Home विपक्ष विशेष CWC के गठन से फिर हुआ साफ, कांग्रेस मतलब गांधी परिवार!

CWC के गठन से फिर हुआ साफ, कांग्रेस मतलब गांधी परिवार!

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आखिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी के सर्वेसर्वा बनने के सात महीने बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) का गठन कर दिया। कांग्रेस पार्टी की सबसे ताकतवर कमेटी यानि CWC के गठन में राहुल गांधी की ही चली है। राहुल ने कई बड़े और पुराने नेताओं को बाहर कर दिया है, वहीं कई जनाधार वाले नेताओं को शामिल नहीं किया है। 51 सदस्यीय CWC में बाहर किए गए नेताओं में दिग्विजय सिंह, सीपी जोशी, बी के हरिप्रसाद, मोहन प्रकाश, सुशील कुमार शिंदे, ऑस्कर फर्नांडिस के नाम शामिल हैं। महिला आरक्षण की बात करने वाले राहुल गांधी ने CWC में महिलाओं को भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। जिस प्रकार नेताओं को निकाला और शामिल किया गया है उससे साफ हो गया है कि कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है और वहां सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार की चलती है।

CWC से बाहर हुए दिग्विजय का छलका दर्द
दिग्विजय सिहं को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का राजनीतिक गुरु माना जाता है। दिग्विजय सिंह कांग्रेस के कद्दावर नेता है, मध्यप्रदेश के सीएम रह चुके हैं, लेकिन इस बदलाव में उन्हें अन्य नेताओं की तरह CWC से बाहर कर दिया गया है। दिग्विजय सिंह का कहना है कि CWC से बाहर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वे आखिरी सांस तक पार्टी के लिए काम करते रहेंगे। उनके इस बयान से साफ है कि इतना बड़ा फैसला लेने से पहले राहुल गांधी ने उन्हें विश्वास में नहीं लिया है। आपको बता दें कि मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 23 सदस्यों की लिस्ट जारी की थी। इसके साथ ही 18 स्थायी आमंत्रित सदस्य और 10 विशेष आमंत्रित सदस्य भी शामिल किए गए। जाहिर है कि CWC से आउट होना दिग्विजय सिंह के राजनीतिक कद को बड़ा झटका देने वाला कदम माना जा रहा है।

जनाधार वाले नेताओं को CWC में जगह नहीं
कांग्रेस वर्किंग कमेटी में जनाधार वाले नेताओं को शामिल नहीं करना किसी रणनीति का हिस्सा है या फिर राहुल गांधी की अपरिपक्वता यह भी बड़ा सवाल है। सभी को मालुम है कि कांग्रेस पार्टी इन दिनों बुरे दौर से गुजर रही है। आज पंजाब, मिजोरम और पुडुचेरी में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, जबकि कर्नाटक में उसकी जेडीएस के साथ गठबंध की सरकार है। अगर देखा जाए तो इन राज्यों में पंजाब ही ऐसा बड़ा राज्य है, जहां कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह इस वक्त बड़े जनाधार वाले नेता है। दुर्भाग्य की बात है कि उन्हें CWC में शामिल नहीं किया गया है। सभी को पता है कि अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, पंजाब में सरकार गठने में राहुल का कोई योगदान नहीं था, वहीं कांग्रेस को जीत अमरिंदर सिंह की वजह से मिली थी। लगता है राहुल गांधी ने CWC में शामिल नहीं कर अमरिंदर सिंह से बदला लिया है।

राहुल ने अपनी चौकड़ी के नेताओं को दी तरजीह
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी में अपने इर्द गिर्द घूमने वाले नेताओं को तरजीह दी है। नामों पर अगर नजर डालें तो CWC में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया, बालासाहेब थोराट, तारिक हमीद कारा, पीसी चाको, जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, पीएल पूनिया, रणदीप सुरजेवाला, आशा कुमारी, रजनी पाटिल, रामचंद्र खूंटिया, अनुग्रह नारायण सिंह, राजीव सातव, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव गोगोई और ए. चेल्लाकुमार शामिल हैं। वहीं विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर केएच मुनियप्पा, अरुण यादव, दीपेंद्र हुड्डा, जितिन प्रसाद, कुलदीप विश्नोई, इंटक के अध्यक्ष जी संजीव रेड्डी, भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष केशव चंद यादव, एनएसयूआई के अध्यक्ष फिरोज खान, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव और कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संगठक लालजीभाई देसाई को शामिल किया गया है। इन नामों पर अगर गौर किया जाए तो साफ लगेगा कि राहुल ने अपने खासमखास नेताओं को इस कमेटी में लिया है, फिर चाहे इन नेताओं का जनाधार हो या नहीं।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी में महिलाओं को जगह नहीं दी
राहुल गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी में महिला नेताओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। महिला आरक्षण की बातें करने वाले राहुल गांधी ने CWC सिर्फ 15 प्रतिशत महिलाओं को ही जगह दी है। CWC के 23 सदस्यों में सोनिया गांधी समेत केवल 3 महिलाओं को जगह मिली है। दो अन्य महिला नेता अम्बिका सोनी और कुमारी शैलजा हैं। शीला दीक्षित, आशा कुमारी, रजनी पाटिल स्थाई आमंत्रित सदस्य बनाई गई हैं। आमंत्रित महिला सदस्यों को जोड़ लें तो भी महिलाओं की संख्या 51 में से केवल 7 ही है। यानि 15 प्रतिशत से भी कम।

राहुल गांधी ने दिखाई कार्यकर्ताओं को औकात, कहा- ‘मैं ही कांग्रेस हूं’
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं से साफ कर दिया है कि मैं ही कांग्रेस हूं। मुस्लिम पार्टी विवाद के बीच राहुल गांधी ने ‘मैं ही कांग्रेस हूं’ वाला बयान माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइट पर ट्वीट करके दिया है। राहुल गांधी ने इसके साथ ही साफ कर दिया है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का कोई अस्तित्व नहीं है। सभी को पता है कि राहुल गांधी को वंशवाद की राजनीति के तहत कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। योग्यता की जगह वंशवाद को तरजीह देकर उन्हें अध्यक्ष बनाया गया है।

आजादी के बाद से ही कांग्रेस पार्टी नेहरू-गांधी खानदान की बपौती बन चुकी है। आपको आगे बताते हैं किस तरह कांग्रेस पार्टी पर नेहरू-गांधी खानदान के लोगों का राज रहा है और इन लोगों ने मनमाने तरीके से पार्टी को चला है।-

कांग्रेस यानी गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड !
देश आजाद होने के बाद बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस के बारे में एक महत्वपूर्ण बयान दिया था। उन्होंने कांग्रेस को भंग कर देने की बात कही थी। आज वो बयान फिर से महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले वर्ष 16 दिसबंर को राहुल गांधी औपचारिक रूप से अध्यक्ष बन गए थे। ऐसे में इस बात का आकलन करना जरूरी है कि क्या कांग्रेस को लेकर महात्मा गांधी के मन में कोई संदेह था। अगर इसका विश्लेषण करें तो कांग्रेस पार्टी में नेहरू परिवार के कब्जे का महात्मा गांधी को उस समय ही अंदेशा हो गया था। 

आजादी के 70 साल, 53 साल तक शीर्ष पद पर कब्जा
ये हेडर चौंकाने वाला है। लेकिन कांग्रेस और नेहरू परिवार की यही सच्चाई है। अगर कांग्रेस और प्रधानमंत्री पद के लिए नेहरू परिवार की समय सीमा निकालें तो आजादी के 70 साल में 53 साल तक इस परिवार का किसी न किसी या फिर दोनों पदों पर एक साथ कब्जा रहा है।

नेहरू परिवार ने कांग्रेस को जागीर बनाई
आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, उनकी बेटी इंदिरा गांधी, फिर उनके बेटे राजीव गांधी, राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी के कार्यकाल का आकलन यह बताने के लिए काफी हैं कि किस प्रकार तिलक से लेकर गांधी की पार्टी को एक परिवार ने अपनी जागीर बना ली। कई बार तो ऐसा वक्त भी आया जब नेहरू तक ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ पार्टी अध्यक्ष के पद पर भी अपना कब्जा जमा लिया।

इन आंकड़ों से साफ है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में किस तरह एक ही परिवार का कब्जा है, अब सवाल यह उठता है कि पूरी दुनिया में अपने गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपरा की पहचान बनाने वाले भारत देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में आखिर आंतरिक लोकतंत्र क्यों नहीं है? आखिर क्यों कांग्रेस पार्टी वंशवाद और परिवारवाद से बाहर निकल कर आम कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं देती?

कांग्रेस में वंशवाद को थोपने का नतीजा भी सामने आ चुका है। राहुल गांधी जब से कांग्रेस में प्रमुख भूमिका में आए हैं, पार्टी के दुर्दिन शुरू हो गए। डालते हैं एक नजर-

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने बनाया हारने का रिकॉर्ड
जब से राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में प्रभावकारी भूमिका में आए हैं, तभी से कांग्रेस पार्टी के दुर्दिन शुरू हो गए। पिछले वर्षों पर नजर डालें तो राहुल के नेतृत्व में जितने भी चुनाव लड़े गए एक में भी कांग्रेस पार्टी को सफलता नहीं मिली है। राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस को गुजरात, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय और कर्नाटक में हार का मुंह देखना पड़ा है। इसके पहले उपाध्यक्ष के रूप में दिल्ली, अरूणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मणिपुर, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलांगना और 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

वंशवाद की राजनीति थोपने का मिला जवाब
कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी का जो हश्र हुआ है, वह उसके कुकर्मों का ही फल है। देश की सबसे पुरानी पार्टी, जिसका कभी लगभग पूरे देश पर शासन था, आज इतनी बुरी हालत से क्यों गुजर रही है। जाहिर है कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ वंशवाद की राजनीति जिम्मेदारा है। कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है, वहां जो कुछ भी होता है, वह एक ही परिवार के लिए होता है। गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड बन चुकी कांग्रेस पार्टी में जिस तरह राहुल गांधी की अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी हुई है, उसने साबित कर दिया है कि कांग्रेस मतलब गांधी परिवार। जब उच्च स्तर पर वंशवाद होगा तो नीचे भी इसका असर दिखेगा। इसीलिए कांग्रेस पार्टी में निचले स्तर पर भी वंशवाद, परिवारवाद हावी है। जनता इस परिवारवाद के खिलाफ है और उसने कांग्रेस को इसका सबक सिखाया है।

अपने कर्मों से क्षेत्रीय पार्टी बनने की ओर कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी कहने को तो राष्ट्रीय दल है, लेकिन अब वह सिर्फ तीन राज्यों तक सिमट गई है। आने वाले दिनों में कोई बड़ी बात नहीं कि इनमें से भी एक-दो राज्य कांग्रेस के हाथ से खिसक जाएं। मतलब कभी राष्ट्रीय दल का रुतबा रखने वाला यह दल अब क्षेत्रीय दल बनता जा रहा है। इससे तो अच्छे कई दूसरी रीजनल पार्टियां हैं, जिनकी बड़े-बड़े राज्यों में सरकार है। उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड सरीखे राज्यों से तो कांग्रेस का पहले ही सफाया हो चुका है और अब दक्षिण के आखिरी गढ़ से भी कांग्रेस का बोरिया-बिस्तर सिमट चुका है।

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