Home विपक्ष विशेष नोटबंदी के बाद जब अपने ही चक्रव्यूह में फंसा विपक्ष

नोटबंदी के बाद जब अपने ही चक्रव्यूह में फंसा विपक्ष

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट बंद करने के फैसले का लोगों ने जोरदार स्वागत किया है। लेकिन नोटबंदी का विरोध कर विपक्षी पार्टियों ने एक तरह से किरकिरी मोल ले ली।

नोटबंदी के खिलाफ विपक्षी पार्टियों ने भारत बंद का आह्वान किया लेकिन बंद को लेकर विपक्षी पार्टियां बिखरी नजर आई। देश के ज्यादातर हिस्सों में बंद का कोई खास असर नहीं दिखा।

देश में पहली बार ये स्थिति हुई कि भारत बंद के बाद ये सारे लोग बिखर गए और यह कहने को मजबूर हो गए कि मैंने भारत बंद नहीं बुलाया था।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को कहना पड़ा कि हमने भारत बंद नहीं बुलाया, क्योंकि इससे लोगों को दिक्कत होती है। कांग्रेस ने इसे जन आक्रोश दिवस का नाम दे दिया।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली, यूपी और बिहार में विरोध प्रदर्शन कर मुद्दे को भुनाने की कोशिश की लेकिन लोगों ने भ्रष्टाचार को साथ देने वाला कदम बताया। स्थानीय नेताओं ने तो उन्हें सारधा घोटाले की क्वीन तक बता डाला।

जिसके बाद में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने भी कहा कि वे बंद के समर्थन में नहीं हैं, हालांकि नोटबंदी के विरोध में एकजुट प्रदर्शन का आह्वान करते हुए उन्होंने कोलकाता में एक रैली की।

सबसे ज्यादा फजीहत तो दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की हुई। लोगों को लगा कि कथित रूप से करप्शन के खिलाफ लड़ाई लड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे केजरीवाल आम आदमी की आड़ में भ्रष्टाचारियों के समर्थन में दिख रहे हैं।

बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू भी इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं रही। नीतीश शुरू से 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने के फैसले के पक्ष में रहे हैं।

यूपी में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी ने कहा कि राज्य में उसकी सरकार है, ऐसे में बंद से रेल और सड़क यातायात के साथ ही कानून व्यवस्था की समस्या होगी।

बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने साफ कहा कि हम भारत बंद में शामिल नहीं हैं। विरोध का हमारा अपना तरीका है।

विपक्ष अब देश में उल्टी गंगा बहाने पर आमादा है। लेकिन उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है और सार्थक बहस भी नहीं करना चाहते।

अब तो हाल यह है कि नोटबंदी का विरोध करने वालों को काले धन के जमाखोर के रूप में देखा जाने लगा है। लोग अब पूछने लगे हैं कि कालाधन वापस लाने की मांग करने वाले और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए अभियान चलाने वाले आखिर क्यों नोटबंदी के इस कदम का विरोध कर रहे हैं?

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