Home विपक्ष विशेष प्रांतवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और संप्रदायवाद है कांग्रेस की राजनीति का आधार

प्रांतवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और संप्रदायवाद है कांग्रेस की राजनीति का आधार

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बाहर के जो तमाम लोग यहां आते हैं, क्राइम करते हैं, उनकी वजह से अपराध बढ़ा है, गांव में टकराव बढ़ा है। वे गांवों के सामान्य लोगों को मारते हैं और अपराध करके वापस चले जाते हैं। उनके कारण, गुजरातियों को रोजगार नहीं मिल रहा है। क्या ऐसे लोगों के लिए हमारा गुजरात है?’’ कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर का ये वही भड़काऊ बयान है जिसके बाद ‘ठाकोर सेना’ के लोगों ने यूपी-बिहार के लोगों को गुजरात छोड़ने के लिए की धमकियां देनी शुरू कर दीं, उन्हें बंधक बनाया, हमले किए गए और उनकी कमाई भी लूट ली। मेहसाणा, गांधीनगर, साबरकांठा, पाटन, सानंद और अहमदाबाद जिलों में सिलसिलेवार तरीके से अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर रह रहे यूपी-बिहार के लोगों को निशाना बनाया गया। आपको बता दें कि इन क्षेत्रों में अल्पेश ठाकोर के ठाकोर सेना का गहरा प्रभाव है। अल्पेश वही हैं जो राहुल गांधी के चहेते भी हैं और कांग्रेस अध्यक्ष ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का राष्ट्रीय सचिव भी बनाया है। सवाल उठता है कि आखिर इस मसले पर राहुल गांधी चुप क्यों हैं?  राहुल गांधी सब कुछ जानते हुए अल्पेश को पार्टी से निकाल क्यों नहीं रहे हैं? ऐसी खबरें हैं कि राहुल गांधी ने ही अल्पेश को विभाजन की रेखा खींचने की स्वीकृति दे रखी है ताकि उसका राजनीतिक लाभ लिया जा सके। दरअसल कांग्रेस की राजनीति क्षेत्रवाद, जातिवाद और प्रांतवाद के बंटवारे के आधार पर आगे बढ़ी है। यूपी-बिहार के लोगों से घृणा तो उसके डीएनए में है।

कांग्रेस के DNA में है यूपी-बिहार का विरोध

मई,  2007

शीला दीक्षित ने कहा कि दिल्ली की समस्याओं के लिए यूपी-बिहार के लोग जिम्मेदार

मार्च, 2011

विकीलीक्स ने खुलासा किया कि पी चिदंबरम ने उत्तर भारतीयों को देश पर बोझ बताया

मार्च, 2018

कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि दक्षिण भारत के पैसों पर पलते हैं उत्तर भारतीय

अक्टूबर, 2018

अल्पेश ठाकोर ने गुजरात में अपराध के लिए यूपी-बिहार के लोगों को जिम्मेदार कहा

गौरतलब है कि गुजरात में 70 प्रतिशत से ज्यादा श्रमिक उत्तर भारतीय हैं, जिनमें ज्यादातर बिहार-यूपी से ही हैं। इनमें से 40 प्रतिशत काम पर नहीं आ रहे।  इसका सीधा अर्थ है उत्पादकता में 40 प्रतिशत की कमी। आपको बता दें कि एक सप्ताह की हिंसा से गुजरात का हजारों करोड़ का नुकसान हो चुका है। बहरहाल आइये हम देखते हैं कि कैसे कांग्रेस विभाजन और बंटवारे की राजनीति करती रही है। 

दलितों को भड़काने की राजनीति
सहारनपुर में किस तरह सवर्णों और दलितों के बीच टकराव स्थापित करने की सियासत की गई ये सब जानते हैं। ये भी साफ हो गया है कि कांग्रेस की शह पर सहारनपुर में इस संघर्ष की साजिश रची गई और उनके कई नेताओं का इस मामले में हाथ भी सामने आ रहे हैं। इसी तरह गुजरात के ऊना में दलित पिटाई की भी कांग्रेस ने साजिश रची थी और भाजपा पर दोष मढ़ने का प्रयास किया था। लेकिन गुजरात की जनता ने कांग्रेस की राजनीति को समझ लिया और उसे स्थानीय निकाय चुनाव में हराकर उसे सबक भी सिखा दिया।

किसानों को भड़काती है कांग्रेस
साठ सालों तक सत्ता में रही कांग्रेस ने किसानों को ठगने का काम किया है। हर स्तर पर पंगु बनाकर रखने की नीति पर चलते हुए किसानों के नाम पर राजनीति भी खूब करती है। लेकिन मध्यप्रदेश में मंदसौर की घटना ने कांग्रेस की पोल खोल कर रख दी है। किसान कल्याण के नाम पर राजनीति कर रही कांग्रेस किस तरह किसानों को भड़काती है वो जगजाहिर हो चुका है। कांग्रेस के विधायक, नेता किसानों का नेतृत्व करने के नाम पर आगे आते हैं और किसानों को गोलियां खाने को छोड़ भाग जाती है।

अलगाववाद की जहर बोती है कांग्रेस
साठ सालों तक सत्ता में काबिज रही कांग्रेस ने देश की समस्याओं का हल तो ढूंढ नहीं पाई … उल्टे क्षेत्रवाद और प्रांतवाद की राजनीति को बढ़ावा ही दिया। हाल में ही जब कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने सरेआम गाय काटा तो देश में विरोध के स्वर सुनाई देने लगे। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच विभेद पैदा करने की कुत्सित कोशिश की गई। ट्विटर और सोशल मीडिया पर ‘द्रविनाडु’ यानी दक्षिण भारत के चारों प्रमुख राज्यों को मिलाकर अलग देश निर्माण की मांग को हवा दी गई। आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस किस कदर बंटवारे और विभाजन की राजीनीति करती है।

राज्यों को आपस में लड़वाती है कांग्रेस
नदियों के जल बंटवारे का मामला हो या फिर राज्यों के सीमांकन का… कांग्रेस ने यहां भी राजनीति की। इसी का नतीजा है कि आज भी जल बंटवारे के नाम पर तमिलनाडु और कावेरी आमने-सामने होते हैं तो पंजाब, हिमाचल और राजस्थान भी एक दूसरे के खिलाफ तलवारें निकाल लेते हैं। हालांकि मोदी सरकार इन समस्याओं के समाधान की तरफ बढ़ तो रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे उलझा कर रख दिया है। दूसरी तरफ सीमांकन के नाम पर यूपी-बिहार, बिहार -बंगाल, असम-बंगाल के बीच तनातनी की शिकायतें आती रहती हैं।

 

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