Home विपक्ष विशेष एनडीए का चेहरा एकमात्र प्रधानमंत्री मोदी, विपक्ष में पीएम उम्मीदवारी के कम...

एनडीए का चेहरा एकमात्र प्रधानमंत्री मोदी, विपक्ष में पीएम उम्मीदवारी के कम से कम दर्जन भर दावेदार!

451
SHARE

अब तक महागठबंधन की चर्चा में जुटी पार्टियों के नेता ये महसूस कर चुके हैं कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्ष में प्रधानमंत्री उम्मीदवार की रेस में खुद को सबसे आगे रखना चाहती हैं। एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के मौके पर विपक्षी नेताओं को जुटाने का मामला हो या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) से असम में सामने आए 40 लाख संदिग्धों के मुद्दे पर बढ़-चढ़कर दिया बयान, ममता की महत्वाकांक्षा उजागर हो चुकी है। लेकिन विपक्ष में जहां कम से कम दर्जन भर प्रधानमंत्री उम्मीदवार हों वहां ममता क्या, किसी भी एक नाम पर सहमति कहीं से संभव नहीं दिखती। आप कहेंगे दर्जन भर उम्मीदवार कौन और कैसे, तो आइए जान लेते हैं:

1. ममता बनर्जी – तृणमूल कांग्रेस प्रमुख यह कहती रही हैं कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार पहले से तय करने से विपक्षी एकता को खतरा हो सकता है। लेकिन ऐसा कहकर वे अपनी उम्मीदवारी की दावेदारी को भी मजबूती से जाहिर कर जाती हैं। इसके साथ ही पिछले कुछ समय में ऐसे मौके सामने आए हैं जिनसे पता चलता है कि ममता अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने में जुटी हुई हैं। बताया तो ये भी जा रहा है कि अपनी उम्मीदवारी को बल देने के लिए ममता अगले वर्ष 19 जनवरी को कोलकाता में गैरबीजेपी नेताओं की एक रैली भी करने वाली हैं।

2. राहुल गांधी – महागठबंधन की कवायद में कांग्रेस की ज्यादा पूछ नहीं दिख रही। इसकी सबसे बड़ी वजह है कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का चेहरा होना जो चेहरा पिछले कई सालों से चुनावों में लगातार पिटता आ रहा है। स्थिति तो ये है कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा  80 सीटों में से दसवां हिस्सा भी कांग्रेस को लड़ने को नहीं देना चाहतीं। लेकिन राहुल में माद्दा नहीं होने के बावजूद उनकी पार्टी उनके चेहरे को प्रोजेक्ट करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही।

3. शरद पवार – एनसीपी के मुखिया शरद पवार सन् 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से अलग हुए थे। आज महागठबंधन की कवायद में वे भी देखे तो जा रहे हैं लेकिन राहुल गांधी के नाम पर हामी भरना उनके मन को शायद ही गंवारा होगा। ऐसे में राजनीति में अपना लंबा अनुभव रखने वाले 78 वर्षीय पवार भी क्यों ना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने की चाहत रखना चाहेंगे?

4. मायावती – 2019 के लोकसभा चुनावों में भले ही बीएसपी प्रमुख मायावती के पास शून्य से ऊपर उठने की चुनौती हो, लेकिन वे अपने आपको प्रधानमंत्री उम्मीदवार की रेस में देख रही हैं। गौर करने वाली बात है कि उनकी पार्टी ने तो पिछले दिनों उन्हें प्रधानमंत्री पद का सबसे योग्य उम्मीदवार बताकर पेश भी कर दिया था।

5. अखिलेश यादव – उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने दो हफ्ते पहले ही बयान दिया था कि महागठबंधन के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के बारे में फैसला लोकसभा चुनावों से ठीक पहले या चुनावों के बाद बातचीत से लिया जाएगा। इस प्रकार उन्होंने भी अपने पत्ते को अभी बंद रखना ही उचित समझा है, जिससे साफ है कि आखिर वे भी क्यों ना खुद को एक उम्मीदवार मानकर चलें।

6. तेजस्वी यादव – बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने भी पिछले दिनों ऐसा बयान दिया जिससे उनकी महत्वाकांक्षा भी सीधा सामने आ गई। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार के लिए राहुल गांधी एकमात्र नाम नहीं। इसके साथ ही भले ही तेजस्वी ने कुछ और नाम गिनाए हों लेकिन राजनीतिक रूप से देखें तो उन्होंने अपना विकल्प भी बनाए रखा है। तेजस्वी आजकल सजायाफ्ता पिता लालू की जगह आरजेडी का चेहरा बनने में लगे हुए हैं।

7. शरद यादव – जेडीयू से निकाले जाने के बाद से शरद यादव का राजनीतिक आधार खत्म हुआ दिख रहा है, लेकिन विपक्ष में जब प्रधानमंत्री उम्मीदवार की बात हो तो वे भी क्यों पीछे रहना चाहेंगे? अपनी महत्वाकांक्षा में शरद यादव को शायद लालू यादव का सहारा दिख रहा हो, क्योंकि लालू ने उनसे बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए आगे आने की अपील की थी। भ्रष्टाचार में सजा की मार से लालू खुद राजनीति के लायक नहीं रहे, तेजस्वी अभी दांव-पेच सीख रहे हैं, यह स्थिति शायद शरद यादव को अपने लिए राजनीतिक रूप से अनुकूल दिख रही हो!

8. चंद्रबाबू नायडू – आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू का नाम सत्तालोलुप राजनीति के लिए जाना जाता है। वे जनहित की बजाय अपने निजी मतलब से गठबंधन करते हैं और फिर उसी मतलब से बाहर हो जाते हैं। मुख्यमंत्री पद के लालच में कभी वे अपने सुसर और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को छिटकनी देने में भी नहीं चूके थे। ऐसे में तथाकथित विपक्षी एकजुटता के मंच पर उनका हमेशा मौजूद रहना प्रधानमंत्री उम्मीदवारी की उनकी दावेदारी की इच्छा को भी जाहिर करने वाला है।

9. सीताराम येचुरी – सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी भी आजकल उस मंच पर शामिल नजर आ रहे हैं जिसके जरिए विपक्ष की एकजुटता को प्रदर्शित करने की कोशिश की जाती है। कांग्रेस के विरोध की राजनीति करते-करते एक दौर ऐसा भी आया जब वामपंथी दलों ने कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार को भी अपना समर्थन दिया था। अब विपक्ष के ढेर सारे उम्मीदवारों के बीच ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि येचुरी भी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी के लिए खुद को उपयुक्त पाने लगें?

10. एचडी कुमारस्वामी – पिछले दिनों कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी का यह बयान काफी चर्चित हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि वे गठबंधन का विष पी रहे हैं। यह गठबंधन उसी कांग्रेस से है जिसने उनके पिता एचडी देवेगौड़ा को पहले तो प्रधानमंत्री बनवाया और फिर एक साल भी नहीं हुआ था कि कुर्सी से उतार दिया। लेकिन समझते-बूझते गठबंधन का विष पीने वाले बयान से कुमारस्वामी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बखूबी समझा जा सकता है। उनके दिल के किसी कोने में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की चाहत मौजूद हो सकती है। पिता का उदाहरण भी उनके सामने है।

11. उमर अब्दुल्ला – महागठबंधन की कवायद में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला का चेहरा भी सामने आता रहा है। पिछले दिनों ममता बनर्जी से मिलने के बाद उन्होंने इसको लेकर अपनी सहमति जताई कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुनने में कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही इस उम्मीदवारी के लिए अपनी संभावनाओं को भी उन्होंने खत्म नहीं होने दिया है।

12. अरविंद केजरीवाल – दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा किस स्तर की हो सकती है, इसे छह साल पहले पूरा देश देख चुका है। जिस प्रकार से समाजसेवी अन्ना हजारे को उन्होंने अपने मतलब के लिए इस्तेमाल किया, वह अपने आपमें केजरीवाल के राजनीतिक अरमानों को सामने लाना वाला था। ऐसे में भला प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर वो महज एक समर्थक की भूमिका में रहना शायद ही पसंद करेंगे।

जाहिर है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2019 में सत्ता में आने से रोकने के लिए विपक्ष महागठबंधन बनाने की इच्छा तो रखता है लेकिन पीएम उम्मीदवारी के उसके कम से कम दर्जन भर दावेदार हैं। ऐसे में महागठबंधन की कोई भी असली कवायद तो वहां से शुरू होगी जहां पहले किसी एक चेहरे पर सहमति  बन जाए। आपको क्या लगता है, क्या ये सहमति संभव है?

LEAVE A REPLY