जिसके तहत राफेल की बेसिक कीमत गोपनीय रहेगी। दरअसल कीमतों के विवरण के साथ ये पता लगाना आसान होता है कि उस विमान में किस तरह के हथियार लगाए गए होंगे, यानि ये सीक्रेट रहने चाहिए। आपको बता दें कि सरकार ने जो दाम बताया है वह बेसिक विमान का है। इसके साथ जो उपकरण लगाए जाएंगे वह भी गोपनीय होंगे।

यूपीए ने HAL के साथ नहीं किया करार

वर्ष 2006 में डीएसी ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानि HAL को इस डील में OFFSET पार्टनर बनाया गया था। यानि भारत में बनाती तो HAL ही इसका निर्माण करता।

जून 2007 में डीएसी ने इंडियन इंडस्ट्री को ऑफसेट पार्टनर बनाया, यानि भारत में इंडियन इंडस्ट्री करती। गौरतलब है कि यूपीए के हिसाब से 126 में से 108 का निर्माण HAL को करना था।

यूपीए सरकार के दौरान हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और फ्रांसिसी कंपनी डसॉल्ट के बीच बातचीत शुरू हुई थी। शुरुआती बातचीत के बावजूद निर्णायक कीमत और लागत को लेकर दोनों के बीच कभी बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई।

अपने टारगेट पूरे नहीं कर पा रहा HAL

  • वर्तमान सरकार के अनुसार 83 फाइटर जेट्स, 15 कॉम्बो हेलीकॉप्टर 19 डॉर्नियर एयरक्राफ्ट्स, 200 कोमोव हेलीकॉप्टर खरीद रही है। आपको बता दें कि ये सौदा एक लाख करोड़ रुपये का है।
  • HAL को 2006 से 2010 के बीच 40 तेजस एयरक्राफ्ट्स देना था, लेकिन उसने 9 एयरक्राफ्ट्स की डिलीवरी की है। यानि अपने शिड्यूल से बहुत पीछे है। जाहिर है रक्षा जरूरतों के अनुसार एचएएल पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है।

रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के मामले को जानिये

रिलायंस डिफेंस डील कम्पनी पर आरोप है कि उसे ऑफसेट का काम दिया गया है, लेकिन सरकार कह रही है कि उसने नहीं डसॉल्ट एविएसन ने चुना है। क्योंकि वेंडर अपने भारतीय पार्टनर को चुनने के लिए स्वतंत्र है।

हकीकत ये भी है कि डसॉल्ट एविएशन ने अपने भारतीय पार्टनर को कोई जानकारी नहीं दी है। ये कंपनी 28 मार्च, 2015 को बनी और 10 अप्रैल को सौदा हो गया। रफाल बनाने वाली डसॉल्ट एविएशन ने चुना है।

अहम जानकारी ये है कि ये डील 50 प्रतिशत ऑफसेट क्लॉज के तहत है। यानि फ्रांस को मिला पैसा का भारत में निवेश करना होगा, जो कि पहले 30 प्रतिशत ही निवेश करना था।

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