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नैतिकता और शुचिता की फांस में फंसता विपक्ष

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बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी के कुछ कद्दावर नेताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मंजूरी दे ही है। लेकिन केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने साफ शब्दों में कह दिया है, ”हां मैं 6 दिसंबर को मौजूद थी, इसमें साजिश की कोई बात नहीं। अयोध्या आंदोलन में मेरी भागीदारी थी, मुझे कोई खेद नहीं। मैं इसके लिए कोई भी सजा भुगतने को तैयार हूं।”

इसके साथ ही उमा भारती ने कहा है कि उन्होंने किसी भी तरह से लोगों को उकसाने का काम नहीं किया था। लेकिन कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उमा भारती और सांसद विनय कटियार से इस्तीफा मांगा है। हालांकि इन्होंने ये साफ कर दिया है कि वे इस्तीफा नहीं देंगे।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी नेताओं की तरफ से ये दलील दी गई है कि इस मामले में उन लोगों ने किसी भी तरह के उकसावे का काम नहीं किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अर्जी पर आपराधिक मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोजाना सुनवाई के भी आदेश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि स्पेशल कोर्ट दो साल में मामले की सुनवाई पूरी करे। जाहिर है अभी इस मामले में कानूनी प्रक्रिया लंबी चलेगी।

विपक्ष के दलील में दम नहीं
बीजेपी नेताओं द्वारा बचाव की दलीलों के बीच कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार को घेरने का एक मौका देख रही है। लेकिन विपक्षी दलों द्वारा नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांगे जाने पर कांग्रेस खुद भी सवालों के बीच खड़ी है। क्या कांग्रेस राजनीति की शुचिता और नैतिकता के उस घेरे से खुद को बाहर समझती है जिस आधार पर वो बीजेपी सरकार को घेरना चाहती है? क्या नैतिकता और शुचिता की बात करने वाली कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को पहले खुद को इस आईने में नहीं देखना चाहिए?

क्या राजनीतिक शुचिता की बात करने वाली कांग्रेस को तब क्या सांप सूंघ गया था जब उनके तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप घोटाले का आरोप लगा था? तब उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया?

क्या राजीव गांधी और कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस लीक मामले में आठ हजार से ज्यादा मौतों के जिम्मेदार एंडरसन को भगाने के आरोपी नहीं थे? क्या उन्होंने इस्तीफा दे दिया था?

क्या वे उन पचास हजार परिवारों का गुनहगार नहीं हैं जिन्होंने अपनी या अपने परिवार की किसी न किसी व्यक्ति की जान कैंसर जैसी बीमारियों की वजह से गंवा दी?

क्या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कोयला घोटालों की कालिख का कलंक नहीं है? क्या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी राहुल गांधी पर नेशनल हेराल्ड मामले में वित्तीय फर्जीवाड़े का आरोप नहीं लगा है?

क्या भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव बाबरी विध्वंस मामले में नैतिक आधार पर दोषी नहीं थें? जिनके कार्यकाल में बाबरी ढांचे का विध्वंस किया गया था?

कठघरे में खुद खड़ी है कांग्रेस
बहरहाल ये ऐसे सवाल हैं जिसमें कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी घिरते नजर आते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश भर से कि आपराधिक मुकदमा चलाया जाए, किसी को इस्तीफा देने को मजबूर क्यों किया जाए? ये इसलिए भी कि जिस पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की ईमानदारी की कसमें खा-खा कर कांग्रेसी अपने को पाक-साफ बताती रही है, जरा आइए 2004 में उनके दागी मंत्रिपरिषद पर भी नजर डाल दें।

लालू यादव 
950 करोड़ के चारा घोटाले में कई बार जेल की हवा खा चुके होने के बावजूद भी यूपीए सरकार ने उन्हें मंत्री बनाया। तब उनकी नैतिकता कांग्रेस नैतिकता का पाठ शायद भूल गई थी।

शिबू सोरेन
शशिनाथ झा हत्याकांड में आरोपी होने और मुकदमा होने को बाबजूद भी वे मंत्री बने। गिरफ्तारी के वारंट से मजबूर होकर इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन शुचिता की दुहाई देने वाली कांग्रेस ने जमानत मिलने के बाद उन्हें फिर से मंत्री बना दिया। हालांकि 2006 में दिल्ली की अदालत ने जब उन्हें दोषी करार कर दिया तो फिर एक बार इस्तीफा दिया।

ए राजा
2004 में टेलिकॉम मंत्री बने और इसी दौरान 2जी स्पेकट्रम की नीलामी में भ्रष्टाचार किया लेकिन 2009 में फिर से टेलिकाम मंत्री बने रहे। तब तो कांग्रेस को नैतिकता और शुचिता की याद तक नहीं आई थी।

मोहम्मद तस्लीमुद्दीन
तत्कालीन यूपीए-1 सरकार में आरजेडी के ये नेता कृषि राज्य मंत्री बने थे। हत्या और फिरौती के संगीन मुकदमों के बावजूद कांग्रेस की सरकार को तस्लीमुद्दीन में कोई दोष नहीं दिखा था।

जयप्रकाश नरायण यादव
आरजेडी के बाहुबली नेता को फर्जी डिग्री घोटाले के मामले में राबड़ी देवी की बिहार सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था और न्यायालय में मुकदमा भी था लेकिन मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल में उन्हें अपना साथी बनाया। तब कांग्रेस नेताओं को सबकुछ सही लग रहा था।

एम ए फातमी
गंभीर अपराधों में शामिल होने के आरोपों और जयप्रकाश नारायण यादव और मोहम्मद शहाबुद्दीन के साथ एफआइआर में नामजद होने के बावजूद मानव संसाधन जैसे मंत्रालय में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया था।

केजरीवाल ने क्यों नहीं दिया इस्तीफा?
इधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके मंत्रिपरिषद की बात करें तो ये आंकड़े और भी गंभीर हैं। शुंगलू कमेटी की रिपोर्टों में घिरे केजरीवाल पर खुद इस्तीफे का दबाव है, क्या वे इस्तीफा देंगे? डीडीसीए मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली का मानहानि मुकदमे में वे बुरी तरह फंसे हुए हैं, तो क्या वे इस्ताफा देने जा रहे हैं ?

मायावती कैसे हैं पाक-साफ?
अब आइये मायावती पर हुए मुकदमों, जिनपर आय से अधिक संपत्ति के मामले चल रहे हैं, ताज कॉरिडोर में 17 करोड़ के घोटाले का केस है और जन्मदिन में बेशुमार दौलत खर्च करने के आरोप में मुकदमा अभी चल ही रहा है, लेकिन वे राज्यसभा सांसद हैं। क्या मायावती ने ऐसे आरोपों के बावजूद क्या इस्तीफा दे दिया? जब वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तब भी उनपर कई आरोप लगे थे और सीबीआई की जांच चल रही थी, लेकिन तब उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया?

मुलायम भी हैं अपराधी !
समाजवादी पार्टी के नेता और सांसद मुलायम सिंह यादव तो लंबे समय से आय से अधिक संपत्ति मामले में घिरे हैं, उनपर सीबीआई जांच भी चल रही है। इतना ही नहीं लखनऊ के हजरतगंज थाने में उनपर एक आइएस ऑफिसर अमिताभ ठाकुर को धमकाने का भी मुकदमा दर्ज है, ये तो क्राइम है, तो क्या उन्होंने इस्तीफा दे दिया?

उमा को इसलिए नहीं देना चाहिए इस्तीफा
अब आइये समझते हैं कि उमा भारती को इस्तीफा क्यों नहीं देना चाहिए। दरअसल राम जन्मभूमि निर्माण का अभियान आंदोलन का शक्ल अख्तियार कर चुका था। जब छह दिसंबर 1992 में बाबरी ढ़ांचा विध्वंस की घटना घटी थी तो देश -विदेश से राम जन्मभूमि के निर्माण के लिए लोग अयोध्या में इकट्ठे हुए थे। लोगों का मूड था कि कैसे भी मंदिर का निर्माण हो जाए। इन नेताओं ने हालांकि लोगों को नियंत्रित करने की कोशिश की थी, लेकिन भीड़ नहीं मानी और बाबरी ढांचे को गिरा दिया गया। हालांकि देश के कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया गया जिसमें इन नेताओं के नाम भी उसमें शामिल किए गए हैं। अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मुकदमे की अनुमति दे दी है, लेकिन अभी इन तमाम आरोपियों के पास अपनी बात कोर्ट में रखने का मौका है।

 

क्या है मामला?
1992 में बाबरी ढ़ांचा गिराने को लेकर दो मामले दर्ज किए गए थे। एक मामला (केस नंबर 197) कार सेवकों के खिलाफ था जबकि दूसरा मामला (केस नंबर 198) मंच पर मौजूद नेताओं के खिलाफ। केस नंबर 197 के लिए हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से इजाजत लेकर ट्रायल के लिए लखनऊ में दो स्पेशल कोर्ट बनाए गए जबकि 198 का मामला रायबरेली में चलाया गया। केस नंबर 197 की जांच सीबीआई को दी गई जबकि 198 की जांच यूपी सीआईडी ने की थी। केस नंबर 198 के तहत रायबरेली में चल रहे मामले में नेताओं पर धारा 120 B नहीं लगाई गई थी लेकिन बाद में आपराधिक साजिश की धारा जोड़ने की कोर्ट में अर्जी लगाई। आज कोर्ट ने इसकी इजाजत दे दी।

 

क्या है फैसला?
बाबरी ढ़ांचा विध्वंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और केंद्रीय मंत्री उमा भारती समेत 10 लोगों को आपराधिक मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है।

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